जान-पहचान
किसी भी बहुमंजिला ईमारत में,
लिफ्ट ही है एक ऐसा स्थान
जहां बढाई जा सकती है जान पहचान
बस जरूरी है आपकी एक मुस्कान
लिफ्ट में आते जाते
कुछ लोग है मिल जाते
उन्हें देख कर मुस्कराइए
उन्होंने कौनसी मंजिल का बटन दबाया है,
पता लगाइए
कोई मोहतरमा ,अगर बच्चेवाली है,
तो बच्चे पर प्यार दर्शाइए
किसी के साथ कुत्ता हो तो कुत्ते को दुलराइये
जान पहचान को इस तरह बढ़ाना है
कि दूसरी तीसरी मुलाक़ात में,
फ्लेट नंबर और नाम का पता लगाना है
लोगों के स्वभाव का,उनके रिस्पोंस से पता लग जाएगा
कोई खडूस होगा,तो मुंह बनाएगा
और मिलनसार होगा,तो अगली बार ,
आपको देख कर खुद पहले मुस्कराएगा
याद रखिये,जान पहचान बढ़ाने की,
जितनी जरूरत आपको है,उनको भी है,
दो तीन मुलाकातों में ,
आप लिफ्ट में ही,दोस्ती की आहट सुन सकते है
और अपना पसंदीदा पडोसी दोस्त चुन सकते है
कभी उनको चाय पर बुलाइए
कभी उनके घर मिलने जाइये
और इस तरह,धीरे धीरे जान पहचान बढाइये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
796. पाँव तैयार नहीं
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पाँव तैयार नहीं
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राह सामने है, चलने को पाँव तैयार नहीं
खड़े रहने, अड़े रहने को पाँव मददगार नहीं
पाँव ज़ख़्मी हो गए, अब वे ठहरे रहेंगे
न ज़मीन न स्वर्ग की...
46 मिनट पहले
सुन्दर सृजन, बधाई.
जवाब देंहटाएंकृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें, आभारी होऊंगा.