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रविवार, 5 अगस्त 2018

तोड़ फोड़ 

कभी उछाले मार उदधि तोड़े मर्यादा 
तोड़ फोड़ पर कभी हवा होती आमादा 
तोड़ सभी तटबंध ,कभी सरिता बहती है 
तोड़ फोड़ तो जीवन में चलती रहती  है 
टूट  दूध के दांत पुनः फिर आ जाते है 
किन्तु बुढ़ापे में फिर टूट टूट जाते है 
रोज टूटते बाल  ,आप जब करते कंघी 
वृद्धावस्था आई,खोपड़ी होती  नंगी 
टूट डाल से फूल,बनाते सुन्दर माला 
टूट वृक्ष से फल भी देते  स्वाद निराला 
अपना कोई रूठ अगर जाता जीवन में 
तो जाता दिल टूट ,दर्द होता है मन में 
टूटा धागा अगर प्रेम का ,गाँठ पड़ेगी 
टूट जायेगे रिश्ते यदि जो बात बढ़ेगी 
साथ आपके अपनों का जब छूटा करता 
आसमान में कोई सितारा टूटा  करता 
किसी सुहागन से  किस्मत जब उसकी रूठे 
बुझ जाते अरमान,हाथ की चूड़ी टूटे 
टूट टूट कर भरी हुई है माँ में ममता 
नेता नहीं निभाते वादा ,टूटे जनता 
राजनीती में तोड़फोड़ होती  है हरदम 
पी मौसम्बी जूस ,तोड़ते नेता अनशन 
टूट आइना ,टुकड़े टुकड़े हो जाता है 
हर टुकड़े में पूरा अक्स नज़र आता है 
रूढ़िवाद को तोड़ रही है पीढ़ी नूतन 
मिलते प्रेमी युगल तोड़ कर सारे बंधन 
भाव टूटते है जब तो शेयर बाज़ार टूटता 
जब ज्यादा बढ़ जाता है तो परिवार टूटता 
होती गलतफहमियां है तो प्यार टूटता 
सांस टूटती है तो हमसे  संसार छूटता 
पिया मिलन की एक विरहन की सांस न टूटे 
कभी किसी का तुम पर से विश्वास न टूटे 
टूट  फूट घर की सम्भले है  ,रखरखाव से 
टूट  फूट जीवन की संवरे ,प्रेम भाव से 

घोटू 

आस बरसात की 

हुई व्याकुल धरा ग्रीष्म के त्रास से 
देखती थी गगन को बड़ी आस  से 
मित्र बादल ने जल सी भरी अंजुली 
सोचा बरसा दूँ शीतलता ,राहत भरी 
चाह उसकी अधूरी मगर रह गयी 
आयी सौतन हवा ,खींच संग ले गयी 
और आकाश सब देखता  ये रहा 
न कुछ इससे कहा ,न कुछ उससे कहा 
छेड़खानी ये आपस में चलती रही 
तप्त धरती अगन में तड़फती  रही 
लाख बादल घिरे कौंधी और बिजलियाँ 
प्यासी धरती का जलता रहा पर जिया 

घोटू 
पापा तो पापा होते है 

लाख मुश्किलें हो जीवन में ,कभी नहीं आपा खोते है 
पापा तो पापा  होते है 
हो संतान भले नाशुक्री ,लायक हो चाहे नालायक  
बेगाना व्यवहार अधिकतर  ,होता जिनका पीड़ादायक
अपने घर में ,अपनी ही सन्तानो से डरते रहते है 
पर बच्चे ,खुशहाल ,सुखी हो,यही दुआ करते रहते है 
घरवालों  के तिरस्कार से ,भरा बुढ़ापा वो  ढोते  है 
पापा तो पापा होते है 
भले विचारों में उनके और इनके हो पीढ़ी का अंतर 
भले बहू ने, आ  ,बेटे के ,कानो में फूँका हो  मंतर  
भले भुला उपकार समझते  बच्चे है उनको नाकारा 
किन्तु मुसीबत यदि आ जाए  ,बढ़ कर  देते यही सहारा 
एकाकीपन की पीड़ा से ,परेशान ,घुट कर  रोते है 
पापा तो पापा होते है 
उनसे आँख चुराने लगते ,जब उनकी आँखों के टुकड़े 
तो फिर भला कौन के आगे ,जा वो  रोवें अपने दुखड़े 
वो था जिन्हे सहारा देना ,वो ही कन्नी  काट रहे  है 
इज्जत देने के बदले वो ,मात पिता को डाट रहे  है 
फिर भी सदबुद्धि आएगी ,मन में सपन संजोते है 
पापा तो पापा होते है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

बुधवार, 1 अगस्त 2018

संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 

पंचतत्वों से मिल तुम हो ऐसी बनी
पूर्ण मुझको किया , बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 
तुम हवा हो हवा, बन के शीतल पवन ,
मेरे जीवन में लाना ,महक प्यार की 
भूल कर भी कभी ,बन के तूफ़ान तुम ,
लूटना मत ख़ुशी ,मेरे गुलजार की 
खुशबुओं से रहो ,तुम हमेशा सनी 
पूर्ण मुझको किया बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ  मेरी संगिनी 
तुम हो शीतल सा जल और जल ही रहो ,
मंद  सरिता सी बहती रहो तुम सदा 
तोडना ना कभी ,अपने तटबंध तुम ,
बाढ़ बन के न लाना ,कभी आपदा 
सबके मन को हरो ,कर के कल कल ध्वनि 
पूर्ण मुझको किया ,बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 
तुम अगन हो अगन, बाती दीपक की बन ,
जगमगाना प्रिये ,मेरे घर बार को
 बन के ज्वाला कभी तुम भड़कना नहीं ,
स्वाह करना न खुशियों के संसार को 
तुमसे जीवन में फैले सदा रौशनी 
पूर्ण मुझको किया बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 
तुम धरा हो धरा ,मातृरूपा बनो ,
सबका पोषण करो ,तुम रहो उर्वरा 
पेड़ पौधे फसल ,सारे फूले फले ,
तुम बंजर कभी भी न बनना जरा 
रहे हरियाली जीवन में हरदम बनी 
पूर्ण मुझको किया बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 
तुम हो आकाश विस्तृत ,भरा प्यार से ,
छा  रहा हर तरफ ,ओर ना छोर है 
बन के पंछी मैं उन्मुक्त उड़ता रहूँ ,
तेरी बाहों का बंधन चहुँ ऒर है 
मैं हूँ हंसा तेरा ,तू मेरी हंसिनी 
पूर्ण मुझको किया बन के अर्धांगिनी 
संगिनी ,ओ मेरी संगिनी 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

सोमवार, 30 जुलाई 2018

           जानवर और मुहावरे 

कितनी अच्छी अच्छी बातें,हमें जानवर है सिखलाते 
उनके कितने ही मुहावरे , हम  हैं  रोज  काम में लाते 
भैस चली जाती पानी में ,सांप छुछुंदर गति हो जाती 
और मार कर नौ सौ चूहे ,बिल्ली जी है हज को जाती 
अपनी गली मोहल्ले में  आ ,कुत्ता शेर हुआ करता है 
रंगा सियार पकड़ में आता ,जब वो हुआ,हुआ करता है 
बिल्ली गले कौन बांधेगा ,घंटी,चूहे सारे  डर जाते है  
कोयल और काग जब बोले , अंतर तभी  समझ पाते है 
बॉस दहाड़े दफ्तर में पर ,घर मे भीगी बिल्ली बनता 
सांप भले कितना टेढ़ा हो,पर बिल में है सीधा घुसता
 काटो नहीं ,मगर फुंफ़कारो ,तब ही सब दुनिया डरती है 
देती दूध ,गाय की  लातें , भी हमको सहनी पड़ती है 
मेरी बिल्ली ,मुझसे म्याँऊ ,कई बार ऐसा होता है 
झूंठी प्रीत दिखाने वाला ,घड़ियाली  आंसू  रोता है 
चूहे को चिंदी मिल जाती ,तो वह है बजाज बन जाता 
बाप मेंढकी तक ना मारी  , बेटा  तीरंदाज  कहाता 
कुवे के मेंढक की दुनिया ,कुवे में ही सिमटी  सब है 
आता ऊँट  पहाड़ के नीचे ,उसका गर्व टूटता  तब है 
भले दौड़ता हो तेजी से ,पर खरगोश हार जात्ता है 
कछुवा धीरे धीरे चल कर ,भी अपनी मंजिल पाता है 
रात बिछड़ते चकवा,चकवी ,चातक चाँद चूमना चाहे 
बन्दर क्या जाने अदरक का ,स्वाद भला कैसा होता है 
रोटी को जब झगड़े बिल्ली ,और बन्दर झगड़ा सुलझाये 
बन्दर बाँट इसे कहते है,सारी  रोटी खुद खा जाए 
कोई बछिया के ताऊ सा ,सांड बना हट्टा कट्टा है 
कोई उल्लू सीधा करता ,कोई उल्लू का पट्ठा  है 
मैं ,मैं, करे कोई बकरी सा ,सीधा गाय सरीखा कोई 
हाथी जब भी चले शान से ,कुत्ते भोंका करते यों  ही  
चींटी के पर निकला करते ,आता उसका अंतकाल है 
रंग बदलते है गिरगट  सा ,नेताओं का यही हाल है
कभी कभी केवल एक मछली ,कर देती गन्दा तालाब है 
जल में रहकर ,बैर मगर से ,हो जाती हालत खराब है 
उन्मादी जब होगा हाथी ,तहस नहस सब कुछ कर देगा 
है अनुमान लगाना मुश्किल,ऊँट कौन करवट  बैठेगा 
जहाँ लोमड़ी पहुँच न पाती,खट्टे वो अंगूर बताती 
डरते बन्दर की घुड़की से ,गीदड़ भभकी कभी डराती 
सीधे  है पर अति होने पर,गधे दुल्लती बरसाते है 
साधू बन शिकार जो करते ,बगुला भगत कहे जाते है 
ये सच है बकरे की अम्मा ,कब तक खैर मना पाएगी 
जिसकी भी लाठी में दम है ,भैस उसी की  हो जायेगी 
कौवा चलता चाल हंस की ,बेचारा पकड़ा  जाता है 
धोबी का कुत्ता ना घर का,और न घाट का रह पाता है 
 घोडा करे  घास से यारी ,तो खायेगा  क्या बेचारा 
जो देती है दूध ढेर सा ,उसी गाय को मिलता चारा 
दांत हाथियों के खाने के ,दिखलाने के अलग अलग है 
बातें कितनी हमें  ज्ञान की ,सिखलाते पशु,पक्षी सब है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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