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सोमवार, 21 जनवरी 2019

क्यों ?


मुझे याद है वह दिन ,

जब तुमने ,

मेरी नाजुक सी पतली  ऊँगली में,

सगाई की अंगूठी पहनाई थी ,

और मेरे कोमल से हाथों को ,

धीरे से दबाया था

प्यार से दुलराया था

और फिर एक दिन ,

मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर ,

पवित्र अग्नि की साक्षी में ,

अपना जीवनसाथी बनाया था

सुख दुःख में साथ निभाने का वादा था किया

पर शादी के बाद ,घर बसाते ही,

मेरी उन नाजुक उँगलियों को,

आटा गूंथने में लगा दिया

रोटी बेलने के लिए ,बेलन थमा दिया

गरम गरम तवे पर ,

रोटियां सेकते सेकते ,

कितनी ही बार ,इन नाजुक उँगलियों ने ,

तवे की विभीषिका झेली है

तुम्हारे प्यार के परशाद से ,

मेरी कमसिन सी काया ,

देखलो कितनी फैली है

जिस तरह आजकल ,

मेरी मोटी हुई अँगुलियों में ,

सगाई की अंगूठी नहीं आती

उस तरह तुम्हारे प्यार में भी,

वो पुरानी ताजगी नहीं पायी जाती

हमारा प्यार ,

एक दैनिक प्रक्रिया बन कर ,रह गया है

कुछ भी नहीं नया है

क्या हमारा गठबंधन ,

कुछ इतना ढीला था ,

दो दिन में खुल गया

क्या हमारा प्यार ,

शादी  की मेंहदी सा था ,

चार दिन रचा ,फिर धुल  गया

तुम भी वही हो ,मै  भी वही हूँ ,

बताओ ना फिर क्या बदल गया है

हमे साथ साथ रहते हो गए है बरसों

फिर ऐसा हो रहा है क्यों ?


मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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