परछाई
सुबह हुई जब उगा सूरज ,मै निकला ,मैंने देखा ,
चली आ रही ,पीछे पीछे ,वो मेरी परछाईं थी
सांझ हुई और सूरज डूबा ,जब छाया अंधियारा तो,
मैंने पाया ,साथ छोड़ कर ,चली गयी परछाईं थी
रात पड़े ,जब हुई रौशनी ,सभी दिशा में बल्ब जले,
मैंने देखा ,एक नहीं,अब चार चार परछाईं थी
मै तो एक निमित्त मात्र था,सारा खेल रौशनी का,
जब तक जितनी रही रौशनी ,तब उतनी परछाईं थी
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
मंज़िल और रास्ते
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मंज़िल और रास्ते जिसने जाना, जो भी जाना वह कहा नहीं जा सकता जो कहा गया
है वह मार्ग की खबर देता है मंज़िल की नहीं वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है कोई
चल सकता ह...
9 घंटे पहले
बहुत बढ़िया रचना है शब्द कौशल ने मन मोहा .आप कभी हमारे ब्लॉग पे नहीं आईं.कोई ख़ास वजह या यूं ही
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