माटी की महक-ऊँचाइयों की कसक
पहली पहली बारिश पर ,
माटी की सोंधी सोंधी महक
फुदकते पंछियों का कलरव,चहक
भंवरों का गुंजन
तितलियों का नर्तन
आम्र तरु पर विकसे बौरों की खुशबू
कोकिला की कुहू.कुहू
खिलती कलियाँ,महकते पुष्प
हरी घांस पर बिखरे शबनम के मोती,
या दालान में पसरी,कुनकुनी धूप
कितना कुछ देखने को मिलता था
जब मै जमीन से जुड़ा था
अब मै एक अट्टालिका में बस गया हूँ,
जमीन से बहुत ऊपर,धरा से दूर
ऊपर से अपने लोग भी बोने से ,
रेंगते नज़र आते है,मजबूर
अब ठंडी बयार भी नहीं सहलाती है
हवाये सनसनाती,सीटियाँ बजाती है
अब सूरज को लेटने के लिए दालान भी नहीं है,
वो तो बस आता है
और खिड़की से झांक कर चला जाता है
कई बार सोचता हूँ,
जमीन से इतना ऊंचा उठ कर भी,
मेरे मन में कितनी कसक है
मैंने कितना कुछ खोया है,
न भंवरों का गुंजन है,न माटी की महक है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
युवा और नए वकीलों के लिए अनिवार्य पोस्ट-एनरोलमेंट ट्रेनिंग
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद देश के
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1 दिन पहले
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