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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

कूकर और डॉगी


कूकर सारे दिवस में ,अक्सर रहते शांत
भौंका करते रात भर ,जब होता एकांत
जब होता एकांत ,भीड़ में ना भौंकेंगे
वर्ना लोग मार कर डंडा चुप कर देंगे
किन्तु रात में सूनी सड़क कोई ना टोके
तब अपना साम्राज्य  चलाते ,कुत्ते भौंके

रेशम डोरी से बंधा ,साहब जिसे टहलाय
भौके भी डिसिप्लीन में ,वो 'डॉगी 'कहलाय
वो डॉगी कहलाय  ,लाडला मैडमजी का
खाये बिस्किट टोस्ट ,नाश्ता दूध दही का
कह घोटू कविराय ,समझ बस इतना लेना
कभी भूल से उसको कुत्ता मत कह देना

घोटू 
जीवन सरिता

मिले पथ में कई पत्थर ,जूझ सबसे ,
जिंदगी की हर जटिल पीड़ा सही है
हुआ ना पथभ्रष्ट पर मैं रहा चलता ,
धार मेरी पर सदा सीधी  बही  है
मिले मुझमे कई नाले ,मैल वाले ,
कई पावन नदियों संग ,हुआ संगम
दिन ब दिन ,पर रहा बढ़ता पाट मेरा ,
और मेरी गति भी ना पड़ी मध्यम
लगा डुबकी आस्था और भावना की ,
कामना ले पुण्य की फिर लोग आये
उनके भक्तिभाव से पावन हुआ मैं ,
पूर्ण श्रद्धा लिए जो मुझमे ,नहाये
चाह ये है काम मैं आऊं सभी के ,
सभी को मैं प्यार बाटूं इस  सफर में
क्योंकि मालूम है मुझे कि एक दिन तो ,
मुझको जा मिलना है खारे समंदर में

घोटू 
किस तरह से जी रहा हूँ

ये मत पूछो कि जिंदगी,
 कैसे बिता रहा हूँ
संतोष का फल बड़ा मीठा होता है ,
आजकल वो ही खा रहा हूँ
और जिंदगी की आपाधापी में ,
विवशता के आंसू पी रहा हूँ
बस इसी तरह खाते  पीते ,
जिंदगी जी रहा हूँ
मेरा  जीवन ,
खोमचे में सजे हुए खाली गोलगप्पों की तरह ,
इन्तजार में है उस हसीना के ,
जो इनमे प्यार का चटपटा पानी भर ,
चटखारे ले लेकर गटकाती जाये
जो जीवन की भूलभुलैया में ,
मेरी ऊँगली पकड़ ,खुद भी भटके,
और मुझे भी भटकाती जाए
मैं कंटीली झाड़ियों में खिला हुआ ,
गुलाब का वो फूल हूँ ,
जिसे प्रतीक्षा है उस रूपसी की ,
जो उसे तोड़ ,अपने केशों में सजा ले
मैं कश्मीर की पश्मीना शाल की तरह ,
दूकान में सिमटा बैठा ,
इन्तजार में हूँ कि कोई सुंदरी ,
आये और मुझे ओढ़ कर ,
सर्दी में गर्मी का मजा ले
तन्हाई ,
जिसका खुद का कोई अस्तित्व नहीं है ,
वो भी मुझे काटने को दौड़ रही है और ,
मेरा अकेलापन मुझे कचोटता रहता है
औरों की भरी पूरी खिलती बगिया के रौनक देख ,
मेरे सीने पर सांप लोटता  रहता है
 इस तरह की बेबसी के आलम में ,
खून  के घूँट पी रहा हूँ
बस आजकल इसी तरह जी रहा हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

मजबूरी

कभी कभी मन चिंतित पर मुस्काना पड़ता है
सूनेपन में डर  लगता ,तो गाना  पड़ता  है
कर मनुहार खिलाये जब वो अपने हाथों से ,
भूख नहीं होती है फिर भी खाना पड़ता है
भले पड़ोसन ,बहुत सुंदरी ,तुम्हे सुहाती है ,
घरवाली से लेकिन काम चलाना पड़ता है
कितनी चीजें होती जो हमको ललचाती है ,
खाली जेब,मगर मन की समझाना पड़ता है
यूं तो हम झगड़ा करते है ,रौब दिखाते है ,
दुश्मन भारी हो, पीछे हट जाना पड़ता है  
घटघट में भगवान बसे है फिर भी भक्तों को
प्रभु के दर्शन करने मंदिर जाना पड़ता है
रोज रोज झगड़ा होता है ,पति से ना पटती ,
पर व्रत करके ,करवा चौथ मनाना पड़ता है
नई कार साइलेंट देख कर ,कहा फटफटी ने ,
क्या रईस को मुंह ताला लगवाना पड़ता है
'घोटू 'देख हुस्न को मन में कुछ कुछ होता है ,
लेकिन मन मसोस कर ही रह जाना पड़ता है ,

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जल बिच मीन पियासी रे
जल बिच मीन पियासी रे, मोहे आये हांसी रे
पति दफ्तर में साहब ,इज्जत अच्छी खासी रे
घर में पत्नी ,उन्हें समझती ,एक चपरासी  रे
खाये परांठे खुद, पति को दे ,रोटी बासी रे
घर की मुर्गी ,दाल बराबर ,बात जरा सी रे
पत्नी का व्यवहार देख कर ,छाई उदासी रे
करे बुराई सबसे ,मुख पर ,मीठी मासी  रे
वोट न दे पत्नी भी ,हम है ,वो प्रत्याशी रे
 ऐसा हम पर,आया बुढ़ापा ,सत्यानाशी रे
सांप छुछन्दर गति ,मुसीबत अच्छी खासी रे
जल बिच मीन पियासी रे ,मोहे आये हांसी रे

घोटू 

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