मंथरा
जो लोग अपना भला बुरा नहीं समझते
आँख मूँद कर, दूसरों की सलाह पर है चलते
उन पर मुसीबत आती ही आती है
बुद्धि भ्रष्ट करने के लिए ,हर केकैयी को ,
कोई ना कोई मंथरा मिल ही जाती है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सत्तरवाँ साल
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*पहले उतरी बालों में चाँदी *
*और फिर उखड़े दो-चार दाँत *
*दुख-सुख की आड़ी-तिरछी सी ,*
*चेहरे पे उतरीं लकीरें तमाम *
*हथेलियों पर उभरीं नीली-नीली नसे...
50 मिनट पहले
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