एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

गुरुवार, 11 जून 2015

भगवान क्यों हुआ पत्थर का

          भगवान क्यों हुआ पत्थर का

भगवान ने दुनिया को बनाया
उसे नदी,पर्वत और झरनो से सजाया
वृक्ष विकसाये ,पुष्प महकने  लगे
तितलियाँ उड़ने लगी,पंछी चहकने लगे
और इसके बाद जब उसने इंसान को गढ़ा
तो उसे देख कर वह खुश हो गया बड़ा
उसके बाद उसने कुछ दिन तक विश्राम किया
और फिर अपनी सर्वोत्तम कृति ,
औरत का निर्माण किया
और उसे देख कर खुद मुग्ध हो गया विधाता था
बहुत कोशिश करता था उसे समझने की ,
लेकिन समझ न पाता था
पर एक दिन अचानक,ऐसी कुछ बात हो गयी
उसके बनाये आदमी की ,
उस औरत से मुलाक़ात हो गयी
और उनके बीच हो गया कुछ ऐसा आकर्षण
कि वो दोनों मिल कर ,तोड़ने लगे,
भगवान के बनाये हुए सब नियम
उन्होंने उसके बगीचे से तोड़ कर ,
खा लिया एक वर्जित फल
और उनमे आ गयी अकल
और फिर यह देख कर ईश्वर हो गया परेशान
जब वो दोनों मिल कर करने लगे,
खुद ही नर नारी का निर्माण
अपने कार्यक्षेत्र में इंसान की घुसपैठ देख ,
सर घूम गया ईश्वर का
उसको इतना झटका लगा ,
कि हो गया वो पत्थर का

घोटू
 

राजनीति

               राजनीति

राजनीति तो है एक गहरा समन्दर
लोग  मोती  ढूंढते  है  इसके  अंदर
कभी भी स्थिर नहीं रहता यहाँ जल
तरंगे उठती , सदा है  यहाँ हलचल
है बड़ा खारा यहाँ का मगर पानी
कभी आता ज्वार भाटा  या  सुनामी
हुआ करते नित निराले खेल भी है
बहुत सारी शार्क भी है,व्हेल  भी है
दांत जिनके तीखे है और बड़े जबड़े
रोज ही करते  घोटाले और लफ़ड़े
कई  मछुवारे यहां रोजी चलाते
डालते है जाल और मछली फंसाते
कुछ किनारे पर खड़े कुछ कर न पाते
कुशल गोताखोर मोती ढूंढ  लाते
मगर इसमें लोग घुस पाते तभी है
नंगे होकर ,खोलते कपडे  सभी  है
जो है नंगे ,दांत जिनके शार्क से है
रत्नाकर ये बस उन्ही के वास्ते है

घोटू

बुधवार, 10 जून 2015

जवानी के वो दिन

      जवानी के वो दिन

है याद जवानी के वो दिन ,था रूप तुम्हारा मायावी
मैं था दीवाना जोश भरा,अब उम्र हुई मुझ पर हावी
लेकिन मेरे दीवानेपन, का अब भी है वो ही आलम
है प्यार बढ़ गया उतना ही,जितना कि जोश हुआ है कम
अपनी धुंधलाई आँखों से ,तुम मुझे देखती मुस्का कर
मैं तब भी होता था पागल,मैं अब भी होता हूँ पागल
जब जब  भी हाथ पकड़ता हूँ  ,स्पर्श तुम्हारा मैं  पाता
बिजली सी दौड़ा करती है ,तन भी सिहरा सिहरा जाता
ये वृक्ष अभी भी खड़ा तना ,पर हरे रहे अब पान  नहीं
 फिर भी देते है मंद पवन ,माना लाते  तूफ़ान  नहीं
ये पुष्प भले ही सूख गए ,पर खुशबू अब भी है बाकी
मदिरा उतनी ही मादक है ,वो ही प्याला ,वो ही साकी
ये बात भले ही दीगर है,पीने की उतनी  ललक नहीं
गरमी अब भी अंगारों में ,माना की उतनी दहक नहीं
क्या हुआ अगर मै झुर्राया ,और त्वचा तुम्हारी है रूखी
उतना ही दूध गाय देती,हो घास हरी या   फिर  सूखी
सब जिम्मेदारी निपट गयी ,बच्चे खुश अपने अपने घर
अब बचे हुए बस हम और तुम,अवलम्बित एक दूसरे पर
अब भूल गए सब राग रंग,जीवन के बदले रंग ढंग
अब शिथिल हो रहे अंग अंग,और रूठ गया हमसे अनंग
ढल गयी जवानी,जोश गया ,मस्ती का मौसम बीत गया
आओ हम फिर से शुरू करें ,जीवन जीने का दौर  नया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

मंगलवार, 2 जून 2015

जल कितना नायाब हो गया

       जल कितना नायाब हो गया

 ये क्या  आज जनाब हो गया ,मिले शुद्ध जल,ख्वाब हो गया
  आबो हवा इस तरह बदली ,जीवन बड़ा , खराब हो गया
             बिकता आज ,बंद बोतल में ,जल कितना नायाब हो गया
मिला दूध संग ,दूध बन गया ,बहा गंदगी संग बन नाली
जिस रंग मिलता,उस रंग रंगता ,इस पानी की बात निराली
                मीठा कभी,कभी खारा है, मादक कभी शराब हो गया
सत्तर प्रतिशत पानी तन में ,फिर भी तन ,पानी को तरसा 
उड़ा ग्रीष्म में बादल बन कर,बारिश में रिमझिम कर बरसा
             बहा ले गया कितनो को ही ,उग्र हुआ ,सैलाब बन गया
पानी मिला ,लहू के संग तो,दौड़ गया ,तन की नस नस में
पानी ने ,खाना पचवाया ,  मिल कर आमाशय  के  रस में         
                 थोड़ा बन कर बहा पसीना ,बचा हुआ पेशाब हो गया
सुख में आँखों को पनियाया ,दुःख में आंसू बनकर टपका
कभी बहा बन गंगा ,जमुना ,सागर से मिलने को लपका
            सहमा रहा कभी कूवे में,और कभी तालाब बन गया
खेतों में ,बीजों को सींचा ,तो वह फसल बना ,लहलाया
बगिया में जब गया घूमने ,क्यारी क्यारी को महकाया
             नाचा कभी,जूही बेला संग ,तो फिर कभी गुलाब बन गया
कोई पीता  चुल्लू  भर कर,कोई डूबता चुल्लू भर में
कोई होता पानी पानी,कभी शरम में,या फिर डर में
                 पानी अगर ,चढ़ा चेहरे पर ,तो वह रूप,शबाब बन गया
पूजा में ,स्नान ध्यान में ,खानपान में जल का सम्बल
मंदिर में चरणामृत बनता ,शिवशंकर को चढ़ता है जल
              देख चाँद को उछला करता ,विष्णु का  आवास  हो गया
मैल दूसरों  का  हर लेता ,चाहे  खुद  हो  जाता  मैला
जल है अमृत ,जल है जीवन ,जलन मिटाता है अलबेला
            जम कर बरफ,वाष्प ऊष्मा से ,नारियल में छुप,डाब हो गया
             बिकता  आज बंद बोतल में ,जल कितना ,नायाब हो गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

हलचल अन्य ब्लोगों से 1-