पते की बात
जिव्हा
नहीं होती कोई हड्डी जीभ में ,
पर हिल कितने ही दिल तोड़ दिया करती है
वही जीभ जब तलुवे से मिल कहती 'सोरी',
टूटे हुए दिलों को जोड़ दिया करती है
घोटू
सत्तरवाँ साल
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*पहले उतरी बालों में चाँदी *
*और फिर उखड़े दो-चार दाँत *
*दुख-सुख की आड़ी-तिरछी सी ,*
*चेहरे पे उतरीं लकीरें तमाम *
*हथेलियों पर उभरीं नीली-नीली नसे...
50 मिनट पहले
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