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रविवार, 15 जुलाई 2012

सत्ता का खेल

         सत्ता का खेल

मेरे मोहल्ले में,

कुछ कुत्तों ने,
 अपना कब्ज़ा जमा रखा है
जब भी किसी दूसरे मोहल्ले से,
कोई कुत्ता हमारे मोहल्ले में ,
घुसने की जुर्रत करता है,
ये कुत्ते ,भोंक भोंक कर,
उसके पीछे पड़,उसे खदेड़ देते है
पर जब ,हमारे ही मोहल्ले की,
तीसरी या चौथी मंजिल की गेलरी से,
कोई पालतू कुत्ता भोंकता है,
ये कुत्ते ,सामूहिक रूप से,
गर्दन उठा,उसकी तरफ देख,
कुछ देर तक तो भोंकते रहते है,
पर अंत में,बेबस से बोखलाए हुए,
उस घर के  नीचे की दीवार पर,
एक टांग उठा कर,
मूत कर चले जाते है
अपनी एक छत्र सत्ता को ऐसे ही चलाते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'



शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

मुस्कराना सीख लो

         मुस्कराना सीख लो

जिंदगी में हर ख़ुशी मिल जायेगी,

                        आप थोडा  मुस्कराना  सीख लो
रूठ जाना तो बहुत आसन है,
                      जरा रूठों  को मनाना   सीख लो
जिंदगी  है चार दिन की चांदनी,
                       ढूंढना    अपना ठिकाना  सीख लो
अँधेरे में रास्ते मिल जायेंगे,
                      बस जरा  अटकल लगाना  सीख लो
विफलताएं सिखाती है बहुत कुछ,
                    ठोकरों से  सीख पाना,    सीख लो
सफलता मिल जाये इतराओ नहीं,
                     सफलता को तुम पचाना  सीख लो
कौन जाने ,नज़र कब,किसकी लगे,
                     नम्रता सबको दिखाना सीख लो
बुजुर्गों के पाँव में ही स्वर्ग है,
                     करो सेवा,मेवा पाना सीख लो
सैकड़ों आशिषें हैं बिखरी पड़ी,
                    जरा झुक कर ,तुम उठाना सीख  लो
जिंदगी एक नियामत बन जायेगी,
                    बस सभी का  प्यार पाना  सीख लो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



पति -दो दृष्टिकोण

         पति -दो दृष्टिकोण
      1
पति वो प्राणी है,
जो नहीं होता बीबी का नौकर
क्योंकि नौकर,
कब रहा है किसी का होकर
जरा सी ज्यादा पगार मिली,
दूसरे   का हो जाता है
पति तो प्रेम में अभिभूत,
वो शरीफ बंदा है,
जो उमर भर ,
बीबी के हुकुम बजाता है
          २
भगवान वो शक्ति है
जो इस संसार को चलाये रखती है
हम सबको है इस बात का ज्ञान
कि भावनाओं के भूखे है भगवान
हम भगवान को प्रसाद चढाते है
नाम उनका होता है पर खुद खाते है
वो मिटटी का माधो सा,मूर्ती बना,
 बिराजमान रहता है मंदिर के अन्दर
और सभी काम होते है,
उसका नाम लेकर
पति कि गती भी,
ऐसी ही होती है अक्सर
वो भी मूर्ती बना ,
चुपचाप रहता है घर के अन्दर
और उसकी पत्नी,पुजारन बनी,
उसका नाम लेकर ,
घर  का सब काम काज संभालती है
ठीक हो तो यश खुद लेती है,
गलत हो तो जिम्मेदारी उस पर डालती है
और पति मौन,
सब कुछ सहता जाता है
फिर भी मुस्कराता है
इसीलिये पति को परमेश्वर कहा जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 11 जुलाई 2012

आज फिर मौसम सुहाना हो गया है

आज फिर मौसम सुहाना हो गया है

शुरू तेरा मुस्कराना  हो गया है

आज फिर मौसम सुहाना हो गया है
 जिंदगी बदली है जब से इस गली में,
शुरू तेरा आना जाना हो गया है
तरसती आँखें तेरे दीदार को,
आरजू बस तुझको पाना हो गया है
दिखा कर हुस्नो अदाये, नाज़ से,
काम  बस हमको   सताना हो गया है
अब भी आतिश है हमारे जिगर में,
जिस्म का चूल्हा पुराना हो गया है
बारिशों में भीगता देखा तुम्हे,
बेसबर ये दिल दीवाना हो गया है
ऐसी तडफन बस गयी दिल में मेरे,
हँसे खुलके,एक ज़माना हो गया है
क्या बतायें,आजकल अपना मिजाज़,
कुछ अधिक ही आशिकाना हो गया  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कंसल्टंट(consultant )

 कंसल्टंट(consultant )

जिंदगी की राह   में कुछ लोग,

जब मुश्किलों से घिर जाते है
ठोकर खाते है और गिर जाते है
और फिर उठ कर जब खड़े होते है
उनके पास अनुभव बड़े होते है
मैदाने जंग में गिरने वाले शहसवार
जब फिर से होते है घोड़े पर सवार
अनुभवों की धूल से सन जाते है
और कुछ बने न बने,
कंसल्टंट  जरूर बन जाते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

सोमवार, 9 जुलाई 2012

प्याज और प्यार

          प्याज  और प्यार

प्याज                                      प्यार

आज                                       मेरे यार
कितने ही रसोईघरों में,             जीवन का
कर रहा है राज                          है सच्चा  सार
कितनी ही परतों में,                  दिल की गहराइयों में
छुपा हुआ रहता है                     बसा हुआ रहता है
बाहर सूखा दिखता पर,              उम्र बीत जाने पर भी,
अन्दर ताज़ा रहता है                 सदा जवान रहता है
 अगर काटतें है तो,                  विरह की रातों में,
आंसू भी लाता है                       आंसू बन बहता है
लेकिन वो खाने का,                  जीवन के जीने का,
 स्वाद भी बढाता है                     स्वाद भी बढाता है
दबाये ना दबती,                        छुपाये ना छुपती,
पर इसकी गंध है                       पर इसकी सुगंध है
पर सेहत के लिये,                     प्यार हो जीवन में,
फायदेबंद  है                              आता आनंद है
                   प्याज का आकार
                  दिल के आकार से,
                   कितना मिलता जुलता है
                   प्याज हो या प्यार,
                   दोनों में सचमुच में,
                   कितनी समानता है
 मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
 
  

रविवार, 8 जुलाई 2012

आशा की डोर

        आशा की डोर

आसमां को देखते थे रोज इस उम्मीद से,

          घुमड़ कर बादल घिरें,और छमाछम  बरसात हो
ताकते थे अपनी खिड़की से हम छत पर आपकी,
          दरस पायें आपका और आपसे  कुछ   बात हो
बादलों ने तो हमारी बात ससरी मान ली,
          और वो दिल खोल बरसे,  बरसता है प्यार ज्यूं
हम तरसते  ही रहे पर आपके दीदार को,
          आपने पूरी नहीं की,मगर दिल की आरजू
हो गयी निहाल धरती ,प्यार की बौछार  से,
            सौंधी सौंधी महक से वो गम गमाने लग गयी
और हम मायूस से है,मिलन के सपने लिये,
            बेरुखी ये आपकी  दिल को जलाने  लग गयी
मोर नाचे पंख फैला,बीज  बिकसे खेत में,
            बादलों की बरस से मन सभी का हर्षित  रहा
भीगने को बारिशों में तुम भी छत पर आओगी,
              ये ही सपने सजा छत को देखता  मै नित रहा
और मुझको आज भी है,आस और विश्वास  ये,
              तमन्नायें मेरे दिल की एक दिन रंग लायेगी
बारिशों में आई ना तो  सर्दियों में  आओगी,
               कुनकुनी सी धुप जब छत पर  तुम्हारे छायेगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


    
       
                

बदलते मौसम

 बदलते मौसम

जब ज्यादा गर्मी पड़ती है

तो कितनी मुश्किल बढती है
बार बार बिजली  जाती है
पानी की दिक्कत आती है
और जब आती बारिश ज्यादा
वो भी हमको नहीं सुहाता
सीलन,गीले कपडे, कीचड
और जाने कितनी ही गड़बड़
और जब पड़ती ज्यादा सर्दी
तो मौसम लगता बेदर्दी
तन मन की ठिठुरन बढ़ जाती
गरम धूप है हमें सुहाती
जब भी मौसम कोई बदलता
थोड़े दिन तो अच्छा लगता
लेकिन फिर लगता चुभने
क्यों होता सोचा क्या तुमने?
क्योंकि लालसा जिसकी मन में
जब वो आता है जीवन में
थोड़े दिन तो मन को भाता
लेकिन फिर है जी उकताता
ये तो मानव का स्वभाव है
कुछ दिन रहता बड़ा चाव है
किन्तु चाहता फिर परिवर्तन
स्वाद चाहिये  नूतन,नूतन
प्रकृति काम करे है अपना
ठिठुरन कभी बरसना,तपना
वैसे ही निज काम करें हम
और मौसम से नहीं डरें हम
मौसम तो है आते ,जाते
मज़ा सभी का लो मुस्काते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम

स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम

 एक बार भगवान विष्णु,
 अपने वहां गरुड़ पर बैठ कर,
 शिवजी से मिलने,
पहुंचे पर्वत कैलाश   पर
शिवजी के गले में पड़ा सर्प,
गरुड़ को देख कर,गर्व से फुंकार मारता रहा
तो मन मसोस कर गरुड़ ने कहा
स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम
तेरा मेरा बैर हर कोई जानता है
पर इस समय तू शिवजी के गले में है,
इसलिए फुफकार मार रहा है,
ये तेरे बल की नहीं,स्थान की प्रधानता है
आदमी की पोजीशन,
उसके व्यवहार में,स्पष्ट दिखलाती है
सुहागरात को दुल्हन बनी गधी भी इतराती है
गरीब से गरीब आदमी भी,
जब घोड़ी चढ़ता है,दूल्हा राजा बन जाता है
कुर्सी पर बैठा,छोटा सा जज  भी,
बड़े बड़े लोगों को जेल भिजवाता है
अदना सा ट्रेफिक हवालदार,सड़क के चोराहे पर
बड़े बड़े लोगों की,गाड़ियाँ ,
रोक दिया करता है,हाथ के इशारे पर
बाल जब सर पर उगते है ,
तो कुंतल बन लहराते,सवाँरे जाते है
वो ही बाल,जब गालों पर उगने का दुस्साहस करते है,
रोज रोज शेविंग कर,काट दिए जाते है
बड़े  बड़े अफसर,जब होते कुर्सी पर,
तो उनके आगे ,दफ्तर भर डरता है  
पर घर पर तो उसकी,बॉस उसकी बीबी है,
उसी के इशारों पर ,नाच किया करता है
रौब दिखलाने में,आदमी के रुतबे की,
बड़ी  सहायता होती है
हमेशा देखा है,बल की प्रधानता नहीं,
आदमी की पोजीशन की प्रधानता होती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 7 जुलाई 2012

कुछ परिभाषायें

              कुछ परिभाषायें
                   1
             राष्ट्रपिता      
    ये वो महान आत्मा है,जो राष्ट्र  को बनाता है
    भूखा रहता है,उपवास करता है
    दुश्मनों से लड़ता है,आन्दोलन करता है
राष्ट्र को गुलामी के फंदे से छुड़ाता है
और गोलियां खाकर के,शहीद हो जाता  है
दीवारों पर तस्वीर बन कर बन कर लटक जाता है
या फिर नोटों पर छाप दिया जाता  है
साल में एक दिन छुट्टी दिलाता है और याद किया जाता है
 वो महा पुरुष,राष्ट्रपिता कहलाता है
                     २
           राष्ट्रपति
ये वो निरीह प्राणी है,
जो घर का मुखिया तो कहलाता है
पर सारे फैसले  उसकी बीबी,
याने कि केबिनेट लेती है,
वो तो सिर्फ मोहर लगाता है
पति कि तरह सारे सुख पाता है
पर खुद कुछ  नहीं कर पाता है
पति कि तरह रहता है,
इसलिए राष्ट्र पति कहलाता है
                  ३
   सांसद निधि
ये जनता से करों द्वारा वसूला गया वो धन है,
जो जनता के नुमाइंदो को,
विकास के लिये बांटा  जाता है,
और जिससे वे,पहले अपना ,
फिर अपने    परिवार का विकास करते है,
और बची हुई सारी राशि,
अगले चुनाव में,
जनता को  लुटा दिया करते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'


खंडहर बोलते हैं

     खंडहर बोलते हैं

जब भी मै कोई पुरानी इमारत के ,

खंडहर देखता हूँ,
मेरी कल्पनायें,पर लग कर उड़ने लगती है,
और पहुँच जाती है उस कालखंड में,
जब वो इमारत  बुलंद हुआ करती थी
जब वहां जीवन का संगीत गूंजता था
क्योंकि खंडहर काफी कुछ बोलते है
बस आपको उनकी भाषा की समझ होनी चाहिए
और कल्पना शक्ति होनी चाहिये ये देखने की,
कि आज जहाँ घिसी और उखड़ी हुई फर्श है,
कभी  वहां,गुदगुदे कालीन पर,
किसी के मेंहदी से रचे कोमल पांवों की,
पायल की छनछन सुनाई देती थी
और आज की इन बदरंग दीवारों ने,
जीवन के कितने रंग देखे  होंगें
अगर आपकी कल्पनाशक्ति तेज़ है,
और नज़रें पारखी है,
तो आप इतना कुछ देख सकते हो,
जो किसी ने नहीं देखा होगा
आप जब भी किसी बूढी महिला  को देखें ,
तो कल्पना करें,
कि जवानी के दिनों में,
उनका स्वरूप कैसा रहा होगा
झुर्री वाले गालों में कितनी लुनाई  होगी
ढले हुए तन पर ,कितना कसाव होगा
आज जो वो इतनी गिरी हुई हालत में है,
जवानी में उनने कितनी बिजलियाँ गिराई होगी
और जब आप उनकी जवानी कि तस्वीरों को,
अपने ख्यालों में उभरता हुआ साकार देखेंगे,
सच आपको बड़ा मज़ा आएगा
ये शगल इतना मनभावन होगा,
कि आसानी से वक़्त गुजर जाएगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

काश तुम समझ पाते


काश तुम समझ पाते,
कि जब चुना था तुम्हें,
तो कितना विश्वास था तुमपे,
अच्छा जँचे थे तुम;

बेहतर लगे थे सबसे,
सबसे सच्चे भाते,
बहुत आस था तुमसे,
काश तुम समझ पाते |

थे तो कई,
मैदान में लेकिन,
तेरे ही नाम को,
पसंद किया हमने;

इन बातों पे थोड़ा,
तुम गौर तो फरमाते,
भावनाओं को हमारी,
काश तुम समझ पाते |

यूं सिला दोगे,
यूं रुलाओगे हुमे,
भूल जाओगे सबकुछ,
ये सोचा न था;

चुनाव को हमारे,
तुम सही तो ठहराते,
बहुत खुशी होती हमे,
काश तुम समझ पाते |

चुन करके गए,
फिर दर्शन भी न हुए,
ज्यों जन-प्रतिनिधि नहीं,
ईद का चाँद हो गए;

कभी-कभार तो आते,
बस हाल ले के जाते,
गर्व होता हमको,
काश तुम समझ पाते |

आज हम परेशान हैं,
तरह तरह की समस्याओं से,
हमारे बीच के होके भी,
तुम हमारे न रहे;

हर वोट की कीमत,
ऐ काश तुम चुकाते,
बन जाते महान,
काश तुम समझ पाते |

जन-जन है लाचार,
दो रोटी को तरसते,
और लगे हो तुम,
झोली अपनी भरने में;

निःस्वार्थ होकर थोड़ा,
परमार्थ भी दिखाते,
सच्चा नेता कहलाते,
काश तुम समझ पाते |

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

प्राण प्रिये

वेदना संवेदना निश्चल कपट
को त्याग बढ़ चली हूँ मैं
हर तिमिर की आहटों का पथ
बदल अब ना रुकी हूँ मैं
साथ दो न प्राण लो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

निश्चल हृदय की वेदना को
छुपते हुए क्यों ले चली मैं
प्राण ये चंचल अलौकिक
सोचते तुझको प्रतिदिन
आह विरह का त्यजन कर
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

अपरिमित अजेय का पल
मृदुल मन में ले चली मैं
तुम हो दीपक जलो प्रतिपल
प्रकाश सौरभ बन चलो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

मौन कर हर विपट पनघट
साथ नौका की धार ले चली मैं
मृत्यु की परछाई में सुने हर
पथ की आस ले चली मैं
दूर से ही साथ दो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।
--- दीप्ति शर्मा 

रोबोट बन कर रह गये

      रोबोट बन कर रह गये

चाहते थे मंगायें जापान से रोबोट हम,
                  शादी करली और खुद  रोबोट बन कर रह गये
हम तो थे बाईस केरट, जब से पर हीरा जड़ा,
                चौदह केरट हुए ,बाकी खोट बन कर   रह गये
कभी किशमिश की तरह थे,मधुर ,मीठे, मुलायम,
                एसा   बदला  वक़्त ने, अखरोट  बन कर रह गये
बुदबुदा सकते हैं लेकिन बोल कुछ सकते नहीं,
              किटकिटाते दांतों के संग,  होंठ  बन कर रह गये
गाँधी जी का चित्र है पर आचरण विपरीत है,
               रिश्वतों में देने वाले    ,नोट बन कर  रह गये
आठ दस भ्रष्टों में से ही नेता चुनना है तुम्हे,
               लोकतंत्री व्यवस्था के, वोट बन कर रह गये
कभी टेढ़े,कभी सीधे,कभी चलते ढाई घर,
               बिछी शतरंजी बिसातें,  गोट बन कर रह गये
चाहते थे बनना हम क्या, और 'घोटू' क्या बने,
               टीस देती हमेशा वो चोंट    बन कर  रह गये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     

कौनसा वो तत्व है-जिसमे छुपा अमरत्व है?

      कौनसा वो तत्व है-जिसमे छुपा अमरत्व है?

समंदर में भरा है जल

जल से फिर बनते है बादल
और वो बादल बरस के,
पानी की बूंदों  में झर झर
कभी सींचें ,खेत बगिया
कभी जमता बर्फ बन कर
कभी नदिया बन के बहता,
और फिर बनता समंदर
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता  है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
बना है माटी का ये तन
बड़ा क्षण भंगुर है जीवन
पंच तत्वों से बनी है,
तुम्हारी काया अकिंचन
सांस के डोरी रुकेगी,
जाएगी जब जिंदगी थम
जाके  माटी में मिलेगा,
फिर से माटी जाएगा बन
ये ही जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
 हवायें जीवन भरी है,
सांस बन कर सदा चलती
और कार्बन डाई ओक्साइड
बनी बाहर   निकलती
फिर उसे ये पेड़ ,पौधे,
पुनः ओक्सिजन बनाये
विश्व में हर एक जगह ,
पर सदा रहती हवायें
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा  अमरत्व है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


बुधवार, 4 जुलाई 2012

खोज- भगवान् के कण की

      खोज- भगवान् के कण की

बनायी किसने ये दुनिया, पहाड़,नदिया,समंदर

पेड़ और पौधे   बनाये ,कीट, पक्षी , जानवर 
चाँद तारों से सजाया , प्यारा सा सुन्दर जहाँ
बनाये आदम और हव्वा, उनको फिर लाया यहाँ
और फिर इन दोनों ने आ,गुल खिलाये  नित नये
मिले दोनों  इस तरह ,मिल कर करोड़ों  बन गये
इतना सब कुछ रचा जिसने,शक्ति वो भगवान है
आज उस भगवान के कण ,खोजता इंसान है
समाया  कण कण में जो,जिसके अनेकों वेश है
वो अगोचर है अनश्वर, आत्म भू,अखिलेश है
खोज में जिसकी लगे है,ज्ञानी,ध्यानी,देवता
कोई ढूंढें  काबा में , काशी में  कोई   ढूंढता
करो तुम विस्फोट कितनी कोशिशें  ही रात दिन
उस अनादि ईश्वर का पार पाना  है   कठिन
उसको पाना बड़ा मुश्किल,ढूंढते  रह जाओगे
सच्चे मन से,खुद में झांको,वहीं उसको पाओगे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

मार दी

        मार दी

हुस्नवाले हो गए है ,देखो कितने बेरहम,

              गिराई बिजलियाँ हम पर, नज़र तिरछी मार दी
वो भी थे कुछ में और हम भी थे कुछ सोच में,
               जरा सी गफलत हुई, आपस  में टक्कर   मार दी
 देख उनको आँख फडकी,बंद सी कुछ हो गयी,
                हम पे है आरोप हमने ,  आँख उनको   मार दी
व्यस्त थे हम देखने में ,जलवा उनके हुस्न का,
                 दिलजले ने मौका पा,पाकिट हमारी मार दी
दिखाये थे हमको उनने,सपन सुन्दर,सुहाने,
                  वक़्त कुछ देने का आया ,उनने डंडी मार दी
वोट के बदले में हमको नेताजी ने क्या दिया,
                    दाम चीजों के बढ़ा,   मंहगाई की बस मार दी
बड़ा लम्बा लेक्चर था,और वो भी बेवजह,
                    हमने देखा,हमसे कितनो ने थी झपकी  मार दी
आ रहा था बड़ा आलस,मूड था आराम का,
                     बिमारी के बहाने हमने     भी छुट्टी   मार दी
लोग इतने प्रेक्टिकल हो गये है आजकल,
                     जिसको भी मौका मिला  तो दूसरों की  मार दी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'         

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

चार दिन की चांदनी

         चार दिन की चांदनी

कौन कहता है कि होती चांदनी है चार दिन,

                         और उसके बाद फिर होती अँधेरी रात है
आसमां की तरफ को सर उठा ,देखो तो सही,
                         अमावास को छोड़ कर ,हर रात आता चाँद है
सर्दियों के बाद में चलती है बासंती हवा,
                       और  तपती गर्मियों के    बाद में  बरसात है
वो ही दिख पाता है तुमको,जैसा होता नजरिया,
                      सोच  जो आशा भरा है,  तो सफलता  साथ  है
  देख कर हालात को ,झुकना,  बदलना  गलत है,
                     आदमी वो है कि जो खुद ,बदलता    हालात है
 सच्चे मन से चाह है,कोशिश करो,मिल जाएगा,
                      उस के दर पर ,पूरी होती ,सभी की  फ़रियाद  है
      
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

तेरी रहमत चाहिये

      तेरी रहमत चाहिये

कोई नक़्शे को इमारत में बदलने के लिये,

                     थोड़ी ईंटें,थोडा गारा, थोड़ी मेहनत   चाहिये
चाँद को पाने की मन में हो  कशिश तो मिलेगा,
                     हो बुलंदी हौंसले में,  सच्ची चाहत    चाहिये
खूब सपने देखिये,अच्छा है सपने देखना,
                     सपने पूरे करने को ,करनी कवायत   चाहिये
जिंदगी के इस सफ़र में,आयेंगे रोड़े कई,
                     मन में मंजिल पाने का जज्बा और हिम्मत चाहिये
हँसते हँसते ,जिंदगी ,कट जाएगी आराम से,
                      एक सच्चे हमसफ़र  का संग,सोहबत    चाहिये
जन्म देकर ,पाला पोसा और लायक बनाया,
                     साया हो माँ बाप का सर पर,न जन्नत  चाहिये
खुदा ने बोला कि बन्दे,मांग  ले जो मांगना,
                      मैंने  बोला मिल गया तू, तेरी रहमत    चाहिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 2 जुलाई 2012

तैरना

          तैरना

ये दुनिया,

पानी भरा  तालाब है
इसमें तुम जब उतरते  हो
डूबने लगते हो
पानी में हाथ पैर मारोगे,
तो बदले में पानी भी,
तुम्हे ऊपर की तरफ उछालेगा
और तुम्हारा ये हाथ पैर मारना ही,
तुम्हे डूबने से बचा  लेगा
डर को भगाओगे
तो अपने आप तैरना सीख जाओगे
क्योंकि मुझे,आपको सबको पता है
की मार के आगे भूत भी भागता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

लज्जत

             लज्जत

जो मज़ा शादी के पहले,शादी के पश्चात् क्या
लुत्फ़ भूखे पेट का वो खाना खाने बाद क्या
सौ गुना बेहतर है सन्डे से सटरडे ईवनिग,
जल्दी उठने की फिकर में,सोवो वो भी रात क्या
देती है राहत जो आती, गर्मियों के बाद में,
झड़ी लग करती परेशां, ऐसी भी बरसात क्या
गोलगप्पे का मज़ा,पानी भरो और गटक लो,
देर की और गल गये  तो बचा उनमे  स्वाद क्या
समंदर के सीने से पैदा हो सीधे   भागती,
किनारे पर लहरों का देखा मिलन उन्माद क्या
कभी आइसक्रीम,कुल्फी,दही,रसगुल्ला कभी,
मज़ा दे हर रूप में जो,दूध की  है बात क्या
खाने की लज्जत है असली,लोग कहते उँगलियाँ,
मुंह में घुलता ही न जो रह जाये  फिर वो स्वाद क्या
पकड़ ऊँगली,सीखा चलना,अब दिखाते उँगलियाँ,
साथ में बढती उमर के,  बदलते हालात  क्या

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 1 जुलाई 2012

दूरियाँ

दूरियां हमेशा दर्द ही नहीं देती, 
कभी कभी खुशनुमा एहसास भी कराती है ये दूरियां; 
दूरियां हमेशा रिश्तों को नहीं तोडती, 
अक्सर टूटते रिश्तों को भी मजबूत कराती है ये दूरियां | 

दूरियाँ हमेशा नफरत ही नहीं फैलाती, 
कभी कभी अनुपम प्रेम की अनुभूति भी कराती है ये दूरियाँ; 
दूरियाँ हमेशा फासले ही नहीं बढ़ाती, 
कभी कभी दूर हुए दो दिलों को नजदीक भी लाती है ये दूरियाँ | 

दूरियाँ सिर्फ ओझल ही नहीं करती, 
कभी कभी दिल ही दिल मे दीदार भी करती है ये दूरियाँ; 
दूरियों का मतलब सिर्फ जुदाई नहीं "दीप", 
कभी कभी एक अनोखा मिलन भी कराती है ये दूरियाँ | 

शनिवार, 30 जून 2012

शिकायत

       शिकायत

बड़ी बड़ी दावतों में जाना

और जम कर पीना,खाना
तरह तरह के पकवानों का,
लेते लेते स्वाद
आदमी इतना डट कर खा लेता है,
कि खाने पीने के बाद
डकारें लेता है,पेट सहलाता है
घर आते ही बिस्तर पर,
गिरता ,सो जाता  है
ये सच है,दावत खाने के बाद,
आदमी किसी भी काम का नहीं रह जाता है

मदन मोहन बहेती'घोटू'

इतिहास दुहरा रहा है

     इतिहास दुहरा रहा है

केकैयी ने,

अपने बेटे भरत को,
राजगद्दी दिलवाने के लिए,
राम को रास्ते से हटाया
चौदह वर्षों का वनवास दिलवाया
ताकि बारात के राज्याभिषेक में,
कोई आड़े ना आ पाये
सोनिया जी ने,
अपने बेटे राहुल को,
प्रधानमंत्री बनवाने को,
प्रणव को रास्ते से हटाया
उन्हें राष्ट्रपति बनवाया
ताकि राहुल के राज्याभिषेक में,
कोई आड़े ना आ पाये
क्योंकि अगली बार जब भी मौका आता
प्रणव दादा जैसा कद्दावर व्यक्तित्व,
राहुल के रास्ते में आ जाता
वैसे तो और भी कई नेता है
पर कोई कमाई में लगा है
कोई चाटुकार है,
तो कोई आरोपों के दलदल में फंसा है
राहुल को टक्कर देनेवाला कौन बचा है?
प्रणव के राष्ट्रपति बन जाने का रास्ता साफ़ है
देखो दुहरा रहा इतिहास है

 मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

शुक्रवार, 29 जून 2012

लक्ष्य-लक्ष्मी प्राप्ति का

लक्ष्य-लक्ष्मी प्राप्ति का

जो फलों की कामना हो,बीज बोना चाहिये

लक्ष्मी की प्राप्ति का ही,  लक्ष्य होना चाहिये
पीठ कछुवे की तरह से,इस कदर मजबूत हो,
जरुरत पड़ने पे उसको पहाड़ ढोना  चाहिये
लेना पड़ सकती है तुमको,दुश्मनों की भी मदद,
देवता और दानवों सा,  साथ होना  चाहिये
कोई भी जरिया हो चाहे नाग की मथनी बने,
कैसे भी हो ,हमको बस ,सागर बिलौना चाहिये
निकल  सकता है हलाहल,भी सुधा की चाह में
,साथ संकट निवारक  शंकर का होना  चाहिये
उच्च्श्रेवा,एरावत,निकलेगी रम्भा,वारुणी,
छोट मोटे रत्नों का बंटवारा होना चाहिये
लक्ष्मी खुद प्रकट होकर आपको मिल जाएगी,
प्रतीक्षा में धैर्य अपना नहीं खोना  चाहिये
अपने साथी देवताओं को ही अमृत बांटना,
मोहिनी का रूप पर सुन्दर ,सलोना चाहिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मै प्लास्टिक का दाना हूँ

 मै प्लास्टिक का दाना हूँ

मै प्लास्टिक का दाना हूँ

श्वेत वर्ण सुन्दर और मोती सा सुहाना हूँ
समय के एक्सट्रूडर में,
जब जब मै पिघलता  हूँ
अलग अलग सांचों में,
अलग अलग रूपों में,
ढलता,संवरता हूँ
कभी मै कंघा बन,
गौरी क्र नरम नरम,
केशों को सहलाता हूँ
कभी खिलौना बन कर,
रोते हुए बच्चों को,
खुश कर हंसाता हूँ
कभी बाल्टी बन कर,
अपने में पानी भर,
उनको नहलाता हूँ
चाय  का कप  बन कर,
उनके होठों से लग,
कितना सुख पाता हूँ
बेग बना तो सब्जी,
और चीजें घर भर की ,
भर भर के लाता हूँ
और टूट जाने पर,
फेंक दिया जाता या,
बेच दिया जाता हूँ
ये मेरे जीवन का अंत नहीं होता है
बार बार गलता हूँ,
बार बार ही मेरा पुनर्जनम होता है
बार बार नया रूप,
बार बार तिरस्कार
उम्र के साथ साथ,
कमजोरी बार बार
कभी ख़ुशी होती है,
कभी कभी  रोता मन
क्या ये  ही है नियति,
क्या ये ही है जीवन
जगती के  चक्कर का,बस आना जाना हूँ
मै  प्लास्टिक का दाना हूँ

मदन  मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 27 जून 2012

तू इनायत अली

     तू इनायत अली

मेरे मौला तू करता है सबकी भली

तू इनायत अली,तू इनायत  अली
तेरी तारीफ़ के गीत है  गूंजते,
हर गांओं,शहर और मोहल्ले,गली
तू इनायत अली,तू इनायत अली
तू तो नूरजहाँ है,हम खाख है
तू तो अल्लाह है,तू खुदा  पाक है
तेरी रहमत से ही होते दिन रात है
ये जहाँ सारा  तेरी करामात   है
है बड़ी ही अनोखी ये जादूगरी
तू इनायत अली,तू इनायत अली
बीज खेतों में उग कर फसल बनते है
फूल खिलते है,पेड़ों में फल लगते है
सर्दियाँ या गर्मी या  बरसात  है
सारे मौसम बदलना तेरे हाथ है
गिरे पतझड़ में पत्ते,खिले है  कली
तू इनायत अली,तू इनायत अली
ऐसी दुनिया बनायी है तूने खुदा
इतने इंसान है पर सभी है  जुदा
है इतने जनावर,परिंदे   कई
ऐसी कारीगरी देखी  ना कहीं
तूने फूलों में रंगत और खुशबू भरी
तू इनायत अली,तू इनायत  अली
रोज सूरज उगे,बांटता  रौशनी
चांद फैलता रातों में आ चांदनी
टिमटिमाते है तारे,चले  है हवा
हम हैं बन्दे तेरे,तू बड़ा मेहरबां
है तेरे ही इशारों पे दुनियां चली
तू इनायत अली,तू इनायत अली

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

पाती-पिता के नाम

 पाती-पिता के नाम

आज हम जो कुछ भी हैं,ये मेहरबानी आपकी

हमारा किस्सा नहीं ,ये है कहानी आपकी
जिंदगी के इस सफ़र में ,आई जब भी मुश्किलें,
हम गिरे या लडखडाये,उंगली  थामी आपकी
थपथपा कर पीठ इसी हौसला अफजाई की,
जोश दूना भर गयी  ये कदरदानी  आपकी
इस चमन में खिल रहे है,फूल हम जो महकते,
आपका है खाद पानी, बागवानी   आपकी
आपने डाटा ,दुलारा ,सीख दी ,रस्ता  दिखा,
याद है बचपन की सब ,बातें पुरानी आपकी
आपके कारण ही कायम है हमारा ये वजूद,
आपका ही अक्स हैं,हम है निशानी   आपकी
देर से आये हैं लेकिन आये हैं हम तो दुरुस्त,
आपको पहचान पाए,कदर  जानी आपकी
आपका साया हमारे सर पे  बस कायम रहे,
हे खुदा! हो जाए हम पर मेहरबानी  आपकी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

गड्डों से बचो

      गड्डों से बचो

घर से जब निकलो

संभल  कर चलो
सोच समझ कर के,
बाहर पग  धरो
हो सकता है,तुम्हारे पडोसी ने,
अपने फायदे के लिए,
या तुम्हे फ़साने
गड्डे खोद रखें हो,
जिनमे तुम या तुम्हारे बच्चे,
गिर सकते है,जाने,अनजाने
और प्रिंस या माही की तरह,
बन सकते है सिर्फ  अफ़साने
याद रहे,गड्डे खोदना कठिन है,
पर उनमे गिरना बड़ा आसान है
और उनमे से निकलने में,
बड़ी मुश्किल में फंस जाती जान है
क्योंकि एक गड्डे से निकलने के लिए,
पास में दूसरे गड्डे भी खोदने पड़ते है
और आपस में जोड़ने पड़ते है
और इस कार्यवाही में,
इतना समय लग जाता है
कि गड्डे में गिरे आदमीका,
दम ही निकल जाता है
आज खेतों में खुले बोरवेल  है
सड़कों पर खुले मेनहोल  है
नफरत के गड्डे है
 लालच  के गड्डे है
नशीले पदार्थों के गड्डे है
बेईमानी और भ्रष्टाचार के गड्डे है
जरा सी भी असावधानी हुई,
हम इनमे गिर जाते है
मुश्किल से घिर जाते है
इसीलिए कहता हूँ,
घर से जब निकलो
संभल कर चलो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


मंगलवार, 26 जून 2012

ये मेरी कवितायेँ

     ये मेरी कवितायेँ

जो मेरे अंतर को ,हिला हिला देती है

कभी मार देती है,कभी जिला  देती है
कभी रुलाती मुझको और कभी सहलाती
जब मेरी पीडायें,कवितायेँ  बन जाती
मेरे लब मौन और शांत रहा  करते है
आँखों से आंसूं ना,शब्द बहा  करते है
लेखनी दर्दों को,पहनाती जामा  है
सिर्फ चंद लफ्जों में, पीर सब समाना है
उधड़ते रिश्तों को,भावों के धागे से
सुई ले तुरपतें है, पीछे या  आगे से
पत्थर से उर पर है,जमी  काई सी फिसलन
फिसल फिसल कर यादें,कवितायेँ जाती बन
कविता की हर पंक्ति ,कतरन है यादों की
कुछ टूटे सपनो की,कुछ झूंठे   वादों की
जोड़ इसी  कतरन को,बन जाता कम्बल है
एकाकी जीवन का, ये ही तो संबल है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

इतना ही काफी है

   इतना ही काफी है 

बच्चे ,अब बढे हो गये है

अपने पैरों पर खड़े हो गये है
ख़ुशी है ,कुछ बन गये है
गर्व से पर तन गये है
 कभी कभी जब मिलते
लोकलाज या  दिल से
चरण छुवा  करते  है
कमर झुका   लेते है
ये भी क्या कुछ कम है
खुश हो जाते हम है
नम्रता  कुछ  बाकी है
इतना ही काफी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


नाम पर मत जाओ

       नाम पर मत जाओ

सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,

     सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के  जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
    जा न सके सूरज तक, बहुत दूर   है धरती
  इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
        डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
      वजन एक माशा है,पर कहलाता  मनका


मदन मोहन बाहेती'घोटू'    

सोमवार, 25 जून 2012

बूढ़े माँ बाप और बच्चे

   बूढ़े माँ बाप और बच्चे

धरा पर भगवान प्रकटे,कृष्ण के अवतार में

भुलाया माँ बाप का सब प्यार आ  संसार में
यशोदा मैया और बाबा नन्द का दिल तोड़ कर
भुला सब कुछ,गये मथुरा,कृष्ण गोकुल छोड़ कर
राज के और रानियों के,चक्करों में  यूं  फसे
छोड़ कर ,माँ बाप बूढ़े, द्वारिका में  जा बसे
अपने पालक,जन्मदाता ,को भुला एसा  दिया
पलट कर मथुरा न आये,रुख न गोकुल का किया
जब किया भगवान ने, ये चलन है  संसार  का
मोल किसने चुकाया,माँ बाप के उपकार का
खटकने लगते है वो ,आँखों में बन कर किरकिरी
बच्चों को मिल जाती है जब,बीबी,अच्छी नौकरी
छोड़ते माँ बाप बूढों को तडफने   वास्ते
भूल सबको, जीतें है वो सिर्फ अपने  वास्ते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

परेशानी-गर्मी की

       परेशानी-गर्मी की

गर्मियों में इस कदर ,मुश्किल है जीना हो गया

हवायें लू बन गयी, पानी पसीना   हो गया
और डर ने पसीने के,हाल है  एसा  किया
पास भी अब पटखने में,बिदकती है बीबियाँ
बड़ी मनमौजी हुई है, आती जाती  रात दिन
अंखमिचौली खेलती ,बिजली सताती रात दिन
आजकल उतनी हंसीं ,लगती नहीं है  हसीना
चेहरे का मेकअप  बिगाड़े,गाल पर बह पसीना
कम से कम कपडे बदन पर,जिस्म खुल दिखने  लगे
उनको भी ये सुहाता है,हमको भी अच्छा   लगे
गरमियों के दरमियाँ बस फलों का आराम है
लीचियां है,जामुने है,चूंसने  को आम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

संगत का असर

        संगत का असर

सुबह की शीतल हवा,

सूरज का  साथ   पा,
               लू बन, सताती है
संगत के असर से,
आदमी की फितरत भी,
               कितनी बदल जाती है
अलग अलग बादल की,
अलग अलग बूँदें भी,
               मिल कर धरती पर से
साथ साथ रहती है,
नदिया बन बहती है,
               मिलने  समंदर   से
 खेल है किस्मत का,
मगर असर संगत का,
               बड़े रंग दिखता   है
शादी हो जाने पर,
आदमी के जीवन का,
               रुख ही बदल जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

शनिवार, 23 जून 2012

भगवान तू बनिया है

  भगवान तू  बनिया है

इस धरा पर इतने

अवतार लिए  तूने
बनिये के घर अभी तक,
अवतार ना लिया है
भगवान तू बनिया है
जब काम से थके तो
घर पर ना रह सके तो
ये आजकल का फेशन
जाते है हिलस्टेशन
कर पार लम्बी दूरी
शिमला कभी मसूरी
तो ठीक इस तरह से
तंग आके गृह कलह से
ऊबा जो उधारी से
तकड़ी से ,तगारी से
तो हार करके आया
अवतार धर के आया
सच कहा है किसीने
औरों की थालियों में
दिखता अधिक ही घी है
ये बात भी सही है
बनिया तो रह चुका था
उस काम से थका था
बनिया नहीं बना तू
छोड़ी बही,तराजू
और धनुष बाण धारा
या फरसा फिर संभाला
क्षत्रिय बना, ब्रह्मण
बलराम और वामन
था मच्छ कच्छ जलचर
बन कर वाराह थलचर
नरसिंह भी बना पर
तू बन न पाया नभचर
डरता है उल्लूओं से
पत्नी के वाहनों से
कितने ही रूप धारे
पर बनिया  ना बना रे
बदला है रूप केवल,
बनने से होता क्या है
भगवान तू  बनिया है
सच  कह् दूं इस बहाने
जो तू बुरा न माने
चोला भले था झूंठा
बनिया पना ना छूटा
मछली से तेज चंचल
बनिये का गुण ये अव्वल
कछुवे सी पीठ करले
बनिया पहाड़ धरले
थोडा भी ना हिले वो
पर  रत्न जब मिले तो
एक बात तो बता तू
वाराह क्यों बना  बना तू
भू पर न कर लगाया
दांतों से क्यों उठाया
ये ही दिखने केवल
दांतों में है कितना बल
जो चाहे वो चबाले
बनिये सा सब पचा ले
वामन बना तू छोटा
बनिये सरीखा खोटा
क्या कहूं में छली को
ठग ही लिया बली को
छोटा सा पग बढाया
धरती को नाप आया
बनिया उधार  कर दे
दस के हज़ार कर दे
जो धन मिले तो नर है
साक्षात् ईश्वर है
पैसा जो कम जरा रे
तू सिंह सा दहाड़े
नरसिंह स्वरुप है तू
बनिये का रूप है तू
तू कृष्ण बना राजा
तू राम बना राजा
सोने के मृग पे दौड़ा
बनिया पना न छोड़ा
पूँजी पति है बनिये
लक्ष्मी पति है बनिये
ये बात भी सही है
तू लक्ष्मी पति है
मतलब की तू है बनिया
मै झूंठ कह रहा क्या
हर रूप तेरा भगवन,
बनिये के गुण लिया है
भगवान तू बनिया  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 20 जून 2012

नींद

         नींद

बिन बुलाये चली आती,नींद ऐसी मेहमां

किन्तु ये होती नहीं है,हर किसी पे मेहरबां
नरम बिस्तर रेशमी,आना नहीं,ना आयेगी
भरी बस या ट्रेन में भी,आना है,आ जायेगी
जब किसी से प्यार होता,और दिल जाता है जुड़
बड़े लम्बे पंख फैला,नींद फिर जाती है उड़
देखने जिसकी झलक को,तरसते है ये नयन
उन्हें आँखों में बसाती,नींद ला सुन्दर  सपन
बहुत जब बेचैन होता,मन किसी की याद में
नींद भी आती नहीं है,उस विरह की रात में
और मिलन की रात में भी,नींद उड़ जाती कहीं
हो मिलन दो प्रेमियों का,बीच में आती नहीं
उठ  रहा हो ज्वार दिल में,और प्रीतम संग  है
प्रीत के उन मधु क्षणों में,नहीं करती तंग  है
ये थकन की प्रेमिका है,बंद होते ही पलक
एक मुग्धा नायिका सी,चली आती बेझिझक
है बडी बहुमूल्य निद्रा,स्वर्ण के भण्डार  से
आती है तो कहते सोना आ गया है प्यार से
गरीबों की दोस्त,खुशकिस्मत बहुत होते है वो
चैन सोने की नहीं ,पर चैन से   सोते है   वो
अमीरों से मगर इसका बैर है दिन रैन का
पास में सोना  बहुत  पर नहीं सोना चैन का
नींद है चाहत सभी की,दोस्त के मानिंद है
नींद क्या है,क्या बताएं,नींद तो बस  नींद है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'



सज,संवर मत जाओ छत पर

    सज,संवर मत जाओ छत पर

इस तरह तुम सज संवर कर,नहीं जाया करो छत पर

मुग्ध ना हो जाए चंदा ,   देख कर ये  रूप      सुन्दर
है बड़ा आशिक  तबियत,दिखा कर सोलह कलायें
लगे ना कोशिश करने , किस तरह् तुमको रिझाये
और ये सारे सितारे, टिमटिमा  ना आँख   मारे
छेड़खानी लगे करने ,पवन छूकर  अंग सारे
है बहुत बदमाश ये तम,पा तुम्हे छत पर अकेला
लाभ अनुचित ना उठाले  ,और करदे कुछ  झमेला
देख कर कुंतल तुम्हारे,कुढ़े ना दल बादलों के
लाख गुलाबी लब,भ्रमर, गुंजन करें ना पागलों से
समंदर मारे उंछालें ,रात पूनम की समझ कर
इसलिए जाओ न छत पर,रात में तुम सज संवर कर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कल के लिये

     कल के  लिये

आस है कल अगर फल की ,आज पौधे रोंपने है

विरासत के वजीफे,नव पीढ़ियों को   सौंपने  है
मार कर के कुंडली ,कब तलक  बैठे तुम  रहोगे
सभी सत्ता ,सम्पदा,सुख को समेटे  तुम रहोगे
थक गये हो,पक गये हो,हो गये बेहाल से तुम
टपक सकते हो कभी भी,टूट  करके डाल से तुम
छोड़ दो ये सभी बंधन, मोह, माया में भटकना
एक दिन तस्वीर बन,दीवार पर तुमको लटकना
वानप्रस्थी इस उमर में,भूल जाओ  कामनायें
प्यार सब जी भर लुटा दो,बाँट दो   सदभावनाएँ
याद रख्खे पीढियां,कुछ काम एसा  कर दिखाओ
कमाई  कर ली बहुत , अब नाम तुम अपना कमाओ

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

सोमवार, 18 जून 2012

दस्तक मॉनसून की


पड़ चुकी है दस्तक
मॉनसून की यारों;
घटायें हर तरफ अब
घिरने लगी हैं |

हर वर्ग हर शख्स
था इंतज़ार में इसके;
मौसम के कोप से
निजात था पाना |

अमीर थे सोचते 
कि मौसम होगा ठंढा;
ए.सी. नहीं चलेगा
तो बिजली बिल बचेगा |

गरीब था सोचता
कि बारिश जो होगी;
बाल-बच्चे परिवार
कुछ चैन से रहेंगे |

किसान का सर्वस्व तो 
मॉनसून पे ही निर्भर;
जो बारिश न हुई तो
सब कुछ लूट जायेगा |

जो लूटने में लगे हैं
हर माह उनका मॉनसून है;
इन्तजार तो हिस्सा है
बस आम जनता का ही |

बारिश की बूंदें अब
भिगोने है लगी;
प्यास हर किसी की 
है मिटाने में लगी |

झर-झर करती बूंदें
खुशहाल करती जिंदगी;
हर दिल को हर्षाती
दस्तक ये मॉनसून की |

कलम


(मेरी पहली कविता | यह मैंने तब लिखी थी जब मैं आठवीं कक्षा में था| )

कलम शान है हम बच्चों की, छात्रों का हथियार है,
यही कलम दिलवाता सबको, सारा अधिकार है |

है कलम छोटा शस्त्र, पर इसकी शक्ति अपार है,
बड़े-बड़े वीर आगे इसके बन जाते चिड़ीमार हैं |

इसके बल पर मिट सकता जो फैला अनाचार है,
हरेक देश की गरिमा है यह, सबका जीवन सार है |

दीखता है छोटा लेकिन यह शिक्षा का भंडार है,
कलम से तुलना करने पर छोटा पड़ता तलवार है |

मान बचाने को कलम की, हम बिलकुल तैयार हैं,
इससे नाता जोड़ ले प्यारे हो सकता उद्धार है |

शनिवार, 16 जून 2012

शादी की सालगिराह मुबारक हो


'शा'श्वत है इस जग में आपका प्रम,
'दी'पक के समान उज्ज्वल भी है;
'की'मत आँकना है अति दुष्कर,
'सा'मर्थ्य तो इसमे प्रबल ही है ।
'ल'हू के रग-रग में है व्याप्त,
'गि'रि सम हरदम अटल भी है ;
'रा'त्रि के धुप्प तिमिर में भी,
'ह'मेशा चन्द्र सम धवल भी है ।
'मु'मकिन नहीं यह राह बिन आपके,
'बा'तों से सिर्फ कुछ कह नहीं सकता;
'र'हे ये साथ यूँ ही बना हुआ,
'क'लम से ज्यादा कुछ लिख नहीं सकता ।
'हो' ऐसा कि यह दिन यूँ ही हर बार आता रहे ।

इस कविता के प्रत्येक पंक्ति का पहला अक्षर मिलाने पर-"शादी की सालगिराह मुबारक हो" )

(यह कविता हमारी शादी की वर्षगाँठ पर मेरी जीवन साथी 'मानसी' को समर्पित ।)

शुक्रवार, 15 जून 2012

कार्ड का रिकार्ड

कार्ड का रिकार्ड

मेरा परिचय

मेरा आधार कार्ड
मेरी पहचान
मेरा वोटर कार्ड
मेरा धन
मेरा क्रेडिट कार्ड
मेरा ऋण
मेरा डेबिट कार्ड
मेरी पूँजी
मेरा ए टी एम कार्ड
मेरा कम्युनिकेशन
मेरा सिम कार्ड
मेरा जीवन
कार्डों का एक रिकार्ड
प्लेयिंग कार्ड याने ताश के पत्तों का,
बना हुआ एक महल है,
कब तक टिक पायेगा
क्षण भंगुर है,
जाने कब डिस्कार्ड कर दिया जाएगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 14 जून 2012



इंतिहाऐं इश्क की कम नहीं होती
वो अक्सर टूट जाया करती हैं
मुकम्मल सी वो कुछ यादें
बातों के साथ छूट जाया करती हैं
पहलू बदल जाते हैं जिंदगी के
उन तमाम किस्सों को जोड़ते
जुड़ती है तब जब
ये साँसे डूब जाया करती हैं
©दीप्ति शर्मा

बुधवार, 13 जून 2012

कुछ बातें छोड़ आयी हूँ


आज मैं यादें छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ
कुछ खट्टी कुछ मीठी
मुलाक़ातें छोड़ आयी हूँ
चार साल का अनुभव
और वो हँसी मज़ाक़
साथ ले अपने
कुछ पहलुओं को
कुछ वादों को छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ
क्या कहूँ क्या दोस्त बने
किसी ने हँसकर पीठ थपथपाई
तो किसी ने पीठ पीछे
मुँह फेरकर जीभ फिराई
पहचान तो गयी रंग भाव
हर एक शख़्स का
उन रंग भाव के मैं
कुछ कसक छोड़ आयी हूँ
शायद कुछ असर छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ
कुछ को साथ रखने की
हरदम ख़वाहिश है तो
कुछ की कड़वी बातें झेल आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें बुरी लगी किसी की
तो चुप रहना बेहतर समझा
जो चार साल में नहीं बदला
उसे बदलने की चाह छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ
बेहतर तो नहीं कह सकती
अपने हर साल को
गुज़र गया हर लम्हा
रोते गाते हँसते..
बहुत कुछ सोचा था पर
अपने अहसासों के दरमियान
तमन्नाओं के आईने में
धुँधली तस्वीरें छोड़ आयी हूँ
कुछ बातें छोड़ आयी हूँ ।
© दीप्ति शर्मा

दे दो एक सदा


दे दो एक सदा कि अब भी आ जाऊंगा,
लौट के वापस मैं तेरे पास ही आऊंगा;
जख्म जो दिए थे तुने, उन्हें भूल चूका हूँ,
बिना नए जख्म लिए रह कैसे पाऊंगा |

बेवफाई से भी तेरी मुझे मोहब्बत सी है,
चमक तेरी आँखों का फिर वापस लाऊंगा ;
उलाहने भी तेरी लगती हैं एक अदा दिलनशीं, 
उन अदाओं को भूलकर कैसे रह पाऊंगा |

सास का अहसास

 सास का अहसास

मर्दों  के लिए सास का अहसास

होता है बड़ा खास
सास की बोली का मिठास
और उमड़ता प्यार और विश्वास
अपने दामाद
को सास सदा देती है आशीर्वाद
मन में रख कर ये आस
वो जितना सुखी रहेगा
उसकी बेटी को भी उतना ही सुख देगा
और लड़कियों के लिए वो ही सास
बन जाती है गले की फांस
वो कहते है ना,
सास शक्कर की
तो भी टक्कर की
ये कैसा चलन  है
औरत को औरत से ही होती जलन है
और जाने अनजाने
वो बहू को सुनती रहती है ताने
बहू का जादू उसके बेटे पर चल गया है
और उसका बेटा,
उसके हाथ से निकल गया है
एक मुहावरा है,
सास नहीं ना ननदी
बहू फिरे  आनंदी
क्या ये एकल परिवार का चलन
का कारण है,सास बहू की आपसी जलन
माइके का और  ससुराल का ,
अपना अपना ,अलग अलग कल्चर होता है
आपस में एडजस्ट करने पर ,
परिवार सुखी रहता है,वरना रोता है
इसमें क्या शक है
अपने अपने ढंग से जीने का,
हर एक को हक है
सबको थोडा थोडा  एडजस्टमेंट जरूरी है
तभी मिटती दूरी है
माइके और ससुराल की संस्कृतियों में,
होना चाहिए मेल
तभी हंसी ख़ुशी चलती है,
गृहस्थी की  रेल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

हे परमपिता !

       हे परमपिता !
हे परमपिता! मै बीज था,
तूने मुझे माटी दी,
अंकुरित किया,बिकसाया
आँखें दी,कान दिये,
हाथ दिये,पैर दिये,
और चलना सिखलाया
मै जल था,
थोड़ी सी गर्मी पाकर,
वाष्प बनकर उड़ने लगा तो,
तूने ठंडक देकर फिर  से जल बना दिया
मुझ पर जब दुःख के बादल छाये ,
तूने मेरे दुखों को,
आंसू की बूँदें बना,बहा दिया
पीड़ाओं ने जब जब मुझे,
बरफ सा जड़ बनाया
तूने मुझे ,अपने प्यार की उष्मा से पिघलाया
अच्छे और बुरे का,
कडवे और मीठे का,
सच्चे और झूंठे का,
भेद करना सिखलाया
हे प्रभू!मै क्या क्या बतलाऊ ,
तूने मेरे लिए क्या क्या करा है
पर ये स्वार्थ,दंभ और अहम्,
ये सब भी तो तूने ही मुझमे भरा है
और जब मुझे सफलता और खुशियाँ मिलती है,
मै अपने आप पर इतराता हूँ
या तो तुझे भूल  जाता हूँ,
या फिर पांच रुपयों का प्रसाद चढ़ाता हूँ
मै भी कितना मूरख हूँ,
तुझे पांच रुपयों का लालीपाप देकर,
बच्चों की तरह बहलाने की कोशिश करता हूँ
कितना नाशुक्रा हूँ,नादान हूँ,
मेरी गलतियों के लिए,
मुझे माफ़ कर देना ,
मै तेरा बच्चा हूँ,
तुझे सच्चे दिल से प्यार करता हूँ
जीवन पथ पर ,जब भी मै भटका हूँ,
तूने ही तो आकर,
मेरी ऊंगली थामी है 
तू मेरा सर्जक है,
तू मेरा पोषक है,
मेरे अंतर में बसा हुआ,
तू अंतरयामी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

आज एसा क्या हुआ है

आज एसा  क्या हुआ है

आज  एसा  क्या हुआ है, मन मचलने लग गया है


आपने तिरछी नज़र से ,सिर्फ  देखा  भर हमें  है

उठ रहा क्यों ज्वार दिल में,बढ़ गयी क्यों धड़कने है
बिजलियाँ ऐसी गिरी है,   आग तन में लग गयी है
प्रीत के उस मधु मिलन की,आस मन में जग गयी है
बहुत ही बेचेन है मन ,  बदन जलने लग गया है
आज एसा क्या हुआ है ,मन मचलने लग गया  है
कर गयी है हाल एसा,जब मधुर चितवन तुम्हारी
गज़ब कितना ढायेगी फिर,रेशमी छूवन  तुम्हारी
रस भरे लब ,मधुर चुम्बन दे ,मचा उत्पात देंगे
थिरकता तन,सांस के स्वर,जुगल बंदी,साथ देंगे
नयन में ,मादक पलों का,सपन पलने लग गया है
आज एसा क्या हुआ है. मन मचलने लग गया  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुढ़ापे में

बुढ़ापे में

बताएं आपको क्या बात है बुढ़ापे में

बिगड़ जाते बहुत हालात है बुढ़ापे में
    नींद आती ही नहीं,आई,उचट   जाती है
    पुरानी बातें कई दिल में उभर  आती है
बड़ी रुक रुक के ,बड़ी देर तलक आती है,
पुरानी यादें और पेशाब है  बुढ़ापे में
    मिनिट मिनिट में सारी ताज़ी बात भूलें  है
    जरा भी चल लो तो जल्दी से सांस फूले  है
कभी घुटनों में दरद ,कभी कमर दुखती है,
होती हालत बड़ी खराब है     बुढ़ापे में
    खाने पीने के हम शौक़ीन तबियत वाले
    जी तो करता है बहुत,खा लें ये या वो खालें
बहुत पाबंदियां है डाक्टर की खाने पर,
पेट भी देता नहीं साथ है  बुढ़ापे में
    दिल तो ये दिल है यूं ही मचल मचल जाता है
    आशिकाना मिजाज़,छूट  कहाँ  पाता   है
मन तो करता है बहुत कूदने उछलने को,
हो नहीं पाते ये उत्पात  हैं बुढ़ापे   में
      देखिये टी वी या फिर चाटिये अखबार सभी
       भूले भटके से बच्चे पूछतें  है  हाल कभी
कभी देखे थे जवानी में ले के बच्चों को,
टूट जाते सभी वो ख्वाब है   बुढ़ापे में
बताएं आपको क्या बात है बुढ़ापे में
बिगड़ जाते बहुत हालात है  बुढ़ापे में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

      
 
   

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