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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

जज़्बात-ए-ईश्क


कुछ सुन लो या कुछ सुना दो मुझको,
गुमसुम रहकर न यूँ सजा दो मुझको,
जान से भी प्यारी है तेरी ये मुस्कुराहट,
मुस्कुरा कर थोड़ा सा हँसा दो मुझको |


आँखों से ही कुछ सीखा दो मुझको,
थोड़ी सी खुशी ही दिखा दो मुझको,
तेरी खुशी से बढ़कर कुछ भी नहीं है,
अपनो की सूची में लिखा दो मुझको |


पलकें उठा के एक नज़र जरा दो मुझको,
ज़न्नत के दरश अब करा दो मुझको,
तेरी जीत में ही छुपी है मेरे जीतने की खुशी,
नैनों की लड़ाई में थोड़ा हरा दो मुझको |

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय ,प्रदीप जी , सप्रेम साहित्याभिवादन ..
    सुन्दर अभिब्यक्ति ,बहुत अच्छा ...
    मेरे ब्लॉग ...पर ब्लागर बंधुओं का हार्दिक स्वागत है आ कर मार्ग दर्शन करे ...
    सादर
    लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल "
    कोसीर ...ग्रामीण मित्र !

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