बाती और कपूर
खुद को डूबा प्रेम के रस में,
तुम जलती हो बन कर बाती
जब तक स्नेह भरा दीपक में,
जी भर उजियाला फैलाती
और कपूर की डली बना मै,
जल कर करूं आरती ,अर्चन,
निज अस्तित्व मिटा देता मै,
मेरा होता पूर्ण समर्पण
तुम में ,मुझ में ,फर्क यही है,
तुमभी जलती,मै भी जलता
तुम रस पाकर फिर जल जाती,
और मै जल कर सिर्फ पिघलता
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
माँ की याद
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*जब-जब हम सरसों का साग और मक्का की रोटी घर में बनाते हैं *
*जैसे बचपन को ,माँ की याद को शिद्दत से घर बुलाते हैं *
*साग पर पिघलता हुआ सफेद मक्खन ,*
*वो...
1 घंटे पहले
bahut achchha. AAbhaar.
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