पते की बात
शतरंज
अपने पद और ओहदे पर ,कभी इतराओ नहीं,
बिछी है सारी बिसातें,जिंदगी शतरंज है
कौन राजा,कौन प्यादा ,खेल जब होता ख़तम ,
सभी मोहरे ,एक ही डब्बे में होते बंद है
घोटू
सत्तरवाँ साल
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*पहले उतरी बालों में चाँदी *
*और फिर उखड़े दो-चार दाँत *
*दुख-सुख की आड़ी-तिरछी सी ,*
*चेहरे पे उतरीं लकीरें तमाम *
*हथेलियों पर उभरीं नीली-नीली नसे...
49 मिनट पहले
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