आज तुम ना नहीं करना
जायेगा दिल टूट वरना
तुम सजी अभिसारिका सी,दे रही मुझको निमंत्रण
देख कर ये रूप मोहक, नहीं अब मन पर नियंत्रण
खोल घूंघट पट खड़ी हो,सजी अमृतघट सवांरे
जाल डोरों का गुलाबी ,नयन में पसरा तुम्हारे
आज आकुल और व्याकुल, बावरा है मन मिलन को
हो रहा है तन तरंगित,चैन ना बेचैन मन को
प्यार की उमड़ी नदी में,आ गया सैलाब सा है
आज दावानल धधकता,जल रहा तन आग सा है
आज सागर से मिलन को,सरिता बेकल हुई है
तोड़ सब तटबंध देगी, कामना पागल हुई है
और आदत है तुम्हारी,चाह कर भी, ना करोगी
बांह में जब बाँध लूँगा,समर्पण सम्पूर्ण दोगी
चाहता मै भी पिघलना,चाहती तुम भी पिघलना
टूट मर्यादा न जाये, बड़ा मुश्किल है संभलना
व्यर्थ में जाने न दूंगा,तुम्हारा सजना ,संवारना
केश सज्जा का तुम्हारी ,आज तो तय है बिखरना
आज तुम ना नहीं करना
जायेगा दिल टूट वरना
मदन मोहन बहेती'घोटू'
The Primacy of Inquisitiveness : Why & How The Honest Questions Spark True
& Unprecedented Learning
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Abstract
*In an era obsessed with immediate, hyper-intellectual smart solutions, the
fundamental essence of true learning gets often overlooked: t...
9 घंटे पहले
sundar post hae
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