जीवन लेखा
जीवन के इस दुर्गम पथ पर,पग पग पर भटकाव लिखा है
कहीं धूप का रूप तपाता, कहीं छाँव का ठावं लिखा है
तड़क भड़क है शहरों वाली,बचपन वाला गाँव लिखा है
गीत लिखे कोकिल के मीठे, कागा का भी काँव लिखा है
पासे फेंक खेलना जुआ ,हार जीत का दाव लिखा है
कहीं किसी से झगडा,टंटा ,कहीं प्रेम का भाव लिखा है
अच्छे बुरे कई लोगों से,जीवन भर टकराव लिखा है
प्रीत परायों ने पुरसी है,अपनों से अलगाव लिखा है
लिखी जवानी में उच्श्रन्खलता ,वृद्ध हुए ,ठहराव लिखा है
वाह रे ऊपरवाले तूने,जीवन भर उलझाव लिखा है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
‘फजिरे- फजिरे’ …
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फजिरे से बारिश हो रही है। नींद में थी तब से बूँदों की रुनझुन सुन रही हूँ।
अब तो शाम ढलने वाली है और लगातार बारिश… थोड़ी ठंड भी महसूस हो रही है। बारिश
मे...
1 दिन पहले
जीवन का नाम ही उलझन है..
जवाब देंहटाएंएक से पीछा छुटा नहीं की दूसरी उलझन तैयार खड़ी रहती है...