अभी मुझे जीना है
जीवन की आपाधापी में इतना रहा फंसा मुझे याद नहीं पिछली बार मैं कब जी खोलकर था हंसा
कई बार मित्रों की महफिल में हंसने का प्रसंग आया
लेकिन मैं खुल कर हंस नहीं पाया
हंसा भी तो मेरी हंसी खोखली थी
अपने मुख पर एक नकली मुस्कान ओढ़ ली थी
ठहाकों वाला आनंद नहीं था
दबी दबी हंसी हंसना मुझे पसंद नहीं था
फिर भी मैं मुस्कराता रहा
भले ही कई परेशानी उठाता रहा
मुसीबतों से टक्कर लेना मेरी फितरत में है
फिर भी नहीं झुकना मेरी आदत में है अच्छे बुरे दिन तो आते जाते रहते हैं आपकी परीक्षा लेते हैं, आपके धीरज को आजमाते रहते हैं
मैं कितनी ही परीक्षाएं दे चुका हूं मुसीबतों से टक्कर ले चुका हूं
पर अबकी बार लगता है कि मैं थोड़ा पस्त होने लगा हूं
अपना धीरज खोने लगा हूं
नहीं नहीं मैं तो ऐसी मिट्टी का बना ही नहीं हूं
ऐसी माता का जना ही नहीं हूं
जो इतनी जल्दी हौसले होने लगे
अपना धीरज खो दे, रोने लगे
मुझे इन सब को रोकना होगा
अपने आप में नहीं फुर्ती से मैदान में झोंकना होगा
मैं लडूंगा ,आने वाली हर मुसीबत से लडूंगा
किसी के पैर नहीं पड़ूंगा
हिम्मत और जोश से आगे बढ़ना है
तरक्की की सीढ़ियों पर चढ़ना है
किसीकी मेहरबानी पर नहीं, अपने बल बूते जीना है
सुख का अमृत पीना है
अब हँसूंगा तो दिल से ठहाके मार कर हँसूंगा
बुढ़ापे को जीवन का स्वर्णिम काल बना दूंगा
मुझे अपना बाकी जीवन बिताना मौज मस्ती और आराम से
जीना है तो शान से ,मरना है तो शान से
मदन मोहन बाहेती घोटू
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