माचिस की तिली
पेड़ की लकड़ी से बनती,कई माचिस की तिली ,
सर पे जब लगता है रोगन,मुंह में बसती आग है
जरा सा ही रगड़ने पर ,जलती है तिलमिला कर,
और कितने दरख्तों को ,पल में करती खाक है
घोटू
जहाँ खुला आकाश मात्र था
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जहाँ खुला आकाश मात्र था भ्रम के कितने सर्प पल रहे मानव को ख़ुद ही डसते
हैं, लगती होड़ सुपर होने की अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !जहाँ खुला आकाश मात्र
था मानव ...
1 दिन पहले
बहुत बहुत बधाई...
जवाब देंहटाएंअधिक संघर्ष से चन्दन भी जल जाता है |
जवाब देंहटाएंअवसर आने पर 'सुप्त ज्वालामुखी' भी उबल जाता है ||