परछाई
सुबह हुई जब उगा सूरज ,मै निकला ,मैंने देखा ,
चली आ रही ,पीछे पीछे ,वो मेरी परछाईं थी
सांझ हुई और सूरज डूबा ,जब छाया अंधियारा तो,
मैंने पाया ,साथ छोड़ कर ,चली गयी परछाईं थी
रात पड़े ,जब हुई रौशनी ,सभी दिशा में बल्ब जले,
मैंने देखा ,एक नहीं,अब चार चार परछाईं थी
मै तो एक निमित्त मात्र था,सारा खेल रौशनी का,
जब तक जितनी रही रौशनी ,तब उतनी परछाईं थी
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
809. तो मिले उपहार (5 ताँका)
-
तो मिले उपहार
***
1.
राखी-त्योहार
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली
कैसे ले उपहार
मँहगाई की मार।
2.
राखी है आई
भाई है परदेस
बहना दुःखी
वीडियो-कॉल आया
ब...
2 दिन पहले
बहुत बढ़िया रचना है शब्द कौशल ने मन मोहा .आप कभी हमारे ब्लॉग पे नहीं आईं.कोई ख़ास वजह या यूं ही
जवाब देंहटाएं