बाती और कपूर
खुद को डूबा प्रेम के रस में,
तुम जलती हो बन कर बाती
जब तक स्नेह भरा दीपक में,
जी भर उजियाला फैलाती
और कपूर की डली बना मै,
जल कर करूं आरती ,अर्चन,
निज अस्तित्व मिटा देता मै,
मेरा होता पूर्ण समर्पण
तुम में ,मुझ में ,फर्क यही है,
तुमभी जलती,मै भी जलता
तुम रस पाकर फिर जल जाती,
और मै जल कर सिर्फ पिघलता
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34) समापन अंक
-
ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34)समापन अंक भाग 34 प्रियंकाउस शाम,
मैंने ऐसे पार्टी वाले कपड़े पहने जो मैंने काफी समय से नहीं पहने थे, और
जिन्हें मै...
13 घंटे पहले
bahut achchha. AAbhaar.
जवाब देंहटाएं