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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

आओ फिर लड़ लें,झगड़ लें 

बहुत दिन से तुम न रूठी ,
और ना मैंने मनाया 
फेर कर मुंह नहीं सोये,
एक दूजे को रुलाया 
देर तक भूखी रही तुम,
और मैं भी न खाया 
फिर सुलह के बाद वाला ,
नहीं सुख हमने उठाया 
रूठने का, मनाने का ,
बहाना हम कोई गढ़ ले 
आओ फिर लड़ लें,झगड़ ले 

चलो फिर से याद कर ले ,
उम्र वह जब थी जवानी 
दिन सुनहरे हुआ करते, 
और रातें थी सुहानी 
पागलों सा प्यार था पर ,
एक दूजे की न मानी 
चाहते ना चाहते भी ,
हुआ करती खींचातानी 
हुई अनबन रहे कुछ क्षण,
राह कुछ ऐसी पकड़ ले 
आओ फिर लड़लें ,झगड़लें 

सिर्फ मीठा और मीठा ,
खाने से मन है उचटता 
बीच में नमकीन कोई ,
चटपटा है स्वाद लगता 
इस तरह ही प्यार में जो ,
झगड़े का तड़का न लगता 
तो मनाने बाद फिर से ,
मिलन का सुख ना निखरता 
रुखे सूखे होठों पर वह ,
मिलन चुंबन पुनः जड़ लें 
आओ फिर लड़लें, झगड़लें 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

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