मै और मेरी मुनिया
तुम कहते हो बड़े गर्व से ,
मै अच्छा और मेरी मुनिया
कोई की परवाह नहीं है ,
कैसे,क्या कर लेगी दुनिया
पैसा नहीं सभी कुछ जग में ,
ना आटा ,या मिर्ची ,धनिया
सबका अपना अपना जीवन,
राजा ,रंक ,पुजारी,बनिया
कोई भीड़ में नहीं सुनेगा,
रहो बजाते,तुम टुनटुनिया
उतने दिन अंधियारा रहता ,
जितने दिन रहती चांदनियां
तन रुई फोहे सा बिखरे ,
धुनकी जब धुनकेगा धुनिया
ये मुनिया भी साथ न देगी,
जिस दिन तुम छोड़ोगे दुनिया
मदन मोहन बहेती'घोटू'
1521-शिक्षक- दिवस की पीड़ा
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*डॉ.** पूनम चौधरी*
*पूरे साल तौली जाती है उसकी निष्ठा**,*
*परखी जाती है उसकी ईमानदारी**,*
*हर रोज़ नई कसौटी पर*
*कसी जाती है उसकी नीयत।*
*फिर पाँच...
2 दिन पहले
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (02-03-2013) के चर्चा मंच 1172 पर भी होगी. सूचनार्थ
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना |
जवाब देंहटाएंलाजवाब प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
जवाब देंहटाएंaap sabka bahut bahut dhanywaad
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