नाम पर मत जाओ
सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,
सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
जा न सके सूरज तक, बहुत दूर है धरती
इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
वजन एक माशा है,पर कहलाता मनका
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
तेरा-मेरा भेद हुआ कब
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तेरा-मेरा भेद हुआ कब तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी तू सूरज मैं किरण
सुनहरी, तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि ! तू
व्यापक, मैं तेर...
21 घंटे पहले
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