बाती और कपूर
खुद को डूबा प्रेम के रस में,
तुम जलती हो बन कर बाती
जब तक स्नेह भरा दीपक में,
जी भर उजियाला फैलाती
और कपूर की डली बना मै,
जल कर करूं आरती ,अर्चन,
निज अस्तित्व मिटा देता मै,
मेरा होता पूर्ण समर्पण
तुम में ,मुझ में ,फर्क यही है,
तुमभी जलती,मै भी जलता
तुम रस पाकर फिर जल जाती,
और मै जल कर सिर्फ पिघलता
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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*डॉ**. सुरंगमा यादव की कविताएँ*
* 1 यूँ हीं न मिले कुछ *
फलक पर सितारे न यूँ ही सजे हैं
सिफ़र से शिखर तक जमाने लगे हैं
खुशियों का मौसम न यूँ ही मि...
15 घंटे पहले
bahut achchha. AAbhaar.
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