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बुधवार, 13 मई 2020

प्रवासी श्रमिक की व्यथा कथा

मैं आज सुनाता हूँ तुमको ,बेबस श्रमिकों की व्यथा कथा
जिनने मीलों ,पैदल चल कर ,घर जाने की ,झेली  विपदा
देखा करते थे फिल्मों में ,रौनक  शहरों की ,बड़े बड़े
वो बाज़ारों की तड़क भड़क ,वो ऊंचे ऊंचे ,महल खड़े
वो कार ,मोटरें और बसें ,रेलें,मेट्रो सरपट चलती
हम कहाँ फसें है गाँवों में ,लगती थी हमको यह गलती
बस जोतो खेत ,बीज बोओ ,फसलें काटो ,रखवाली कर
ना सुख सुविधा ना नल बिजली ,छोटे मिटटी के ,कच्चे घर
जी बार बार करता था यह  ,हम छोड़े गाँव ,शहर जायें
वहां करें नौकरी ,ऐश करें ,पैसे कमायें और सुख पायें
था मना किया घरवालों ने ,पर हमने उनका दिल तोडा
दौलत के सपने ले मन में ,एक रोज गाँव हमने छोड़ा
गाँव के परिचित ,शहर बसे लोगों ने काम पर लगा दिया
पर जब प्रोजेक्ट ,हुआ पूरा ,तो उनने हमको ,भगा दिया
थोड़े दिन भटके इधर उधर ,जो मिलता छुटपुट काम किया
कुछ लोगों जब दी सलाह,हाथों में  रिक्शा थाम  लिया
अच्छा था काम ,मेहनत कर ,दो पैसे घर में ,बच जाते
पर बंद हुआ पेडल रिक्शा ,ई रिक्शे के आते आते
फिर ठेला ले, सब्जी फल भर ,बेचीं थी गली मोहल्ले में
इसमें भी ठीक कमाई थी ,दो पैसे बचते ,पल्ले में
चल रहा काम था ठीक ठाक ,पर कोरोना आफत आयी
कर्फ्यू लग गया ,काम सारा ,बंद करने की नौबत आयी
कुछ दिन काटे ,जैसे तैसे ,फिर भूखे पेट पड़ा सोना
ऐसे बिगड़े ,हालातों में ,बदहाली पर ,आया रोना
भूखे मरने की नौबत में ,अपना घर ,गाँव याद आया
दिल बोला आ अब लौट चलें ,शहरों ने बहुत है तडफाया
सब रेल,बसें थी बंद मगर ,कुछ साथी ने मिल ,हिम्मत कर
ये ठान लिया ,घर पहुंचेंगे ,धीरे धीरे ,पैदल चल कर
हम मरे न मरें करोना से ,भूखे रह कर मर जायेंगे  
खाने के लिए न तरसेंगे ,यदि हम अपने घर जाएंगे
था मीलों दूर गाँव अपना ,ना बचे  गाँठ में थे पैसे
था कठिन सफर ,मुश्किलों भरा ,पर काटेंगे ,जैसे तैसे
रस्ते में पुलिस ,कहीं रोकी तो पड़े कहीं पर थे डंडे
पर चोरो छुपके नज़र बचा ,अपना कितने ही हथकंडे  
हम बढे गाँव ,धीरे धीरे ,चलते ,रुकते ,सुस्ताते थे
कुछ  जगह लोग ,सेवाभावी ,हमको भोजन करवाते थे
चप्पल टूटी ,छाले निकले ,मिलजुल काटा ,रस्ता सबने
जैसे तैसे हम पहुँच गए उस प्यार भरे ,घर पर अपने
माँ के हाथों ,गुड़ रोटी खा ,मटके के जल से बुझी प्यास
लेटे  खटिया पर ,नीम तले ,मन में उल्लास ,मिट गए त्रास
दिल बोला  जिस मिट्टी जन्मे ,उस मिट्टी में दम तोड़ेंगे
सुख और शांति से जियेंगे ,हम गाँव कभी ना छोड़ेंगे
अपने बच्चों  को,पढ़ा लिखा ,काबिल इस कदर बना देंगे
गावों में सब सुविधा लाकर ,गाँवों को शहर बना देंगें

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '  
 
 

मंगलवार, 12 मई 2020

विनती -प्रभु से -कोरोना काल में

         चोपाई
जब जब होत धरम की हानि
पीड़ित होते जग के प्राणी
धरती पर छाये अंधियारा
जन जन दुखी ,त्रास का मारा
आकर कोई अत्याचारी
फैलाये विपदा,बीमारी
तब तब प्रभु ने ले अवतारा
दुष्ट राक्षसों को है मारा
जब उत्पात मचायो रावण
राम रूप धर प्रकटे भगवन
लंका जा रावण संहारा
किया दुखी जन पर उपकारा
द्वापर में जब अत्याचारी
कंस मचाई विपदा भारी
कृष्ण रूप लेकर प्रभु प्रकटे
धरा बचाई उस संकट से
इस युग, दुष्ट करोना राक्षस
आ ना रहा ,कोई के भी बस
दुनिया भर में मची तबाही
लोग कर रहे त्राहि त्राहि
विपदा सबकी आन हरो तुम
प्रभु जी अब अवतार धरो तुम
दवा,वेक्सीन ,बन कर प्रकटो
दूर करो सबके संकट को
              दोहा
हाथ जोड़ विनती करे ,'घोटू 'बारम्बार
कोरोना संहार को ,प्रभु जी लो अवतार

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

 

सोमवार, 11 मई 2020

दो सवैये -रसखान की तर्ज पर
१ (धूल  भरे अति शोभित  श्यामजू---)

घर बैठे अति शोभित साहबजी ,काम न काज ,करावे सेवा
ब्रेकफास्ट,लंच डिनर चाहिये ,चाय के साथ में गरम कलेवा
पल भर भी न जिन्हे फुरसत थी ,फुरसत में अब रहत सदैवा
आपके भाग जो पी  संग रंग में  ,दीनो है रंग  कोरोना देवा

२ (गावे गुनी,गनिका ,गंधर्व ------)

आई सुनी एक नयी बिमारी ,चीन से आ जो सभी सतावे
दिन दूनी और रात चौगुनी ,फ़ैल रही ,काबू नहीं आवे
रोवत सभी कोरोना को रोना ,कोई इलाज समझ नहीं पावे
तासे  चौदह दिन ,क्वेलेन्टाइन ,करवा कर ,सरकार बचावे
घोटू 
भजन -कोरोना काल में

अब सौंप दिया इस जीवन का ,सब भार  तुम्हारे हाथों में
तुम लाओ स्वच्छता ,धोकर कर ,सौ बार ,तुम्हारे हाथों में

घातक ये  कीट करोना है ,यदि तुमको इससे बचना है ,
आवश्यक ,सेनेटाइजर की ,तलवार तुम्हारे  हाथों में

तुम दो गज सबसे दूर रहो ,कोई को पास न आने दो ,
कर जोड़ नमस्ते ,दिखलाओ ,सब प्यार तुम्हारे हाथों में

तुम केवल दूर से 'हाई'करो और'बाय करो बस हाथ हिला ,
वर्जित है हाथ मिलाने का ,व्यवहार  तुम्हारे हाथों में

ये व्याधि  फ़ैल रही इतना ,है परेशान  सारी दुनिया
घर से मत निकलो ,कुशल रहो ,सरकार तुम्हारे हाथों में

कुछ भी लाओ,पाओ,खाओ ,धोकर के काम उसे लाओ  ,
है संक्रमरण   से बचने का ,उपचार तुम्हारे  हाथों  में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
कोरोना के कांटे

चुभते है शूलों जैसे ,ये कोरोना के कांटे
हर ओर मौन पसरा है,सन्नाटे ही सन्नाटे

मानव सामाजिक प्राणी,पर उसकी यह मजबूरी
रखना पड़ती अपनों से ,अब उसे बना कर दूरी
अपने सुख ,दुःख और पीड़ा,किसके संग,कैसे बांटे
चुभते है शूलों जैसे , ये कोरोना के कांटे

सब लोग है बंद घरों में ,सड़कें सुनसान पड़ी है
रुकगयी गति जीवन की,यह मुश्किल बहुत बड़ी है
कितने दिन चार दीवारी ,हो कैद जिंदगी काटें
चुभते है शूलों जैसे ,ये कोरोना के कांटे

मजदूर पलायन करते ,उत्पादन ठप्प है जबसे
सब व्यापारिक गतिविधियां ,मृतप्रायः पड़ी है तबसे
कैसे संभलेंगे ये सब ,हर रोज होरहे घाटे
चुभते है शूलों जैसे ,ये कोरोना के कांटे

यह कैसी भीषण विपदा ,सारी दुनिया में फैली
कर रही बहुत है पीड़ित ,अब और न जाए झेली
एक छोटे से वाइरस ने  ,सबको रख दिया हिलाके
चुभते है शूलों जैसे ,ये कोरोना  के कांटे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

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