भविष्य का बोझ
मै रोज सुबह सुबह देखता हूँ,
बच्चे जब स्कूल जाते हैं,
उन्हें बस तह छोड़ने के लिए ,
उनके माता या पिता,
उनके संग जाते है
और बस तक,
उनके भारी स्कूल बेग का बोझा ,
खुद उठाते है
बाद मे दिन भर ये भारी बोझा,
अच्छों को खुद ही उठाना होता है
जिंदगानी के साथ भी,
एसा ही कुछ होता है
क्योंकि माँ बाप,एक हद तक,
जैसे स्कूल की बस तक,
तो बच्चों का बोझा उठा सकते है
पर जिंदगानी के सफ़र मे,
हर एक को,
अपने अपने बोझे,
खुद ही उठाने पड़ते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएँ
-
माँ शारदे तू ही तो है पहली शिक्षक भाषाविद् व ज्ञान प्रदायिनी, मौन सृष्टि
में गूँज उठी थी स्वर-अक्षर भर तेरी वाणी !गायन-वादन का दिया ज्ञान मनुज का
किया दूर ...
16 घंटे पहले
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपने बहुमूल्य टिप्पणी के माध्यम से उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन करें ।
"काव्य का संसार" की ओर से अग्रिम धन्यवाद ।