ये मन बृन्दावन हो जाता
तेरी गंगा, मेरी यमुना ,
मिल जाते,संगम हो जाता
तन का ,मन का ,जनम जनम का,
प्यार भरा बंधन हो जाता
जगमग दीप प्यार के जलते ,
ज्योतिर्मय जीवन हो जाता
रिमझिम रिमझिम प्यार बरसता ,
हर मौसन सावन हो जाता
प्यार नीर में घिस घिस ये तन,
महक भरा चन्दन हो जाता
इतने पुष्प प्यार के खिलते ,
जग नंदनकानन हो जाता
श्वास श्वास के मधुर स्वरों से,
बंसी का वादन हो जाता
रचता रास ,कालिंदी तीरे ,
ये मन वृन्दावन हो जाता
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
अहंकार का भोजन दुख है
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अहंकार का भोजन दुख है माँ की कृपा से कटती माया राग-द्वेष के बंधन
काटे, ऊँची-नीची लहरों में भीसमता का इक कमल खिला दे !सत् चित् आनंद स्वरूप
है मानव ख़ुद का भ...
16 घंटे पहले
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