पते की बात
भगवत उचाव
तू वही करता है जो तू चाहता
मगर होता वही जो मै चाहता
तू वही कर ,जो की मै हूँ चाहता
फिर वही होगा जो है तू चाहता
घोटू
1505
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*लेखक का पाठक होना ही सृजन की दृष्टि है - ऋता शेखर ‘मधु’*
*सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव**, **पृष्ठ - **192, **मूल्य
- **550...
1 दिन पहले
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