नशा -बुढ़ापे का
आदमी पर जब नशा छाता है
वो ठीक से चल भी नहीं सकता ,
डगमगाता है
उसे कुछ भी याद नहीं रहता ,
सब कुछ भूल जाता है
मेरी माँ भी ठीक से चल नहीं सकती ,
डगमगाती है
और मिनिट मिनिट में ,
सारी बातें भूल जाती है ,
नशे के सारे निशां उसमे नज़र आते है,
उमर नब्बे की में भी ऐसा भला होता है
मुझे तो ऐसा कुछ लगता है कि मेरे यारों ,
बुढापे का भी कोई ,अपना नशा होता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मृत्यु के उस अंधकार से
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मृत्यु के उस अंधकार से जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं तीनों गुणों को करें
सक्रिय, घोर विनाश की महारात्रि भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !काल नहीं ठहरता
उनमें म...
23 घंटे पहले
बहुत ही सुन्दर पद,आभार.
जवाब देंहटाएंहर उम्र का अपना एक नशा होता है ...
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ...