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बुधवार, 9 सितंबर 2020

समझौता -बुढ़ापे में

अब तुझको छोड़ बुढ़ापे में ,जाऊं किस पास ,बता तू ही
इस बढ़ी उमर में कौन मुझे ,डालेगा घास ,बता तू ही
क्या हुआ रही ना घास हरी ,सूखी तो है पर स्वाद भरी
वह भी चरने न मुझे देती ,भूखा रखती है  ,सता यूं ही
ये बात भले सच है तेरी ,है उमर जुगाली की मेरी ,
सोचा न कभी था ,दूर मुझे ,कर दोगी ,दिखा ,धता यूं ही
मैं कमल पुष्प कुम्हलाया सही,तुम भी जूही की कली न रही
आइना देखो ,हालत का ,लग तुम्हे जाएगा ,पता यूं ही
देखो अब जीना ना मुमकिन ,मैं तुम्हारे तुम मेरे बिन ,
क्यों व्यर्थ झगड़ते ,एक दूजे पर ,हम अहसान जता यूं ही
मैं अब भी प्यार भरा सागर ,अमृत छलकाती तुम गागर ,
कल कल कल कर तू बहने दे ,इस जीवन की सरिता यूं ही
ना मुझे मिलेगी और कोई ,ना तुझे मिलेगा और कोई ,
बरसायें प्यार भूल जाएँ ,आपस में हुई खता यूं ही

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

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