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गुरुवार, 3 मार्च 2022

जवानी फिर से आई है 

पतझड़ में बासंती छवि देती दिखलाई है
जवानी फिर से आई है 
 
थका थका हारा ये तन तो थोड़ा ढीला है 
देख फागुनी रंग हुआ पर यह रंगीला है 
मदमाते मौसम ने में ऐसा जादू डाला है 
खिलती कलियां देख होगया मन मतवाला है  
झुर्राए चेहरे पर फिर से छाई लुनाई है 
जवानी फिर से आई है 

स्वर्णिम आभा होती है जब सूर्य निकलता है 
फिर सोने का गोला लगता ,जब वह ढलता है 
तप्त सूर्य के प्रखर ताप को हमने झेला है 
नहीं बुढ़ापा ,आई उम्र की स्वर्णिम बेला है  
छाई सफेदी ,जीवन की अनमोल कमाई है  
जवानी फिर से आई है 
 
 जीवन भर मेहनत कर अपना फर्ज निभाया है 
 अब खुद के खातिर जीने का मौका आया है  
 जैसे-जैसे उमर मेहरबां होती जाती है 
 दिल की बस्ती जवां दिनोंदिन होती जाती है 
 दूध बहुत उफना अब जाकर के जमी मलाई है 
 जवानी फिर से आई है

मदन मोहन बाहेती घोटू 

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