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शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

अभी मुझे जीना है


जीवन की आपाधापी में इतना रहा फंसा मुझे याद नहीं पिछली बार मैं कब जी खोलकर था हंसा 

कई बार मित्रों की महफिल में हंसने का प्रसंग आया

लेकिन मैं खुल कर हंस नहीं पाया

हंसा भी तो मेरी हंसी खोखली थी 

अपने मुख पर एक नकली मुस्कान  ओढ़ ली थी 

ठहाकों वाला आनंद नहीं था

दबी दबी हंसी हंसना मुझे पसंद नहीं था 

फिर भी मैं मुस्कराता रहा 

भले ही कई परेशानी उठाता रहा 

मुसीबतों से टक्कर लेना मेरी फितरत में है 

फिर भी नहीं झुकना मेरी आदत में है अच्छे बुरे दिन तो आते जाते रहते हैं आपकी परीक्षा लेते हैं, आपके धीरज को आजमाते रहते हैं 

मैं कितनी ही परीक्षाएं दे चुका हूं मुसीबतों से टक्कर ले चुका हूं 

पर अबकी बार लगता है कि मैं थोड़ा पस्त होने लगा हूं 

अपना धीरज खोने लगा हूं 

नहीं नहीं मैं तो ऐसी मिट्टी का बना ही नहीं हूं

 ऐसी माता का जना ही नहीं हूं 

जो इतनी जल्दी हौसले होने लगे 

अपना धीरज खो दे, रोने लगे 

मुझे इन सब को रोकना होगा

 अपने आप में नहीं फुर्ती से मैदान में झोंकना होगा

 मैं लडूंगा ,आने वाली हर मुसीबत से लडूंगा 

किसी के पैर नहीं पड़ूंगा 

 हिम्मत और जोश से आगे बढ़ना है

तरक्की की सीढ़ियों पर चढ़ना है

किसीकी मेहरबानी पर नहीं, अपने बल बूते  जीना है

सुख का अमृत पीना है

अब हँसूंगा तो दिल से ठहाके मार कर हँसूंगा 

बुढ़ापे को जीवन का स्वर्णिम काल बना दूंगा 

 मुझे अपना बाकी जीवन बिताना मौज मस्ती और आराम से 

जीना है तो शान से ,मरना है तो शान से


मदन मोहन बाहेती घोटू 


रविवार, 27 सितंबर 2026

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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

 कुर्सी 

 बचपन में टाट पट्टी पर बैठकर लिखना सीखा,
फिर स्कूल की बैंचों और टेबल पर की पढ़ाई 

जैसे तैसे जुगाड़ कर, पास हम रहे होते आखिर एक दिन जा , बी ए की डिग्री पाई 
इच्छा थी इतनी भर , बने सरकारी अफसर ,
कुर्सी पर बैठकर करें लाखों की कमाई

 कितनी ही कंपटीशन परीक्षायें देते रहे,
 किसी में भी पर सफलता नहीं मिल पाई

फिर चाहा कि राजनीति में जा किस्मत आजमाएं
नेताजी बन करके ,किसी कुर्सीपर बैठ जाये,
चमचों से घिरे रहें,अपनी हो जय जय कार,
रिश्वत मे कमिशन, ढेर सा कमायें 

कुर्सी के खातिर हम , चुनाव मैदान में उतरे 
,हुई जब्त जमानत, पड़े वोट के लाले
कुर्सी की चाहत में, कुछ भी ना कर पाये,
तो अब फिर क्या करते, यूं ही बैठे ठाले 

दुकान पर पिताजी ने ,आखिर में बिठा डाला 
बैठ कर गद्दी पर, खूब की कमाई  

 बैठे-बैठे लाला जी बन गए हम लेकिन, नसीब में हमारे कुर्सी नहीं हो पाई 

 रीड की हड्डी अब बुढ़ापे में टेढ़ी है उठने और चलने में, मुश्किल है बन आई 

 पूरी हुई लेकिन अब, चाहत है कुर्सी की
 चलने और फिरने को व्हीलचेयर है पाई 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

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बुधवार, 8 जुलाई 2026

मैंने तो मांगी थी तुमसे 
सिर्फ अंजुली एक प्यार की,
 किंतु कृपा की तुमने ऐसी,
 सागर भर कर प्यार दे दिया 

मैं तुम्हारी प्रेम दृष्टि की,
 एक झलक पाने आतुर था 
लेकिन नयन मिला कर तुमने 
सपनों का संसार दे दिया 

बहुत तड़फ थी, उमस भरे दिन,
 लू के झोंके रहे थे बरस 
 मैंने तो तुमसे मांगी थी 
दे दो बस थोड़ी सी ठंडक

 पर बादल बन, तुमने साजन
 प्रेम नीर ऐसा बरसाया 
मेरे तन के पौर पौर में,
एक शीतल संचार दे दिया

 मैंने तो मांगी थी तुमसे,
सिर्फ अंजुली एक प्यार की 
किन्तु कृपा की तुमने ऐसी,
सागर भर कर प्यार दे दिया 

प्रबल शीत वाला मौसम था
मैं ठिठुरन से तड़फ रहा था 
मैंने तुमसे तन ढकने को 
माँगा था आँचल का साया 

दूर होगयी सारी तड़फन 
गरम हो गया तन का कण कण 
बदली मेरी सारी दुनिया 
जबसे साथ तुम्हारा पाया 

इतनी मेहरबान हुई तुम 
अपने श्वासों की ऊष्मा से 
देने तपन ठिठुरते दिल को
बाहुपाश का हार दे दिया 

मैने तो मांगी थी तुमसे 
सिर्फ अंजुली एक प्यार की 
किन्तु कृपा की तुमने ऐसी 
सागर भर कर प्यार दे दिया 

मदन मोहन बाहेती घोटू 





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