बाती और कपूर
खुद को डूबा प्रेम के रस में,
तुम जलती हो बन कर बाती
जब तक स्नेह भरा दीपक में,
जी भर उजियाला फैलाती
और कपूर की डली बना मै,
जल कर करूं आरती ,अर्चन,
निज अस्तित्व मिटा देता मै,
मेरा होता पूर्ण समर्पण
तुम में ,मुझ में ,फर्क यही है,
तुमभी जलती,मै भी जलता
तुम रस पाकर फिर जल जाती,
और मै जल कर सिर्फ पिघलता
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नाम...
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तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ
जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई ...
8 घंटे पहले
bahut achchha. AAbhaar.
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