चार दिन की जिंदगी
जन्म ले रोते हैं पहले,बाद में मुस्काते हैं,
और फिर किलकारियों से,हम लुटाते प्यार हैं
फिर पढाई,लिखाई और खेलना मस्ती भरा,
ये किशोरावस्था भी,होती गज़ब की यार है
प्यार,जलवा,नाज़,अदाएं,मौज,मस्ती रात दिन,
ये जवानी,चार दिन का ,मद भरा त्योंहार है
और फिर लाचार करता है बुढ़ापा सभी को,
कुछ नहीं उपचार इसका,जिंदगी दिन चार है
मदन मोहन बहेती'घोटू'
ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34) समापन अंक
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ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34)समापन अंक भाग 34 प्रियंकाउस शाम,
मैंने ऐसे पार्टी वाले कपड़े पहने जो मैंने काफी समय से नहीं पहने थे, और
जिन्हें मै...
13 घंटे पहले
चार लाइन में चार दिन की जिंदगी का वर्णन अच्छा लगा :'मेरी नई रचना "स्मृति के पन्नों से " पर नजर डालें ,अपनी राय दें.
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