समर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
करूं मै सुदर्शन, बनूँ मै सुदर्शन
सभी काम ,क्रोधा,
सभी रोग चिंता
सभी लोभ मोहा,
सभी द्वेष ,निंदा
गुरु के चरण में,सभी कुछ समर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
अपने ह्रदय से मै,
'मै' को निकालूँ
करूं प्रेम सबको,
मै अपना बनालूँ
करूं प्यार अपना,सभी को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
ह्रदय में सभी के,
खिले पुष्प सुख के
ख़ुशी ही ख़ुशी बस,
नज़र आये मुख पे
करूं पुष्प सारे,गुरु को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण ,समर्पण,समर्पण
साँसों की सरगम से,
मन को हिला दूं
खुदी को मिटा कर,
खुदा से मिला दूं
करूं आत्मदर्शन,बनू मै सुदर्शन
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
गंगा दर्शन
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गंगा दर्शन
ऋग्वेद (लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व) में सरस्वती नदी को "नदीतमा" (नदियों में
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2 घंटे पहले
सुन्दर भाव ,सुन्दर अभिव्यक्ति ;
जवाब देंहटाएंमेरी "स्मृति के पन्नों से "पर एकबार नज़र डाले और अपनी अमूल्य राय दें.