जवानी पर चढ़ गयी है सर्दियां
रात की ठिठुरन से बचने, भूल सब शिकवे ,गिले
शाम ,डर कर,उलटे पैरों,दोपहर से जा मिले
ओढ़ ले कोहरे की चादर ,धूप ,तज अपनी अकड़
छटपटाये चमकने को ,सूर्य पीला जाये पड़
हवायें जब कंपकंपाये ,निकलना मुश्किल करे
चूमने को चाय प्याला ,बारहां जब दिल करे
जेब से ना हाथ निकले ,दिखाये कन्जूसियाँ
पास में बैठे रहे बस ,लगे मन भाने पिया
लिपट तन से जब रजाई ,दिखाये हमदर्दियाँ
तो समझ लो ,जवानी पर,चढ़ गयी है सर्दियाँ
घोटू
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*लेखक का पाठक होना ही सृजन की दृष्टि है - ऋता शेखर ‘मधु’*
*सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव**, **पृष्ठ - **192, **मूल्य
- **550...
1 दिन पहले
सीत ऋतु के सीतल कन..,
जवाब देंहटाएंनव यौवन आरोह..,
रैनि रैनि रज सित किरन..,
तरंगन रँगन लोह.....