जीवन बोध
आगम बोध,प्रसूति गृह में,निगमबोध श्मसान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
आता जब मानव दुनिया में ,होता उसको बोध कहाँ
भोलाभाला निश्छल बचपन,काम नहीं और क्रोध कहाँ
और जब जाता है तो उसको,बोध कहाँ रह पाता है
खाली हाथ लिए आता है,खाली हाथों जाता है
जिन के खातिर ,सारा जीवन,रहता है खटपट करता
नाते जाते छूट सभी से, सांस आखरी जब भरता
जीवन भर चिंता में जलता,चिता जलाती मरने पर
एक राख की ढेरी बन कर ,रह जाता अस्थिपंजर
कंचन काया ,जिस पर रहता ,था अभिमान जवानी में
अस्थि राख बन ,तर जाते है ,गंगाजी के पानी में
उसे बोध है,मृत्यु अटल है,फिर भी है अनजाना सा
मोह माया के चक्कर में फस,रहता है दीवाना सा
पास फ़ैल होता रहता है,जीवन के इम्तिहान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सरस्वती -वन्दना
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* डॉ.सुरंगमा यादव*
*प**द्मासना वीणापाणि, ज्ञान गरिमादायिनी*
*श्वेतवसना*
*, शुभ्रवर्णा, हस्त पुस्तकधारिणी है प्रणत मन तव चरण में ,तुम कृपा...
8 घंटे पहले
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