एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

मंगलवार, 20 मार्च 2012

कंधमाल में हैं फंसे, इतालवी --

इटली से मेहमान, अगर फुफ्फू घर आये-

कंधमाल में हैं फंसे, इतालवी दो लोग ।
नक्सल के बन्धक बने, रहे अवज्ञा भोग ।

रहे अवज्ञा भोग, जान सांसत में सबकी ।
बड़ा भयंकर रोग, करे क्या सत्ता अबकी ।

इटली से मेहमान, अगर फुफ्फू घर आये ।
प्रिये भतीजे बोल, दिमगवा क्यों ना लाये ।।

सोमवार, 19 मार्च 2012

अनुभूतियाँ

            अनुभूतियाँ
रोज सुबह सुबह,जब मै घूमने जाता हूँ,
कितने ही दृश्य देख कर,
तरह तरह की अनुभूतियाँ पाता हूँ
जब देखता हूँ कुछ मेहतर,
हाथों में झाड़ू लेकर,
सड़क को बुहारते हुए,सफाई करते है
तो मुझे याद आ जाते है वो नेता,
जिनका हम चुनाव करते है
स्वच्छ और साफ़ ,प्रशासन के लिए
मंहगाई और गरीबी को बुहारने के लिए
लेकिन वो देश की सम्पदा को बुहारकर
भर रहें है ,अपनी स्विस बेंक का लॉकर
मै देखता हूँ छोटे छोटे बच्चे,
अपने नाज़ुक से कन्धों पर,
ढेर  सारा बोझा लटकाए
उनींदीं पलकें,अलसाये
तेजी से भागते है,
जब स्कूल की बस आती है
और साथ में उनकी माँ,
उनके मुंह में सेंडविच ठूंसती हुई,
उनके साथ साथ जाती है
मुझे इस दृश्य में,माँ की ममता,
और देश के भविष्य की ,
एक जिम्मेदार पीढ़ी पलती नज़र आती है
मुझे दिखती है एक महिला,
तीन तीन श्वानो को
एक साथ साधती हुई,घुमाती है
मुझे महाभारत कालीन,
एक साथ पांच पतियों को निभाती हुई,
द्रोपदी की याद आती है
मुझे नज़र आते है,
लाफिंग क्लब में,
ठहाका मार कर हँसते हुए कुछ लोग
मै सोचता हूँ,
इस कमरतोड़ मंहगाई ने,
जब सब के चेहरे से छीन ली है मुस्कान
हर आदमी है दुखी और परेशान
तो ये चंद लोग
क्यों करते है हंसने का ढोंग
फिर सोचता हूँ कि आज कि जिंदगी में,
जब सब कुछ ही फीका है
मन  को बहलाने का ये अच्छा तरीका है
मै भी यही सोच कर मुस्कराता हूँ
जब मै रोज,सुबह सुबह घूमने जाता हूँ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 


 

अखबार पढने का मज़ा ही कुछ और है

     अखबार पढने का मज़ा ही कुछ और है

मैंने अपने मित्र से बोला यार

टी वी की कितनी ही चेनले,
चैन नहीं लेने देती,
दिन रात,बार बार,
सुनाती रहती है सारे समाचार
ख़बरें तो वो की वो ही होती है,
फिर तुम फ़ालतू में,
क्यों खरीदते हो अखबार
मित्र ने मुस्का कर
दिया ये उत्तर,
आप अपनी पत्नी को,
आते,जाते,पकाते,खिलाते,
दिन में देखते हो कितनी ही बार
मगर मेरे यार,
जिस तरह बीबी को बाँहों में लेकर,
नज़रे मिला कर ,
और उसकी खुशबू पाकर,
प्यार करने का मज़ा ही कुछ और है
वैसे ही सुबह सुबह,
सौंधी सौंधी खुशबू वाले अखबार को,
हाथों में लेकर और उस पर नज़रें गढ़ा कर,
उसके पन्ने पलटने,
और ध्यान से पढने का मज़ा ही कुछ और है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

खामोश चाहत

मैं छूना चाहता हूँ ,
तुम्हें ,
कुछ इस तरह कि,
छूने का अहसास ,
भी होने पायें तुम्हें ,
क्योंकि , तुम मेरी खामोश चाहत का ,
मंदिर हो ,
मेरी चाहत का भूले से भी ,
अहसास ना करना ,
क्योंकि ये अहसास ,
तुम्हें चुभन और तड़पन देगा ,
और मैं तुम्हें तडपाना तो नहीं चाहता ,
मैं तो बस चाहते ही रहना ,
चाहता हूँ तुम्हें ,
तुम्हें अपनी चाहत का अहसास ,
दिलाये बिना ,
और मैंने अपनी इसी चाहत को ,
खामोश चाहत ,
का नाम दिया है .

विनोद भगत

रविवार, 18 मार्च 2012

जियो जील के जाल, टिप्पणी फिर से खोलो

हुवे समर्थक पाँच सौ, दिव्या दिव्य कमाल ।

My Photo
हुवे समर्थक पाँच सौ, दिव्या दिव्य कमाल । 
बढे चढ़े उत्साह नित, जियो जील के जाल ।

जियो जील के जाल, टिप्पणी फिर से खोलो ।
रहा सभी को साल, साल में सम्मुख बोलो ।

होय ईर्ष्या मोय, बताओ औषधि डाक्टर ।
शतक समर्थक पूर,  करे कैसे यह रविकर ।।

शनिवार, 17 मार्च 2012

जीते जो तेदुलकर, जो मारे सो मीर -

मेरे भारत रत्न, नई खुशियाँ नित पाओ --

जीते जो तेदुलकर, जो मारे सो मीर ।
शतक मीरपुर में लगा, कब से सभी अधीर ।
 
Sachin Tendulkar celebrates after he scored his 100th international century during their Asia Cup one- day international.
कब से सभी अधीर, बजट ने बहुत रुलाया ।
सही समय पर शतक, सचिन ने धैर्य बंधाया ।
 
मेरे भारत रत्न, नई खुशियाँ नित पाओ ।
रहो हमेशा स्वस्थ, सदा भारत हरसाओ ।। 

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

सौवाँ शतक

               सौवाँ   शतक
सचिन,बधाई ढेरों तुमको,तुमने सौवाँ शतक लगाया
हम सब खेलप्रेमियों  का था,जो सपना ,सच कर दिखलाया
बहुत दिनों से आस लगी थी,तुम शतकों का शतक लगाओ
करो नाम भारत का रोशन, एसा करतब कर दिखलाओ
सुबह प्रणव दादा ने हमको,मंहगाई का डोज़  पिलाया
सबका मुंह कड़वा कर डाला, एसा मुश्किल बजट सुनाया
मंहगाई से त्रस्त सभी को ,दिए बजट ने खारे  आंसू
लेकिन तुमने शतक लगाके,खिला दिए जैसे सौ लड्डू
मुंह का स्वाद हो गया मीठा,भूल गए हम सब कडवापन
तुम्हारे इस महा शतक ने,जीत लिया है हम सबका मन
तुम क्रिकेट के 'महादेव' हो,तुम गौरव भारत माता के
सच्चे 'भारत रत्न'तुम्ही हो,देश धन्य तुम सा सुत पा के
सचिन ,बधाई तुमको ढेरों,तुमने सौवाँ  शतक बनाया
हम सब खेलप्रेमियों का था,जो सपना,सच कर दिखलाया

मदन मोहन बहेती'घोटू'

गुरुवार, 15 मार्च 2012

ये न समझना कि मै तुमसे डरता हूँ

ये न समझना कि मै तुमसे डरता हूँ

ये न समझना की मै तुमसे डरता हूँ

मै तो तुमसे प्यार ढेर सा करता हूँ
  बात मानता हूँ मै जब भी तुम्हारी
तुम होती हो मुदित,निखरती छवि प्यारी
वही विजय मुस्कान देखने  चेहरे पर,
जो तुम कहती हो  बस वो ही करता हूँ
ये  न समझना कि मै तुमसे डरता  हूँ
तुम जो कुछ भी,कच्चा पका खिलाती हो
मै तारीफ़ करूं,तो तुम सुख पाती हो
'वह मज़ा आ गया'इसलिए कहता हूँ,
खिली तुम्हारी बाँछों पर मै मरता हूँ
ये न समझना कि मै तुमसे डरता हूँ
कभी सामने आती जब तुम सज धज कर
और पूछती'लगती हूँ ना मै  सुन्दर'
मै तुम्हारे गालों पर चुम्बन देकर,
तुम्हारा सौन्दर्य चोगुना  करता हूँ
ये न समझना  कि मै तुमसे डरता हूँ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 14 मार्च 2012

फरमाईश

फरमाईश
(बजट के पहले या बाद,महंगाई कितनी भी बढे,
एक चीज जिससे हर पति को रूबरू होना पड़ता है,
वो है पत्नी जी की फरमाईशे-ये ऐसी चीज है ,जिसपर
उम्र का कोई बंधन नहीं-नीचे लिखी कविता शायद
आप में से कुछ समझदार बीबियों के पतियों को,
इस फरमाईश  की बिमारी से निजात दिलवा दे,
तो अपने इस छोटे से प्रयास को सफल मानूंगा )


फरमाइश
तुमने जब जब भी पहने
सुंदर कपडे ,सुंदर गहने
और सझधज कर तैयार हुई
तुम खिलती हुई बहार हुई
देखा करते श्रृंगार  तुम्हे
मन मचला करने प्यार तुम्हे
मैं लेकर तुमको बाँहों में
उड़ चला प्यार की राहों में
जब मन में था तूफ़ान उठा
तो तन का सब श्रंगार हटा
ना  वस्त्र रहे तन पर पहने
बिखरे सब इधर उधर गहने
फैला काजल, फैली लाली
बिखरी सब जुल्फे मतवाली
जिनने कि  मुझे लुभाया था
कुछ करने को उकसाया था
जब बात प्यार की आती है
सारी  चीजे हट जाती है
तन की नेसर्गिक सुन्दरता
पाकर ही है ये मन भरता
तो क्यों गहनों की ख्वाहिश है
और कपड़ो की फरमाइश है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू





मंगलवार, 13 मार्च 2012

राज-पत्नी के 'ना'ना'कहने का

  राज-पत्नी के 'ना'ना'कहने का
  ----------------------------------
मैंने  पत्नीजी से पूछा,एक बात मुझको बतलाना
मै तुमसे जब भी कुछ कहता,तुम बस कहती हो 'ना'ना'ना
और फिर 'ना'ना' कहते कहते,बातें सभी मान लेती हो
मेरी हर एक चाह,मांग में,तुम सहयोग पूर्ण  देती हो
अक्सर लोग कहा करते है,सबके संग एसा होता है
औरत जब भी' ना 'करती है,उसका मतलब'हाँ'होता है
पत्नीजी बोली यूं हंस कर,तुम कितने भोले हो सजना
मुझको भी अच्छा लगता है,तुम्हे रिझाना,और संवरना
तुम्हे सताना,तुम्हे मनाना,और तुम्हारे  खातिर सजना
मुझे सुहाता,मन को भाता,संग तुम्हारे,सोना,जगना
अच्छा खाना,पका खिलाना,लटके,झटके ,सब दिखलाना
मीठी मीठी बात बनाना,और दीवाना,तुम्हे बनाना
मेरी चाहत की सब चीजे,अच्छा खाना और पहनना
गाना  और बतियाना,या फिर सोने का सुन्दर सा गहना
इन सब में भी तो होती 'ना',इसीलिए मै कहती 'ना'ना'
समझदार को सिर्फ इशारा ही काफी है,समझ गये ना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 12 मार्च 2012

सुनो भागवत है क्या कहती

(पत्नी जी  जब सोने के गहने की जिद करे,ये कविता आपका

संबल बन सकती है- शुभकामनाओं  सहित-'घोटू')
मुझे दिला दो,स्वर्णाभूषण,तुम हरदम जिद करती रहती
                                       सुनो ,भागवत है क्या कहती
कलयुग आया था धरती  पर,बैठ परीक्षित स्वर्ण मुकुट पर
उसको ये वरदान प्राप्त है, उसका वास,  स्वर्ण के अन्दर
और तुम पीछे पड़ी हुई हो, तुमको स्वर्णाभूषण लादूं
पागल हूँ क्या,जो कलयुग को,गले तुम्हारे से लिपटा दूं
और यूं भी सोना मंहगा है,दाम चढ़ें है आसमान पर
गहनों की क्या जरुरत तुमको,तुम खुद ही हो इतनी सुन्दर
सोने का ही चाव अगर है,हम तुम साथ साथ  सो लेगे
स्वर्ण हार ना,बाहुपाश का,हार तुम्हे हम पहना देंगे
पर मै इतना  मूर्ख नहीं  जो ,घर में कलयुग आने दूंगा
स्वर्ण तुम्हे ना दिलवाऊंगा,ना ही तुमको लाने दूंगा
प्यार तुम्हारा,सच्चा गहना, तुम हो मेरे  दिल में रहती
                                      सुनो भागवत है क्या कहती

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


रविवार, 11 मार्च 2012

दिल्ली -वाणी

दिल्ली -वाणी

गया मौसम चुनावों का,सर्दियाँ हो गयी कम है

कट गया माया का पत्ता, हुई सत्ता मुलायम है
चैन की ली सांस सबने,लोग थोडा मुस्कराये
फाग आया,जिंदगी में,रंग होली ने  लगाये
देख लोगों को विहँसता, केंद्र से आवाज़ आई
पांच रूपया ,पेट्रोल के ,दाम बढ़ने को है भाई
झेल भी लोगे  इसे तुम,भूल कर के मुस्कराना
याद रखना ,पांच दिन में,बजट भी है हमें लाना
बोझ मंहगाई का इतना,हम सभी पर लाद देंगे
किया तुमने दुखी हमको,दुखी हम तुमको  करेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 10 मार्च 2012

चुनावी चर्चा होली

मस्त गए दिन चार, चुनावी चर्चा होली

खाम-खुमारी कान धर, धर नीचे हथियार । 
उतर उड़नछू भाग अब, मस्त गए दिन चार ।

मस्त गए दिन चार, चुनावी चर्चा होली ।
छह छह पैग उतार, भाँग की खा खा गोली।

घर भर सब तैयार, करें तैयारी भारी  ।
भूला पिछली मार, यादकर खाम-खुमारी ।।

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

आओ हम होली मनाये

आओ हम होली मनाये

मेट कर मन की कलुषता,प्यार की गंगा बहाये

                        आओ हम होली  मनाये
अहम् का  जब हिरनकश्यप,प्रबल हो उत्पात करता
सत्य का प्रहलाद उसकी कोशिशों से नहीं मरता
और ईर्ष्या, होलिका सी,गोद में   प्रहलाद लेकर
चाहती उसको जलाना,मगर जाती है स्वयं  जल
शाश्वत सच ,ये कथा है,सत्य कल थी,आज भी है
लाख कोशिश असुर कर ले,जीतता प्रहलाद  ही है
सत्य की इस जीत की आल्हाद को ऐसे मनाये
द्वेष सारा,क्लेश सारा, होलिका में हम जलायें
भीग जायें, तर बतर हो ,रंग में अनुराग के हम
मस्तियों में डूब जाये, गीत गायें ,फाग के हम
प्यार की फसलें उगा,नव अन्न को हम भून खायें
हाथ में गुलाल  लेकर ,एक दूजे   को     लगायें
गले मिल कर,हँसे खिलकर,ख़ुशी के हम गीत गाये
                                आओ हम होली मनाये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 8 मार्च 2012

Re: चुनाव के बाद - नारी दिवस

Rang Barse........! Holi hai!

On March 7, 2012 8:50:09 PM PST, madan mohan baheti wrote:

चुनाव के बाद

        तुम संग कैसे खेले होली
         तुम हो नार बड़ी बडबोली
नारी दिवस पर दुखिया  नारी
मायावती    बहन      बेचारी
अब  तक बहुत करी बरजोरी
जनता ऐसी बांह मरोरी
हार चुनाव,कट गया पत्ता
और हाथ से छूटी  सत्ता
दुखी दूसरी नार सोनिया
बेटे हित सपने थे क्या क्या
सपने सारे  टूट गए पर
सारी मेहनत रही बेअसर
भ्रष्टाचार,नकारी ,जनता
 दोष संगठन का भी  बनता 
और तीसरी उमा भारती
बी जे पी भी गयी  हारती
उसका जादू काम न आया
खिला  कमल ना,पर कुम्हलाया
साईकिल ने पेडल मारे
हाथी,हाथ,कमल सब हारे
तीनो नार आज बेबस है
भले नारी का आज दिवस है
कोई नहीं आज हमजोली
जनता खेली ऐसी  होली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस..'

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर..कुछ पंक्तियाँ.. ... "नारी का शोषण ना थम सकेगा कभी.. प्रयत्न करके देखलो सभी.. जो पाना है स्वयं को लक्ष्य.. निर्धारित हो जीवन का भक्ष्य.. करो सुशोभित अंतर्मन-ताज.. हर ह्रदय करे नमन-राज.. आती नहीं सुबह यूँ ही.. लाती सन्देश यही.. जिसने पहचाना मूल्य.. है वही परमात्मा तुल्य..!!" ... --प्रियंकाभिलाषी .. ८ मार्च, २०१२..

बुधवार, 7 मार्च 2012

नारी दिवस और होली-8 th march

         नारी दिवस और होली

        आज नारी दिवस भी है,
         होलिका त्योंहार भी है
पर्व कल था जो दहन का
आस्थाओं के दमन का
कुटिलता के नाश का दिन
भक्ति के  विश्वास का दिन
         शक्ति के उस परिक्षण में
         जीत भी है ,हार भी है
         आज नारी दिवस भी है,
          होलिका त्योंहार भी है
  आग  भी है, फाग भी है
जलन है  अनुराग भी है
दाह भी है,  डाह भी है
चाह भी है, आह भी है  
          अजब है संयोग देखो,
          प्यार है,प्रतिकार भी है
          आज नारी दिवस भी है,
           होलिका त्योंहार भी है
आज उत्सव है मदन का
पर्व है ये  मधु मिलन का
प्रीत का,मनमीत का दिन
मचलते  संगीत का दिन
         आज रंगों में बरसता,
          प्यार है,मनुहार भी है
         आज नारी दिवस भी है,
          होलिका  त्योंहार भी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

चुनाव का चक्कर-जनता का उत्तर


चुनाव का चक्कर-जनता का उत्तर
                      १
पांच साल से हो रहा,था 'हाथी' मदमस्त
दो पहियों की 'सायकिल',उसे कर गयी पस्त
उसे कर गयी पस्त,'कमल' भी है कुम्हलाया
गाँव गाँव में हिला 'हाथ',पर काम न आया
कह घोटू कवि,अब सत्ता हो गयी 'मुलायम'
ख़तम हो गया,'माया' की माया का सब भ्रम
                       २
बहुजन हो या सर्वजन,कुछ भी दे दो नाम
चाल समझती है सभी,मूरख नहीं अवाम
मूरख नहीं अवाम,परख है बुरे भले की
सारा भ्रष्टाचार, बन गया फांस  गले की
सत्ता के मद में माया इतनी पगलायी
खुद के पुतले बना,बन गयी  पुतली बाई

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

मंगलवार, 6 मार्च 2012

मै,तुम और चटपटी जिंदगी


 मै,तुम और चटपटी जिंदगी
-------------------------------
मै किचन में काम करती,
               सजन तुम मन में बसे हो
रसमलाई सी मधुर मै,
             चाट से तुम चटपटे  हो
मै स्लिम काजू की कतली,
              और मोतीचूर हो तुम
  मै जलेबी रसभरी और,
             प्रेम रस भरपूर हो तुम
मै पूरी की तरह फूली,
             तुम पंराठे से हो केवल
मै हूँ बिरयानी सुहानी,
             दो मिनिट के तुम हो नूडल
आलू की टिक्की महकती,
              मै हूँ,तुम हो गोलगप्पे
मै करारी सी कचोरी,
             तुम तिकोने से समोसे
तुम हो कटहल से कटीले,
            और मै लौकी लजीली
तुम हो चमचे,मै छुरी हूँ,
              तुम तवा हो मै पतीली
तुम कडाही  की तरह हो,
                और मै प्रेशर कुकर हूँ
गेस का चूल्हा सजन तुम,
               और मै तो लाइटर  हूँ
बाटियों सी स्वाद हूँ मै ,
                 और तड़का दाल हो तुम
मै सजी थाली परोसी,
                 और टपकती लार हो तुम
मै हूँ धनिया तुम पुदीना,
                 बनी चटनी जिंदगी है
प्यार झगडे के मसाले,
                इसलिए ये चटपटी है


मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 

सोना बाथ और स्टीम बाथ

सोना बाथ और स्टीम बाथ
--------------------------------
सोनी,तेरी सुन्दरता ने,मुझको इतना उष्ण किया है
एसा लगता गरम कक्ष में,मैंने 'सोना बाथ 'लिया है
सर्दी में तेरे होठों ने,मुंह से ऐसी भाप निकाली,
मेरे अलसाये होठों को,जैसे 'स्टीम बाथ' दिया हो

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

होली,तपभंग और पाउडर

होली,तपभंग और पाउडर
             १
तप से विश्वामित्र से,हुए इंद्र जब तंग
उनने भेजी मेनका,करने को तप भंग
करने को तपभंग,रूप का जाल बिछाया
था ऋतुराज बसंत,पर्व होली का आया
कह घोटू कवि चली मेनका भर पिचकारी
विश्वामित्र मुनिजी की सूरत रंग डाली
             २
ज्ञानी  विश्वामित्र पर,बरसी रंग फुहार
उनको गुस्सा आ गया,देखा जब निज हाल
देखा जब निज हाल,उठे वो जल्दी जल्दी
ले धूनी से राख,मेनका मुख  पर मल दी
पा नारी स्पर्श  गये तप भूल मुनिवर
खेली होली खूब मेनका के संग जी भर
              ३
उस दिन होली खेल कर,मन में भरे हुलास
ख़ुशी ख़ुशी जब मेनका,पहुंची दर्पण पास
पहुंची दर्पण पास,रूप जब अपना देखा
उजला उजला लगा रंग अपने चेहरे  का
ले धूनी से राख, रोज़ वो मुंह  उजलाती
शुरू पाउडर का प्रचलन है तबसे  साथी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

सोमवार, 5 मार्च 2012

परिवर्तन


जब जब मौसम बदला करता,सब में परिवर्तन आता है
लोग वही है,वो ही रिश्ते ,पर व्यवहार  बदल  जाता है
हवा वही है,सर्दी में जो,ठिठुराती थी सारे  तन को
वो ही गर्मी में लू बन कर,जला रही सम्पूर्ण बदन को
वो ही धूप,भली लगती थी,जो सर्दी में बहुत  सुहाती
गर्मी में वो ही चुभती है,जब अंग लगती,बदन जलाती
पानी वही जिसे छूने से,सर्दी में होती थी ठिठुरन
अब गर्मी में,उस पानी में,भीग तैरने को करता मन
अधिक ताप में भाप,बरफ बन जमता,होती अधिक शीत है
सूरत,सीरत,नाम बदलती,इस मौसम की यही रीत  है
लोग वही पर पैसा पाकर,उनका नाम बदल जाता है
पहले था 'परस्या'फिर 'परसु','परसराम' फिर कहलाता है
होते है माँ बाप वही जो,बचपन में थे सबसे  अच्छे
उन्हें बुढ़ापा जब आ जाता,तो  ठुकरा देते है  बच्चे
ऑंखें वही,अगर दुःख होता,जार जार आंसू ढलकाती
मगर ख़ुशी जब अतिशय होती,तो भी पानी से भर जाती
इसमें दोष नहीं कोई का,परिवर्तन नियम जीवन का
है ऋतू चक्र ,बदलता रहता,है अक्सर मिजाज़ मौसम का
चेहरा वही,कभी मुस्काता,तो अवसाद कभी छाता  है
जब जब मौसम बदला करता ,सब में परिवर्तन आता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 4 मार्च 2012

पुत्र-पिता पति साथ

बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती

प्यार मिले परिवार का, पुत्र-पिता पति साथ ।
देवी मुझको मत बना, झुका नहीं नित माथ ।
झुका नहीं नित माथ, झूठ आडम्बर छाये ।
कन्या-देवी पूज, जुल्म उनपर ही ढाये ।
दुग्ध-रक्त तन प्राण, निछावर सब कुछ करती ।
बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती ।।

अबकी होली

अबकी होली
कई रंग से खेली  होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
सुबह उठा बीबीजी बोली,सुनो दर्द है मेरे सर में
वैसे आज तुम्हे छुट्टी है,दिन भर रहना ही है घर में
देखो मुझको नींद आ रही,सुबह हो गयी तो होने दो
प्लीज बुरा तुम नहीं मानना,थोड़ी देर और सोने दो
सच डीयर कितने प्यारे हो,अच्छा सोने दो ना जाओ
सच्चा प्यार तभी जानू जब ब्रेकफास्ट तुम बना खिलाओ
कह उनने तो करवट बदली,नींद हमारी टूट चुकी थी
काफी दिन भी चढ़ आया था,बड़ी जोर की भूख लगी थी
फिर उनकी प्यारी बातों ने,जोश दिया था कुछ एसा भर
हम भी कुछ कर दिखला ही दें,सोच घुसे चौके के अन्दर
कौन जगह क्या चीज रखी है,इसकी हम को खबर नहीं थी
उचका पैर ढूंढते चीनी,आसपास कुछ नज़र नहीं थी
रखा एक डिब्बा गलती से,गिरी मसालेदानी हम पर
पहली होली उसने खेली,कई रंगों से दिया हमें भर
लाल रंग की पीसी मिर्च थी,और हरे रंग का था धनिया
पीला  रंग डाला हल्दी ने, बना अजीब हमारा हुलिया
काला काला गरम मसाला,राई,जीरा अजब रंग थे
हर रंग की अपनी खुशबू थी,मगर मिर्च से हुए तंग थे
छींक छींक हालत खराब थी ,आँखों में थी मिर्च घुल गयी
दुःख तो ये है,छींके सुन कर ,बीबीजी की नींद खुल गयी
उठ आई तो देखा हमको,शक्लो सूरत रंग भरी थी
मै गुस्से में था लेकिन  वो मारे हंसी हुई दोहरी  थी
देख हमारी हालत उनको,प्यार या दया ऐसी आयी
हमें दूसरी होली उनने,अपने रंगों से  खिलवायी
काली काली सी जुल्फें थी,रंग गुलाबी सा चेहरा था
हरा भरा था उनका आँचल ,लाल होंठ का रंग गहरा था
पहली होली भूल गए हम,रंग दूसरी का जब आया
लेकिन इसी समय दरवाजा,आकर यारों ने खटकाया
और तीसरी होली हमने खेली मित्रों की टोली से
बड़ी देर तक धूम मचाई,रंग गुलाल भरी झोली से
पहली थी कुछ तीखी होली
दूजी प्यारी पिय  की होली
और तीसरी  नीकी होली
सच अबके ही सीखी होली
तीन ढंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली  होली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आओ होली मनाएं

आओ होली मनाएं

आओ होली मनाएं
पहले दिन
पुरानी वेमनस्यतायें
दुर्भावनाएं ,कटुता,और
बैरभाव की होली जलाएं
और दूसरे दिन
सदभावनाओं की गुलाल
भाईचारे का अबीर
और प्रेम के रंगों से
मिलजुल कर होली मनाएं

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जब मुँह पर खिला बसन्त --

जब मुँह पर खिला बसन्त --

बुरा न मानो होली है --
मूँग दले होरा भुने, उरद उरसिला कूट ।
पापड बेले अनवरत, खाय दूसरा लूट ।।
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjLateYcQt2S3472cdcCSpVLylbEtNo_ku0iqrVjZ8662yhv7Xg6oBYmB7AR8uLM6Ez8ohqWrjmUqts8qF2FLeUr1ItnMRRFFpKyJcHXLZ5lb8Guxnk35tg00Mwt3wO8ysjWkCS3kWxiC0/s1600/100_4500.JPG
मालपुआ गुझिया मिली, मजेदार मधु स्वादु ।
स्वादु-धन्वा मन विकल, गुझरौटी कर जादु ।।
मन के लड्डू मन रहे,  लाल-पेर हो जाय ।
रंग बदलती आशिकी, झूठ सफ़ेद बनाय ।
भाँग खाय बौराय के,  खेलें सन्त-महन्त ।
नशा उतरते ही खिला, मुँह पर मियाँ बसन्त ।।
Rangoli design with diya in centre
होरा = चना का झाड़
उरसिला = चौड़ी छाती 
गुझिया = एक प्रकार की मिठाई 
गुझरौटी= नाभि के पास का भाग 
स्वादु-धन्वा = कामदेव
जब मुँह पर खिला बसन्त = डर जाना 

यह  भी  देखिये  

ताकें गोरी छोरियां--

 दोहे 
शिशिर जाय सिहराय के, आये कन्त बसन्त ।
अंग-अंग घूमे विकल, सेवक स्वामी सन्त ।

मै कवि हूँ

                           मै कवि हूँ
धूप के संग छाँव को भी,जन्म देता वो रवि हूँ
                             मै कवि हूँ
कल्पना के समंदर में सिर्फ ना गोते लगाता
बल्कि जा गहराइयों में,सीप मोती ढूंढ लाता
कलकलाती नदियों का,रूप ना केवल निहारा
बल्कि देखा बाढ़ में उनका विनाशक रूप सारा
फूल फल से  लदे देखे वृक्ष  जब अनुकूल मौसम
वहीँ  देखा हुआ पतझड़,जब हुआ प्रतिकूल मौसम
तान सीना,वृक्ष देखे,वनों में  ऊंचे  खड़े  थे   
वक़्त का आया बुलावा,कट गए वो गिर पड़े थे
और देखी उन वनों में, उठ रही अट्टालिकाएं
प्रकृति का संहार करके,प्रगति की सारी विधाये
प्रात का कोमल अरुण और दोपहर का सूर्य तपता
चाँद,जो ले क़र्ज़ रवि से,रात को जगमग  चमकता
नहीं केवल मिलन का सुख,जुदाई की पीर  देखी
वक़्त के संग जमाने की बदलती तस्वीर  देखी
जिन्होंने जीवन दिया  , वो प्रताड़े माँ बाप देखे
दृश्य कितने ही करुण,आंसू भरे, चुपचाप देखे
इन्ही दृश्यों और जीवन की सभी संवेदनाये
को पिरोया शब्द में जब ,बन गयी वो कवितायेँ
मोम जैसा कभी पिघला,बना भी पाषण हूँ मै
बहुत गहरी चुभन देता,शब्द का वो बाण हूँ मै
प्यार का मादक सपन हूँ,और मिलन का गीत हूँ मै
युद्ध रणभेरी बजाता,हार भी हूँ  जीत    हूँ      मै
समय के  खाकर थपेड़े  ,बन गया अब अनुभवी हूँ
                                      मै कवि हूँ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 3 मार्च 2012

kaun kahta hai ki ham boodhe huye hai?

सर्दी से अब तलक, गया जो नहीं नहाने

तीन समाचार

पटना से सुशील मोदी
प्रसव करे पीड़ा सहे, रक्त दूध से पाल ।
नसबंदी की बात पर, होती रही हलाल ।
होती रही हलाल, पुरुष पौरुष दिखलाओ  ।
पांच मिनट का काल, चलो अब आगे आओ ।
मोदी की यह बात, करे खारिज नर-कीड़ा ।
मौज करे दिन रात,  सहे बस नारी पीड़ा ।।

जहानाबाद से दबंग -
काटे हाथ दबंग ने, पी एम सी एच नेक ।
पड़ा फर्श पर तड़पता, गए गाँव में फेंक ।
गए गाँव में फेंक, होय आशंका  भारी ।
नक्सल बने अनेक, किया लेकिन हुशियारी ।
उठे नहीं गन बम्ब, पोस्टर कैसे साटे ।
सके न नक्सल बन , हाथ दोनों जो काटे ।।  

धनबाद से अघोरी
पानी की किल्लत बढे, फिर दादा इस साल ।
होली में डी सी कहे, खेलो शुष्क गुलाल ।
खेलो शुष्क गुलाल, तिलक माथे पर लागे ।
बदलो अपनी चाल, कठिन दिन आये आगे ।
किन्तु अघोरी-छाप, बात उनकी ना माने ।
 सर्दी से अब तलक, गया जो नहीं नहाने ।।
 

आज तुम ना नहीं करना

आज तुम ना नहीं करना
जायेगा दिल टूट वरना
तुम सजी अभिसारिका सी,दे रही मुझको निमंत्रण
देख कर ये रूप मोहक, नहीं  अब मन पर नियंत्रण
खोल घूंघट पट खड़ी हो,सजी अमृतघट   सवांरे
जाल डोरों का गुलाबी ,नयन में  पसरा तुम्हारे
आज आकुल और व्याकुल, बावरा  है मन मिलन को
हो रहा है तन तरंगित,चैन ना बेचैन मन को
प्यार की उमड़ी नदी में,आ गया सैलाब सा है
आज दावानल धधकता,जल रहा तन आग सा है
आज सागर से मिलन को,सरिता  बेकल हुई है
तोड़ सब तटबंध देगी,  कामना पागल हुई है
और आदत है तुम्हारी,चाह कर भी, ना करोगी
बांह में जब बाँध लूँगा,समर्पण सम्पूर्ण दोगी
चाहता मै भी पिघलना,चाहती तुम भी पिघलना
टूट मर्यादा न जाये, बड़ा मुश्किल है  संभलना
व्यर्थ में जाने न दूंगा,तुम्हारा सजना ,संवारना
केश सज्जा का तुम्हारी ,आज तो तय  है बिखरना
    आज तुम ना नहीं करना
    जायेगा दिल टूट  वरना

मदन मोहन बहेती'घोटू'

मुक्तक

मुक्तक
--------
  १
क्या भरोसा जिन्दगी की,सुबह का या शाम का
आज जो हो,शुक्रिया दो,उस खुदा के नाम का
गर्व से फूलो नहीं और ये कभी भूलो  नहीं,
अंत क्या था गदाफी का,हश्र  क्या सद्दाम  का
     २
नहीं सौ फ़ीसदी खालिस,इस सदी में कोई है
धन कमाने की ललक में,शांति सबकी खोई है
बीज भ्रष्टाचार के,इतने पड़े है है खेत में,
काटने वो ही मिलेगी,फसल जो भी बोई है
    ३
है बहुत सी कामनाएं,काम ही बस काम है
ना जरा भी चैन मन में,और नहीं आराम है
आप जब से मिल गए हो,एसा है लगने लगा,
जिंदगी एक खूबसूरत सी बला  का नाम है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

श्रृंगार

(बाल विवाह की पीढ़ा को दर्शाने का एक अल्प प्रयास कविता के माध्यम से)
बहुत कुछ चाहती थी वो करना,
सपना था उसका कुछ बनना |
पर उस अग्नि की वेदी में ,
इक दिन उसको भी पड़ा जलना |
सोचती रह गयी बस वो,
सोचा था उसने जो,
क्या कर पायेगी उसे अब पूरा ?
उसकी इच्छाएं ,उसके सपने,सब कुछ रह गया अधूरा |
उसको अपना ये श्रृंगार,लगने लगा था अपनी हार |
नए जीवन में हो रहा था प्रवेश 
 मन में बाकी थे बस उम्मीदों के कुछ अवशेष |
वो खनखनाहट नहीं थी उसकी चूड़ियों की,
बल्कि आवाज थी उसकी मजबूरियों की |
ये बेड़ियाँ समाज की ,
पायल बन के बंध चुकी थी पैरों में ,
अपनी की सिर्फ यादों को लेकर जा रही थी वो गैरों में |
बिंदिया ,सिदूर और काजल ,
मंडरा रहे थे उसकी उम्मीदों पर बन के बादल |
सोच के गहरे समुद्र में डूबती जा रही थी वो ,
कुछ और ही चाहा था उसने कुछ और ही पा रही थी वो |
अपने ही श्रृंगार में स्वयं ही दबती जा रही थी वो ,
कुछ और ही माँगा था उसने कुछ और ही पा रही थी वो |

                                                                                                       
                                        अनु डालाकोटी


ससुराल-मिठाई की दूकान

ससुराल-मिठाई की दूकान
------------------------------
सालियाँ,नमकीन सुन्दर,और साला  चरपरा
टेड़ी सलहज जलेबी सी,मगर उसमे  रसभरा
सास रसगुल्ला रसीली,कभी चमचम रसभरी
काजू कतली उनकी बेटी,मेरी बीबी  छरहरी
और लड्डू से लुढ़कते, ससुर  मोतीचूर  हैं
हर एक बूंदी रसभरी है,प्यार से भरपूर  है
गुंझिया सा गुथा यह परिवार रस की खान है
ये मेरा ससुराल  या मिठाई  की दूकान  है
(होली की शुभकामनाये)
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

स्वप्नों की मंडी


मै स्वप्न खरीदने निकला ,
एक दिन , स्वप्नों के बाज़ार में ,
बड़ी भीड़ थी ,
ठसाठस भरे थे खरीदार ,
रंगीले स्वप्न , रसीले स्वप्न ,
स्वप्नों की मंडी में स्वप्न ही स्वप्न ,
सब नींद में थे ,
जागना भी नहीं चाहते ,
स्वप्न साकार करने की हिम्मत नहीं थी ना ,
दरअसल स्वप्न साकार करने के बजाय ,
स्वप्न खरीदना आसान लगता है ,
समय है किसके पास ,
सब व्यस्त है स्वप्न खरीदने में ,
स्वप्न खरीदने में जितना समय लगता है ,
उससे कम समय साकार होने में ,
करके तो देखो ,
स्वप्न की मंडी मे दिग्भ्रमित हो जाओगे ,
स्वप्नों की दुनिया से निकल कर यथार्थ मे ,
जीकर देखो
विनोद भगत

गुरुवार, 1 मार्च 2012

खेलो होली

घरवालों संग खेलो होली ,घरवाली संग खेलो होली
साला तो शैतान बहुत है ,तुम साली संग खेलो होली
जिनको सदा देखते हो तुम ,हसरत भरी हुई नज़रों से
जवां पड़ोसन ,प्यारी समधन,दिलवाली संग खेलो होली
यूँ तो सलहज सहज नहीं है,बस होली का ही मौका है,
कस कर पकड़ो रंग लगा,मतवाली के संग खेलो होली
लेकर रंग भरी पिचकारी,तन को इतना गीला करदो,
चिपके वस्त्र दिखे सब कुछ उस छवि प्यारी संग खेलो होली

होली आई रे

होली आई  रे  

फागुनी बयार चलने लगी है 
फागुन ऋतू आई है 
मोसम सुहाना होने लगा है 
डेसू के फूलों की लालिमा छाई है         




आगे पढ़ने के लिए  नीचे के लिंक पर जाइये /और अपने सन्देश जरुर दीजिये /आभार /
http://prernaargal.blogspot.in/2012/02/happy-holi.html

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अबीर गुलाल
----------------
तेरा अबीर ,तेरी गुलाल,
सब लाल लाल, सब लाल लाल
उस मदमाती सी होली में
जब ले गुलाल की झोली मै
       आया तुम्हारा मुंह रंगने
तुम सकुचाई सी बैठी थी
कुछ शरमाई  सी बैठी थी
      मन में भीगे भीगे सपने
मैंने बस हाथ बढाया था
तुमको छू भी ना पाया था
      लज्जा के रंग  में डूब गये,
      हो गये लाल,रस भरे गाल
तेरा अबीर ,तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल लाल
मेंहदी का रंग हरा लेकिन,
जब छूती है तुम्हारा  तन,
       तो लाल रंग आ जाता है
इन काली काली आँखों में,
प्यारी कजरारी आँखों में,
      रंगीन जाल छा जाता  है
चूनर में लाली लहक रही,
होठों पर लाली दहक  रही
     हैं खिले कमल से कोमल ये,
      रखना  संभाल,पग  देख भाल
तेरा अबीर,  तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

अबकी होली

अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार
 हो जाये भ्रष्टाचार स्वाहा, महगाई,झगड़े, लूटमार
सब लाज शर्म को छोड़ छाड़,हम करें प्रेम से छेड़ छाड़
गौरी के गोरे गालों पर ,अपने हाथों से मल गुलाल
जा लगे रंग,महके अनंग,हर अंग अंग हो सरोबार
इस मस्ती में,हर बस्ती में,बस जाये केवल प्यार प्यार
दुर्भाव हटे,कटुता सिमटे,हो भातृभाव का बस प्रचार
अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

बचपन

सोचा न था इस तरह चला जायेगा वो
इन्तजार कर लें चाहें जितना ,
पर अब लौट के न आयेगा वो ,
कभी रोता कभी हँसता ,मुस्कुराता हुआ शरारतों से भरा
इस तरह बिछड़ जायेगा वो,
मांगते रह जायेंगे हम, पर अब न मिल पायेगा वो
यादों की दुनिया में जाके चुप गया है इस तरह की ,
अब ढूँढने पर भी नजर नहीं आयेगा वो ,
उस बचपन को अब यादों में ही तलाशना ,
क्योकि इस जनम में तो दोबारा नहीं मिल पायेगा वो ,
वो बचपन जो बिछड़ गया है हमसे सदा के लिए ,
यादों की दुनिया में ही मुस्कुराएगा वो,
सोचा न था इस तरह चला जायेगा वो
इन्तजार कर लें चाहें जितना ,
पर अब लौट के न आयेगा वो |


                                        अनु डालाकोटी

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

ब्रह्मा विष्णु महेश

ब्रह्मा विष्णु महेश
--------------------
भारत की सीमा पर,
तीन तरफ समंदर,
और एक तरफ पहाड़ है
और  हमारे त्रिदेव ,
ब्रह्मा,विष्णु महेश पर,
इसकी सुरक्षा का भार है
उत्तर में कैलाश पर्वत पर,
बिराजे है शिव शंकर,
चीन की सभी गतिविधियों पर,
रखे हुए है नज़र
और सुरक्षा समंदर की,
कर रहे है  विष्णु भगवान
उन्होंने तो समंदर के अन्दर ही,
बना लिया है रहने का स्थान
शेषनाग की शैया पर विराजते है
और भारत की,तीन तरफ की ,
सुरक्षा को, वो ही सँभालते है
यहाँ तक कि उनकी पत्नी लक्ष्मी जी,
भारत के आर्थिक विकास में है लगी
और तीसरे देव ब्रह्मा जी,
कमल नाल पर बैठे हुए,
अपने चारों मुखों से,
देश कि आतंरिक सुरक्षा पर,
पूरी नज़र रखें है
और सरस्वती के साथ,
देश कि बौद्धिक और सांस्कृतिक,
विरासत कि सुरक्षा में लगे  है
इन तीनो देवताओं का वरदान,
और आशीर्वाद हम पर है
इसीलिए तो आज  भारत ,
प्रगति के पथ पर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नसीब

हर कोई इस दुनिया में अपना नसीब लेकर आता है ,
किसी को मिलता है सब कुछ , 

तो कोई अपने नसीब से कुछ नहीं पाता है |
हर कोई इस दुनिया में अपना नसीब लेकर आता है |
कोई खुश है अपने नसीब पर ,
तो कोई बस अपने नसीब को कोसता रह जाता है |
हर कोई इस दुनिया में अपना नसीब लेकर आता है |
ये नसीब का ही खेल है शायद !
की कोई तो हार रहा है पल पल  ,
और कोई हर लम्हे को जीत के बैठ जाता है |
हर कोई इस दुनिया में अपना नसीब लेकर आता है |
हर किसी का नसीब लिखा है ऊपर वाले ने ,
अब देखना बस ये है ,

की कौन अपने नसीब को कितना बदल पाता है |
हर कोई इस दुनिया में अपना नसीब लेकर आता है |

                                                                        अनु डालाकोटी




शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

संतरा

            संतरा
            -------
धरा सा आकार सुन्दर,अरुण सी आभा सुशोभित
वेद का,उपनिषद का सब,ज्ञान फांकों सा सुसज्जित
और फांकों में समाये, वेद सब ,सारी ऋचायें
ज्ञान कण कण में,वचन से ,प्यास जीवन की बुझाये
फांक का हर एक दाना, मधुर जीवन रस भरा  है
संत के सब गुण  समाहित,इसलिए ये संतरा  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

होली

खेलूंगी होली तोहरे ही साथ पिया ,
जाने न दूंगी तोहे आज पिया |
झूम झूम के डारू तुझपे रंग पिया ,
भीजूंगी आज तोहरे ही संग पिया ,
खेलूंगी होली तोहरे ही साथ पिया |
लगाऊं अबीर लगाऊं गुलाल गालो में तोहरे ,
ये मौका न जाने दू हाथ से पिया ,
खेलूंगी होली तोहरे ही साथ पिया |
बाँधी है प्रीत की डोरी जो तुझसे ,
उस प्रीत पे आने न दूंगी आंच पिया ,
खेलूंगी होली तोहरे ही साथ पिया |
छुडाये न छूटेगा ये
रंग पिया ,
इस प्रीत से भीज जायेगा तोहरा अंग पिया ,
खेलूंगी होली तोहरे ही साथ पिया |
खुली आँख और टूटा सपना ,
तू खड़ा है सरहद के पास पिया ,
अब कैसे खेलूंगी होली तोहरे साथ पिया ?
अब कैसे खेलूंगी होली तोहरे साथ पिया ?

                                                          अनु डालाकोटी                



शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

भविष्य का सपना

भविष्य का सपना 
मन पखेरू उड़ने लगा है 
नए नए सपने संजोने लगा है 
दिल में एक नया एहसास उमंगें ले रहा है 
नई पीढ़ी का भविष्य भी अब सुनहरा हो रहा है 
आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाइये और अपने सन्देश जरुर दीजिये /आभार/

क्या मैं अकेली थी

सुनसान सी राह
और छाया अँधेरा
गिरे हुए पत्ते
उड़ती हुयी धूल
उस लम्बी राह में
मैं अकेली थी ।

चली जा रही
सब कुछ भूले
ना कोई निशां
ना कोई मंजिल
उस अँधेरी राह में
मैं अकेली थी ।

तभी एक मकां
दिखा रस्ते में
बिन सोचे मैं
वहाँ दाखिल हुयी
उजाला तो था
चिरागों का पर
उन चिरागों में
मैं अकेली थी ।

रुकी वहाँ और
सोचा मैंने है कोई
नहीं यहाँ तो चलूं
आगे के रस्ते में
फिर निकल पड़ी
पर उस रस्ते पर
मैं अकेली थी ।

छोड़ दिया उस
मकां का रस्ता
देखा बाहर जो मैंने
उजाला था राह में
लोग खड़े थे
मेरे इंतजार में

वहाँ ना अँधेरा था
ना ही विराना
बस था साथ
और विश्वास
उन सबके साथ
उस साये में
आकर फिर

मैंने सोचा
क्या सच में
मैं अकेली थी
या ये सिर्फ
एक पहेली थी ।

©.दीप्ति शर्मा

दिल के अहसास

1. हर इक रस्म निभा जाना आसान नहीं,
बस सोचना ही आसान होता है ।

2. तस्वीरें अहसास कराती हैं
अपनों के पास होने का
उसकी अहमियत कोई समझे
ये जरूरी तो नहीं ।

3. दिल जल जाते हैं
हाथों को जलाने से क्या होगा
गर चाहे वो मुझे
तो याद आयेगी उसे
मेरे याद दिलाने से क्या होगा ।

4. जब नाम दिल पर लिखा हो
कागज से मिटाकर क्या पा लोगे
हस्ती है मेरे प्यार की रौशन
ख़्वाबों में जो तुम मुझे ना पाओ
तो ख़्वाब सुनहरे कैसे सजा लोगे ।

कल्कि अवतार का मत करो इन्तजार

कल्कि अवतार का मत करो इन्तजार
---------------------------------------------
पुराण बतलाते है
जब जब धर्म की हानि होती है,
भगवान अवतार ले कर आते है
त्रेता में राम का रूप धर कर अवतार लिया
द्वापर में कृष्ण रूप में प्रकटे,
और दुष्टों का संहार किया
पर आजकल,इस कलयुग में,धर्म की हानि नहीं,
धर्म का विस्तार हो रहा है
जिधर देखो उधर धर्म ही धर्म,
का प्रचार हो रहा है
भागवत कथाएं,
गाँव गाँव शहर,कस्बो में,
टी.वी. के कई चेनलों में,
साल भर चलती है
कितनी भीड़ उमड़ती है
भागवत कथा सुन कर कितने ही श्रोताओं में,
मोक्ष की आस जगी है
तीर्थो में उमड़ती भीड़ को देखो,
सब में पुण्य कमाने की होड़ लगी है
मंदिरों में आजकल इतने लोग जाते है
कि भक्तों को दर्शन देते देते,
भगवान भी थक जाते है
तब सांवरिया सेठ का रूप धर,
भगवान ने नानीबाई का मायरा भरा था
अपने भक्त नरसी मेहता पर उपकार करा था
आज कल कई सेठ,
कितनी ही गरीब कन्याओं का,
सामूहिक विवाह करवाते है
और भरपूर पुण्य कमाते है
तब एक श्रवण कुमार ने,
अपने बूढ़े माता पिता को,
तीर्थ यात्रा करवाई थी,
कांवड़ में बिठा कर
आज कितने ही श्रवण  कुमार,
अपने बूढ़े माता पिता को,
तीर्थ यात्रा करवाते है,
हेलिकोफ्टर  में बिठा कर
पहले आदमी जब गया तीर्थ था जाता,
तो गया गया सो गया ही गया था कहा जाता
और आज कल गया जानेवाला,
सुबह गया जाता है,
और शाम तक वापस भी लौट आता है
धर्म का लगाव बढ़ता ही जा रहा है
लोगों में भक्ति भाव ,बढ़ता ही जा रहा है
तो जो लोग कल्कि अवतार का इन्तजार कर रहें है
बेकार कर रहे है
क्योंकि जब इतनी धार्मिक भावनायें,
भारत में जागृत है
तो भगवान को अवतार लेने की क्या जरुरत है?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

जिनके गलत सुलूक रहे हैं।
शंख वही अब फूक रहे हैं।

भरा गन्‍दगी से अन्‍तर्मन,
वो औरों पर थूक रहे हैं।

कोयल तो आश्‍चर्यचकित है,
सारे कौवे कूक रहे हैं।

राम बने फिरते हैं अब वो,
कल तक जो शम्‍बूक रहे हैं।

निकले हैं सागर मन्‍थन को,
कभी कूप मन्‍डूक रहे हैं।

काटे गये अँगूठे फिर भी,
कहॉं निशाने चूक रहे हैं। 

रचनाकार-नागेन्‍द्र अनुज,
प्रतापगढ़ ।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

नारी

क्यों भूल जाते हैं उस सत्य को जो,
हर किसी के जीवन का अंश है,
जिसके होने से ही दुनिया है,
देश है,परिवार है और आने वाला वंश है |

उसके जीवित रहने पर दुखी होने वाले इंसान,
क्यों नहीं सोचते वो है एक नन्ही जान |
मार डालते हैं उसे अपने क्रूर हाथों से,
जीवित रहने पर जलाते हैं अपनी कडवी बातों से |

जबकि जानते हैं वही तो लक्ष्मी है,वही तो सरस्वती है,
फिर भी आज तक इस दुनिया में वही होती सती है | 
क्यों न उसे मिलता वह सम्मान है,
जिसके कारन इस दुनिया में जान है |

वह जननी है,वह माता है,वह बेटी है और वही विधाता है,
पर इस बात को कोई क्यों समझ नहीं पाता है ?
वह कल भी सहती थी ,आज भी सहती है,
पर कल न सहेगी,क्यूकि कल की नारी इस दुनिया से अकेली ही लड़ेगी |

रचनाकार-अनु डालाकोटी
उधम सिंह नगर
उत्तराखंड

रखकर सर पर पैर, सयाना सरपट भागै--

प्रवीण जी ने फेसबुक से विदा ली


क्षण भर चेहरे देख के, करें जरूरी काम |
बड़ा मुखौटा काम का, छूटे नशे तमाम |

छूटे नशे तमाम, नशे का बनता राजा |
छोड़ जरुरी काम, बुलाये आजा आजा |

कह रविकर रख होश, मुखौटा खोटे लागै |
रखकर सर पर पैर, सयाना सरपट भागै ||

हलचल अन्य ब्लोगों से 1-