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रविवार, 14 जुलाई 2019
【SEAnews:India Front Line Report】 July 11, 2019 (Thu) No. 3934
शनिवार, 13 जुलाई 2019
चेहरे पर शराफत है
लोगों में इज्जत है
पर ऐसी फितरत है
ताकझांक की आदत है
दिखती हुस्न की दौलत है
कर बैठता मोहब्बत है
कितना ही समझाओ ,नहीं आता बाज है
ये दिल ,बड़ा आशिक़ मिजाज है
बुढ़ापे का दौर है
नज़रें कमजोर है
मगर हुस्न खोर है
मिलता चितचोर है
होता रसविभोर हो
मांगने लगता मोर है
जाल फेंकने लगता ,बड़ा जालसाज़ है
ये दिल बड़ा आशिक़ मिज़ाज है
हुस्न को देख कर
हो जाता बेसबर
उछलता इधर उधर
जैसे लग जाते पर
मचलता है जिद कर
पाने को जाता अड़
इसकी आशिकी का ,निराला अंदाज है
ये दिल बड़ा आशिक़ मिज़ाज है
मीठी सी बोली है
बातें रस घोली है
सूरत भी भोली है
फैलाता झोली है
अगर प्रीत हो ली है
सच्चा हमजोली है
लूट जाता ,मिट जाता ,मोहब्बत पे नाज़ है
ये दिल ,बड़ा आशिक़ मिजाज है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
हे परमपिता ,आप तो सबके पालनकरता है
आप ही की कृपादृष्टि से सबका पेट भरता है
हे जगन्नाथ
आप चौबीसो घंटे रहते हो ड्यूटी पर तैनात
निश्चित ही थक जाते होंगे
परेशान हो कर पक जाते होंगे
इसलिए गर्मियों की फसल कट जाने के बाद ,
जब अन्न का भण्डारण हो जाता है घर घर
तब थोड़े से बेफ़िकर होकर
आप भी सोचते होंगे ,अभी कम है काम
कर लू थोड़ा सा आराम
यही सोच कर हे कमल नयन
आप चले जाते है करने को शयन
ठीक है ,थोड़ा आराम तो वाजिब है ,
पर आप तो लेटते ही ऐसे सपनो में खोते है
कि एक दो दिन नहीं ,
देव शयनी एकादशी से ,देवउठनी एकादशी तक,
पूरे चार माह तक सोते है
चार माह की लम्बी नींद ,
प्रभुजी ये तो 'टू मच 'है
कुम्भकरण भी इतना नहीं सोता होगा ,ये सच है
आप जैसा रिस्पोंसिबल देवता ,
क्या इतनी लम्बी नींद सोता है
क्या आपको पता है ,
आप जब सोते है ,क्या क्या होता है
आप जब सो जाते है
कोई भी शुभ काम नहीं हो पाते है
न शादी न विवाह
कंवारे भरते है आह ,
लोगों में असंतोष बढ़ता है
आपके सोने से ,
शादी करके साथ साथ सो सकने वाले ,
संभावित जोड़ों को अकेला सोना पड़ता है
जैसे स्कूल में अध्यापक जब छुट्टी पर जाते है
तो कक्षा के बच्चे मस्ती और मौज मनाते है
इसी तरह उधर आप सोते है माह चार
लोग मनाते है खूब त्यौहार
गुरु लोग ,अपनी पूजा करवा लेते है
गुरुपूर्णिमा मना लेते है
और शिवशंकर ,
भक्तों से कांवड़ में भरवा कर गंगाजल
अपने ऊपर चढ़वा लेते है
जल का भंडारण करवा लेते है
उधर आप शेषनाग की शैया पर सोये होते है ,
इधर नागपंचमी मन जाती है
हरियाले मौसम में हरियाली तीज आती है
मन जाता है रक्षाबंधन,भाईबहन के प्यार का त्योंहार
जन्मष्टमी को आप ले लेते है कृष्णावतार
और राधाष्टमी को राधारानी भी प्रकट हो जाती है
पंद्रह दिन का श्राद्धपक्ष और
नौ दिन की नवरात्रि आती है
विजयादशमी को आपके अवतार राम ,
रावण का हनन करके सीता को छुड़ा लाते है
शरद पूर्णिमा को आपके अवतार श्रीकृष्ण ,
गोपियों संग रास रचाते है
करवा चौथ पर सुहागिने व्रत कर के ,
अपने पति की लम्बी उमर का वरदान पाती है
और तो और आपकी पत्नी लक्ष्मीजी
आपको छोड़कर ,दीवाली पर ,
सबसे अपना पूजन करवाती है
अन्नकूट होता है ,सूर्यषष्ठी होती है
और गोवर्धन की भी पूजा होती है
मतलब हरदिन ,
कुछ न कुछ त्योंहार मनाये जाते है
आपके सोये रहने का लोग पूरा मजा उठाते है
हे परमेश्वर ,हम सब आपकी संताने है
नित्य काम करते है और आराम भी करते है नित्य
यही प्रकति का नियम है ,
तो हमारी समझ में नहीं आता ,
आपके चार माह लगातार सोने का औचित्य
आज जरूरी आपको ये बताना है
क्या ये आपकी कोई लीला है ,
या लक्ष्मीजी से पेअर दबवाने का बहाना है
ऐसे हालात होते क्यों है
हे भगवान ,आप इतने दिन सोते क्यों है ?
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
गुरुवार, 11 जुलाई 2019
समझ न पड़ता ,किस रस्ते पर ,आज जमाना आमादा है
काम भले ही कम होता है ,पर कॉम्पिटिशन ज्यादा है
कल बीबीजी का खत आया ,दो पन्नो में ,सौ अक्षर थे
उनमे भी आधे से ज्यादा ,प्यारे प्रियतम या डिअर थे
उनकी एक मैरिड बहन है ,हुआ बरस भर ही शादी को
मगर चीन से लड़ने के हित बढ़ा रही है आबादी को
तो मेरी उन सालीजी और बीबी में कॉम्पिटिशन है
किसका पति ज्यादा अच्छा ,किसमें लेटर लिखने का फ़न है
सौ बार भले ही नाम हमारा लिखदो पर लम्बा हो लेटर
अबके से मैं ही जीतूंगी ,अबके से हारेगी सिस्टर
तो अब बढ़ गयी भैया ,कॉम्पिटिशन तगड़ा होगा
दूर तमाशा देखे मुर्गी ,अब मुर्गो में झगड़ा होगा
मैंने साफ़ लिख दिया उनको ,जो तुम झगड़ो चीज चीज में
तुम जानो और काम तुम्हारा जाने मैं क्यों पडूँ बीच में
आज बात लेटर की ही है ,जाने कल बाजी लग जाए
देखें उनमे अब से पहले ,मौसी किसको कौन बनाये
बात औरतों की है भैया कौन खबर कल फिर बढ़ जाए
वो जीते जो सबसे पहले ,फूटबाल की टीम बनाये
फिर भी बात मान बीबी की ,लम्बा खत लिखने बैठा हूँ
देती दूध गाय की लात सहूंगा ,बनिए का बेटा हूँ
क्षमा कीजिये श्रीमती जी ,यदि लेटर में कुछ गलती है
क्योंकि लम्बा खत लिखना है ,इसीलिये कविता लिख दी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मुझको छोड़ अकेला घर में
गयी परीक्षा के चक्कर में
बीबीजी ने बी ए कर लिया ,पर आने का नाम नहीं था
इम्तहान मेरे धीरज का ,ये उनका इम्तहान नहीं था
उनके मन में डिग्री पाने की बस एक चाह थी केवल
मैंने उन्हें केजुअल छुट्टी ,दी थी एक माह की केवल
लेकिन बार बार एक्सटेंशन को उनने अप्लाय कर दिया
मेरे सभी तार और चिट्ठी ,को बस नो रिप्लाय कर दिया
और कैजुअल छुट्टी को जब ,अर्नलीव उनने कर डाला
एक बार यूं लगा पड़ गया है मेरी किस्मत पर ताला
मुझे न सिर्फ विरह की पीड़ा ,खाने की भी तो दिक्कत थी
सूना सूना घर लगता था चली गयी घर की रौनक थी
लेकिन तीर धनुष से छूटा ,लौट आना आसान नहीं था
इम्तहान मेरे धीरज का ,ये उनका इम्तहान नहीं था
गए राम वनवास मगर क्या वो सीता को छोड़ सके थे
पांडव गलने गए ,द्रौपदी से पर क्या मुख मोड़ सके थे
किसको कौन छोड़ता है जी ,रावण जब सीता ले भागा
हुआ भयंकर युद्ध ,राम ने ,अरे समंदर भी था लांघा
लेकिन मेरा धीरज देखो ,देखो मेरी मर्यादा को
रहा अकेला बिन बीबी के ,सात माह से भी ज्यादा को
सात माह किसको कहते है ,दो सौ दिन और दो सौ रातें
जी हाँ मैं इसका सबूत हूँ ,मैंने स्वयं अकेले काटे
सच बतलाना मुझको क्या यह ,मेरा त्याग महान नहीं था
इम्तहान मेरे धीरज का ,ये उनका इम्तहान नहीं था
कोई मेरे दिल से पूछे ,कैसे महीने सात गुजारे
मैं उन बिन कितना तड़फा हूँ ,रात गुजारी गिन गिन तारे
एक एक दिन महीने सा था ,बरस बरस सी रात लगी थी
प्राणप्रिया बिन जिया ,जिंदगी मुझको बड़ी अनाथ लगी थी
यही ख़ुशी है ,इस जुदाई में ,थोड़ा पैसा जोड़ सका हूँ
उनकी धमकी से न डर सकूं ,खुद को ऐसा मोड़ सका हूँ
वैसे भी मैं रहा लाभ में ,बनिए का बेटा हूँ भाई
गयी अकेली ,ब्याज सहित वो ,दो होकर के वापस आयी
यही मिला है फल धीरज का ,इसमें भी नुक्सान नहीं था
इम्तहान मेरे धीरज का ,ये उनका इम्तहान नहीं था
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बुधवार, 10 जुलाई 2019
न तेरे हुस्न में बाकी वो करारापन है
न मुझमे बेकरारी और वो बावलापन है
होगये इतने बरस ,हमने निभाये रिश्ते ,
आज भी संग है,खुश है,भला ये क्या कम है
बीच में कितने ही झगडे हुए ,तकरार हुई ,
हममे से कोई झुका अपना अहम छोड़ दिया
हमारे रिश्तों में जब जब पड़ी दरार कोई ,
उसे सीमेंट से समझौते की ले जोड़ दिया
कभी ठन्डे थे कभी गर्म ,कभी बरसे भी ,
अपने रिश्ते रहे ,जैसे बदलता मौसम है
हो गए इतने बरस ,हमने निभाये रिश्ते ,
आज भी संग है ,खुश है ,भला ये क्या कम है
ख्वाइशें सभी के मन में हजारों होती है ,
नहीं जरूरी है कि सब की सब ही हो पूरी
कोई संतुष्ट नहीं रहता सदा जीवन में ,
कुछ न कुछ तो कहीं पे आ ही जाती मजबूरी
जो भी मिल जाए ,मुकद्दर समझ के खुश हो लो,
कभी है जिंदगी में खुशियां तो कभी गम है
हो गए इतने बरस ,हमने निभाए रिश्ते ,
आज भी संग है ,खुश है भला ये क्या कम है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
शुक्रवार, 5 जुलाई 2019
साफ़ मैं कहता हूँ वो बात जो हक़ीक़त है ,
जो सही लगती वही मन की बात करता हूँ
जेठ की चिलचिलाती धूप में और गरमी में ,
कभी भी मैं नहीं सावन की बात करता हूँ
झांकती रहती हो जब मोटे मोटे चश्मे से ,
कैसे कह दूँ ,नज़र के तीर तुम चलाती हो
कैसे बतलाऊँ घटा काली जुल्फ तुम्हारी ,
सफेदी उनमे अगर साफ़ नज़र आती हो
तुम्हारे होठों को शोला नहीं बता सकता ,
पसीने को नहीं सबनम की बात करता हूँ
साफ़ मैं कहता हूँ वो बात जो हक़ीक़त है ,
जो सही लगती वही मन की बात करता हूँ
कैसे कह दूँ तुम्हारी चाल है हिरन जैसी ,
दर्द है घुटने में और पाँव एक लचकता है
नहीं कह सकता कली ,पंखुड़ी पंखुड़ी बिखरी है ,
बुढ़ापा साफ़ तेरे अंगो से झलकता है
तुम्हारे चेहरे की सारी लुनाई गायब है ,
रहा ना अब बदन रेशम की बात करता हूँ
साफ़ मैं कहता हूँ वो बात जो हक़ीक़त है ,
जो सही लगती वही मन की बात करता हूँ
कैसे कह दूँ कि तेरा जलवा कयामत होता ,
देख कर मुझको कभी तुमजो मुस्कराती हो
सच तो ये है कि जब भी गुस्सा तुम्हे आता है ,
आता तूफ़ान ,क़यामत तुम घर में ढाती हो
तेरे दांतों को मैं मोती नहीं बता सकता ,
जीभ पर रखने नियंत्रण की बात करता हूँ
साफ़ कहता हूँ वो बात जो हक़ीक़त है
जो सही लगती वही मन की बात करता हूँ
कैसे कह दूँ बड़ी मीठी है तुम्हारी पप्पी ,
मैंने तो अब तलक पाया कभी मिठास नहीं
बदन तुम्हारा ये नमकीन तो है हो सकता
पसीने वाला बदन ,आता मुझको रास नहीं
इशारों पर तुम्हारे ,नाच मै नहीं सकता ,
इसलिए प्यार के बंधन की बात करता हूँ
साफ़ कहता हूँ वो बात जो हक़ीक़त है ,
जो सही लगती वही मन की बात करता हूँ
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
गुरुवार, 4 जुलाई 2019
कल पत्नीजी ने फ़रमाया
कि बढ़ती हुई उमर के साथ
कमजोर होती जारही है उनकी याददाश्त
आजकल वो कई बार ,
कई लोगों के नाम भूल जाती है
किसी काम के लिये निकलती है
पर वो काम भूल जाती है
कोई चीज कहीं पर रख कर ,
ऐसी दिमाग से उतरती है
कि उसकी तलाश ,
उसे दिन भर परेशान करती है
कई बार दूध गैस पर चढ़ा देती है
पर ध्यान नहीं रहता है
पता तब लगता है जब दूध ,
उफन कर गैस स्टोव पर बहता है
ये बुढ़ापे के आने की निशानी है
ये याददाश्त का इस तरह होना कम
लगता है अब धीरे धीरे ,
बूढ़े होते जा रहे है हम
मैंने कहा सच कहती हो उस दिन ,
जब पार्टी में मैंने तुम्हे 'हनी 'कह कर पुकारा था
आश्चर्य और शर्म से चेहरा लाल हो गया तुम्हारा था
तुम शर्माती हुई मेरे पास आयी थी
बड़ी अदा से मुस्कराई थी
और बोली थी की जवानी में ,
जब आप मुझ पर मरते थे
तब मुझे 'हनी 'पुकारा करते थे
आज अचानक मुझ पर ,
इतना प्यार कैसे उमड़ आया है
मुझे हनी कह कर बुलाया है
मैंने उसे तो बहला दिया यह कहकर
तुम्हारा रूप लग रहा था जवानी से भी बेहतर
पर हक़ीक़त को मै कैसे करता उसके आगे कबूल
दरअसल मै नाम ही उसका गया था भूल
जब बहुत सोचने पर भी नाम याद नहीं आया
मैंने 'उनको हनी 'कह कर था बुलाया
पर ये सच है कि जैसे जैसे ,
उमर आगे की और दौड़ती है
आदमी की याददाश्त घट जाती है ,
पर पुरानी यादें पीछा नहीं छोड़ती है
एक तरफ ताज़ी बाते भूलने लगती है
दूसरी तरफ पुरानी यादों की फाइल खुलने लगती है
ये भूलने की बिमारी
पड़ती है सब पर भारी
पर ये भूलने का रोग बड़ा अलबेला है
इसे हमने बुढ़ापे में ही नहीं ,जवानी में भी झेला है
मुझे याद है जब हमें प्यार हुआ था
जिंदगी में पहली पहली बार हुआ था
हम तुम्हारे प्यार में इतना मशगूल हुए थे
यादो में खोये रहते,,खानापीना भूल गए थे
तुम्हे प्रेमपत्र लिख कर पोस्टबॉक्स में डाल आते थे
पर उस पर टिकिट लगाना भूल जाते थे
तुमने पहली नज़र में ,मेरा दिल चुरा लिया था
बदले में मैंने अपना दिल तुमको दिया था
और फिर हम दोनों प्यार में इस कदर खोगये थे
कि ताउम्र एक दुसरे के हो गए थे
और हमारे इश्क़ की भूल की ,
ये दास्ताँ इसलिए ख़ास है
कि आज भी मेरा दिल तुम्हारे पास और
तुम्हारा दिल मेरे पास है
एक दुसरे के दिल में धड़कता है
बिना मिले चैन नहीं पड़ता है
आजकल जवानी में भूलने का,
एक और अंदाज नज़र आने लगा है
जो बुजुर्गों को सताने लगा है
जब माँ बाप बूढ़े और लाचार हो जाते है
जवान बच्चे उन्हें तिरस्कृत कर भुलाते है
वो ये भूल जाते है कि जवानी की इस भूल के
परिणाम उन्हें भी भुगतने पड़ेंगे
जब वो बूढ़े होंगे तो उनके बच्चे भी ,
उनकी और ध्यान नहीं देंगे
इसलिए भूल कर भी अपने बूढ़े माबाप को मत भूलना ,
वर्ना ये होगी आपके जीवन की सबसे बड़ी भूल
उनके आशीर्वाद आपके लिए वरदान है ,
और चन्दन होती है उनके पांवों की धूल
उस धूल को अपने सर पर चढ़ाओ
और सदा सुखी रहने का आशीर्वाद पाओ
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुम पहले जैसे रहे
पहले मेरे हर नहले पर ,तुम दहला मारा करते थे ,
अब बस चौकी,पंजी,छक्की ,तुम दहले जैसे नहीं रहे
तुम पहले जैसे नहीं रहे
खाते थे चार पराठें तब ,अब खाते हो रोटी लूखी
चेहरे की लुनाई गायब है ,सूरत लगती सूखी सूखी
शौक़ीन जलेबी हलवे के करते मिठाई से बहुत प्यार
गाढ़ा कढ़ाई का दूध गरम ,कुल्हड़ भर पी, लेते डकार
चाहत थी चाट पकोड़ी की,आलू टिक्की से उल्फत थी
कुल्फी फालूदा रबड़ी से ,मुझसे भी अधिक मोहब्बत थी
अब इन चीजों को देख देख ,ललचाते पर कतराते हो
डॉक्टर ने मना किया कह कर ,खुद पर कन्ट्रोल लगाते हो
ना पहले जैसा जज्बा है ,ना पहले जैसी हिम्मत है
ना ललक रही पहले जैसी ,ना पहले जैसी चाहत है
जिनकी हरएक हरकत पर मैं ,मर जाती थी,मिट जाती थी ,
मुझको पगला देने वाले अलबेले जैसे नहीं रहे
तुम पहले जैसे नहीं रहे
ना पहले सी मीठी बातें ,मिलने का अब वो चाव नहीं
तुमको मुझसे ,पहले जैसा , शायद अब रहा लगाव नहीं
लगता अपने संबंधों में , बदलाव आ गया कुछ ऐसे
पहले हम प्रेमी होते थे ,अब बस मियां बीबी जैसे
था नदी पहाड़ी सा जीवन ,उच्श्रंखल और उछलता सा
आया मैदानी इलाके में ,अब मंथर गति से चलता सा
वो गया जमाना जब होती ,मेरी पसंद ,तेरी पसंद
तब हम बेफिकरे होते थे ,अब एक दूजे की फिकरमंद
ये नहीं जानना आवश्यक ,कि किसने किसको बदला है
यह खेल उमर बढ़ती का है ,जिसने कि हमको बदला है
है तन की ऊर्जा घटी हुई ,जिम्मेदारी भी बढ़ी हुई ,
बिन आपा खोये ,उंच नीच ,सब सहले ,वैसे नहीं रहे
तुम पहले जैसे नहीं रहे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
रविवार, 30 जून 2019
कोई कहता रूप तुम्हारा है कातिल
तुम जालिम हो ,तुमने लूट लिया है दिल
कोई कहता अदा तेरी मतवाली है
चुरा लिया दिल,तूने नींद चुराली है
कोई कहता ,तेरा हुस्न निराला है
जादूगरनी हो,जादू कर डाला है
बहेलिया हो ,रूपजाल में फंसा लिया
मुझे कैद कर ,अपने दिल में बसा लिया
तू है तीरंदाज ,तेरे नयना चंचल
चला चला कर तीर किया मुझको घायल
कोई कहता तू है पूरी मधुशाला
बूँद बूँद में नशा रूप तेरा हाला
रात रात भर ,सपनो में है तू आती
रूप,अदा से मेरे दिल को तड़फ़ाती
सच्चे दिल से तुझे प्यार मैं करता हूँ
तेरी याद में ठंडी आहें भरता हूँ
तू कातिल है ,जालिम और लुटेरी है
जादूगरनी ,चोर बड़ी अलबेली है
तीर चला नैनों से घायल कर देती
रूपजाल में फंसा ,कैद दिल कर लेती
तेरे संग जीने की चाहत करता हूँ
फिर भी कहता हूँ मैं तुझ पर मरता हूँ
घोटू
महत्वकांक्षाये मत पालो ,हर दिन बढ़ती ही जाती है
बहुत हृदय को दुःख देती है ,पूर्ण नहीं जब हो पाती है
सुख दुःख आते ऋतुओं जैसे ,हर ऋतू सदा बसंत नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
कभी किसी से करो न आशा ,चाहे अपने हो कि पराये
निकले पंख ,सीख कर उड़ना ,नीड छोड़ ,बच्चे उड़ जाये
कोई किसी का साथ निभाता ,है जीवन पर्यन्त नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
तुम चाहे कितना भी धो लो,किन्तु सफ़ेद न होता काजल
श्वान पूंछ सीधी ना होती ,रखो नली में लाख दबाकर
सुन्दर पुष्प दिखे कागज के ,आती मगर सुगन्ध नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
कभी एक को ,दो को दस को ,तो तुम मुर्ख बना सकते हो
ऊंचे ऊंचे सपन दिखा कर ,तुम बहला फुसला सकते हो
किन्तु तुम्हारा बड़बोलापन ,करता कोई पसंद नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
बात बात पर पंगा मत लो ,कहीं कोई दंगा ना करदे
पोल तुम्हारी हाथ आगयी ,तो तुमको नंगा ना करदे
मिलजुल रहो ,प्रेम से बढ़ कर ,कहीं कोई आनंद नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
तुम्हारी एक एक हरकत को ,नज़र हरेक की देख रही है
समझे ना तुम्हारी मंशा ,दुनिया इतनी मुर्ख नहीं है
जो भी बोलो ,तौल मोल कर,गप्पों पर प्रतिबंध नहीं है
इच्छाओं का अंत नहीं है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तेल विहीन केश है सूखे , दाढ़ी बढ़ी ,नहीं कटवाते
फटी हुई और तार तार सी ,जीन्स पहन कर है इतराते
कंगालों सा बना हुलिया ,जाने क्या इनके मन में है
आज गरीबी फैशन में है
खाली जेब ,पास ना पैसा ,बात बात में करें उधारी
क्रेडिट कार्ड ,बैंक का कर्जा ,लोन चुकाओ ,मारामारी
घर और कार ,फ्रिज ,फर्नीचर ,सभी बैंक के बंधन में है
आज गरीबी फैशन में है
पूरा दिन भर ,पति और पत्नी ,ड्यूटी पर जाते रोजाना
जंक फ़ूड से पेट भर रहे, ना नसीब में ताज़ा खाना
,अस्त व्यस्त और पस्त जिंदगी नहीं कोई सुख जीवन में है
आज गरीबी फैशन में है
मदन मोहन बाहेती'घोटू '
गुरुवार, 27 जून 2019
एक जमाना था जब
जैसे ही बच्चों की परीक्षायें निपटती थी
और गर्मी की छुट्टी लगती थी
हमारी पत्नीजी ,बच्चों के साथ ,
सीधे अपने मायके भगती थी
वैसा ही प्रोग्राम उनकी बहनो का भी होता था
जो देर सबेर अपने बच्चों के साथ ,
मायके आ धमकती थी
और जब सब बहने इकट्ठी हो जाती थी
तो ससुराल की व्यस्त जिंदगी से दूर ,
बच्चों की छुट्टियों के साथ साथ ,
खुद भी छुट्टियां मनाती थी
बस दिन भर खाना पीना और गप्पे मारना
इनका शगल होता था
बच्चे मिलजुल कर ,धमाल चौकड़ी मचाते थे ,
घर में खूब कोलाहल होता था
जब पूरा कुनबा जुड़ता था
तो उनकी माँ का भी पूरा प्यार उमड़ता था
रोज बनाये जाते थे तरह तरह के पकवान
और मंगाये जाते थे टोकरे भर आम
जिन्हे सब रात को छत पर बैठ कर खाया करते थे
देर तक गप्पे मारते और
रात को वहीँ सो जाया करते थे
मायके में बीबियां मनाती थी टोटल छुट्टी
भाई बहन से मेलमिलाप और पतिदेव से कुट्टी
बेचारे पतिदेव ,अकेले ,रूखी सूखी
या जैसी भी बन पड़ती ,खाया करते थे
और छुट्टियों के दिन गिनते हुए ,
कैसे भी तन्हाई में अपना काम चलाया करते थे
तब की छुट्टियां और आजकल की छुट्टिया ,
इनमे होता था बड़ा फर्क
तब आजकल की तरह नहीं होता था
छुटियों के लिए कोई होमवर्क या प्रोजेक्ट वर्क
वर्ना आजकल की छुट्टियों में तो बच्चों का
हो जाता है बेड़ा गर्क
बस कहीं कहीं ,आठ दस दिन के लिए ,
'समरकेम्प 'लगाए जाते है
जहाँ थोड़े खेलकूद और कुछ हुनर सिखाये जाते है
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ,
अनुशासन में रहने को कहा जाता है
और इसमें भी बड़ा खर्चा आता है
पर उन दिनों छुटियों में बेफिक्र ,
दादा दादी या नाना नानी के घर जाना
परिवार के अन्य बच्चों के साथ मिल कर
मस्तियाँ करना और मजे उठाना
दरअसल ये भी एक तरह के 'समरकेम्प 'होते थे
जहाँ चचेरे ,ममेरे और फुफेरे भाई बहन ,
साथ साथ रह कर ,भाईचारे के बीज बोते थे
एक दुसरे से अच्छी पहचान और प्यार बढ़ाया जाता था
ये वो समरकेम्प होते थे जहाँ ,
संयुक्त परिवार के सुख और
रिश्तेदारी निभाने का पाठ पढ़ाया जाता था
इनमे बच्चे ,खेल खेल में या स्पर्धा में
या नानी दादी से शाबाशी पाने
बहुत कुछ सीख जाया करते थे
रिश्तों की अहमियत पहचान जाया करते थे
मौसियों,भुआओ और मामियो से प्यार बढ़ता था
इस मेलजोल से उनका व्यक्तित्व निखरता था
बचपन में हर वर्ष ,कुछ दिन ,
साथ साथ रहने से ,रिश्ते इतने पनपते थे
कि वो ताउम्र अच्छी तरह निभते थे
वरना आज के कई बच्चे अपने ,
चचरे ,ममेरे और फुफेरे भाई बहनो को ,
जिन्हे आजकल 'कजिन ' कहते है ,
अच्छी तरह जानते तक नहीं है
पहचानते तक नहीं है
इसका कारण हम आजकल पहले जैसी ,
गर्मी की छुट्टियां नहीं मना रहे है
इसलिए भाईचारे के पौधे सूखते जारहे है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बुधवार, 26 जून 2019
कहीं कोई सुन्दर सी लड़की ,जो दिख जाती है ,
कैसे भी हम उसे पटायें ,मन तो करता है
वस्त्र चीर कर ,रूप रश्मि जब ,झलक दिखाती है ,
बार बार हम दर्शन पायें ,मन तो करता है
नीला अम्बर ,मस्त पवन और दूप सुनहरी है ,
बन विहंग ,हम भी उड़ जायें ,मन तो करता है
सिकते हो भुट्टे और सौंधी खुशबू आती हो ,
चबा न पायें ,लेकिन खाएं ,मन तो करता है
शुगर बढ़ी ,मिष्ठान मना पर गरम जलेबी है ,
जी ललचाये ,खा ना पाएं ,मन तो करता है
उम्र बढ़ गयी ,शिथिल हुआ तन ,हिम्मत नहीं रही ,
पर यौवन सुख ,फिर से पाएं ,मन तो करता है
चार कदम चल लेने पर भी ,सांस फूलती है ,
कभी कभी हम दौड़ लगाएं ,मन तो करता है
दीवाना ,मतवाला लोभी मचला करता है ,
कैसे, कौन इसे समझाए मन तो करता है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मन विदीर्ण
तन जीर्ण शीर्ण
आईने के पीछे वो कौन शख्स खड़ा है
उम्र में लगता ,मुझसे बहुत बड़ा है
रह रह कर
पीड़ाये सह सह कर
उसकी आँखें पथरा गयी है
चेहरे पर उदासी छा गयी है
मायूसियों ने उसे घेर लिया है
खुशियों ने मुंह फेर लिया है
देखो चेहरा कैसा मुरझाया पड़ा है
आईने के पीछे वो कौन शख्स खड़ा है
क्या वो मैं हूँ या मेरा अक्स है
नहीं नहीं ,वो मैं नहीं हो सकता ,
वो तो कोई दूसरा ही शख्स है
मैं तो हँसता हूँ ,गाता हूँ
हरदम मुस्काता हूँ
चौकन्ना और चुस्त हूँ
एकदम दुरुस्त हूँ
मेरे मन में सबके लिए प्यार बसा है
मुझमे जीने की लालसा है
उदासियाँ मुझसे कोसों दूर है
मेरी जिंदादिली मशहूर है
उम्र कितनी भी हो जाय ,
मैं खुशियां खो नहीं सकता
इसके जैसा मेरा हाल हो नहीं सकता
इस पर तो मनहूसियत का रंग चढ़ा है
आईने के पीछे ,वो कौन शख्स खड़ा है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' ,
सोमवार, 24 जून 2019
सास बोली बहू से कि ,तू नई है
बुरे अच्छे का पता तुझको नहीं है
जो भी करती आई मैं ,वो ही सहीहै
मुझसे अच्छा ,घर में कोई भी नहीं है
मुझको मालुम ,घर को कैसे सजाते है
मुझको मालुम,पैसा कैसे बचाते है
तू नयी ,नौसिखिया ,तूने न जाना
कितना मुश्किल ,सफलता से घर चलाना
जवानी के गर्व में इठला न किंचित
मोहल्ले के सभी है मेरे परिचित
बात मेरी ,गाँव सारा मानता है
तुझको मुश्किल से ही कोई जानता है
मैं बड़ी हूँ ,तुझे यदि ना भान होगा
सासपन मेरा यूं ही कुरबान होगा
चुप न रह पाती भले आराम में हूँ
ढूंढती कमियां तेरे हर काम में हूँ
कहीं ऐसा न हो तू गर्वान्वित हो
लोगों का दिल जीत ले,लाभान्वित हो
भूल मत ,मैंने बहू तुझको बनाया
भूल मत ,सर पर तुझे मैंने चढ़ाया
क्या पता था ,बजा तू यूं बीन देगी
मुझसे ही तू मेरा बेटा छीन लेगी
इसलिए सुन ,बढ़ न तू मुझसे अगाडी
तू अनाडी ,और पुरानी मैं खिलाड़ी
अनुभव और ज्ञान का अहसास हूँ मैं
बात मेरी मान ,तेरी सास हूँ मैं
बहू बोली ,सास बलिहारी तुम्हारी
तुम्हारे पद चिन्ह पर चल रही सारी
सिर्फ मेरी सोच में है कुछ समर्पण
पाएं घरवाले ख़ुशी ,कर रही अर्पण
तन और मन से ,जो भी मुझसे बन सका है
फिर भी माथा आपका क्यों ठनकता है
भूल सकता कौन है तुम्हारी हस्ती
बहुत दिन तक चलाई तुमने गृहस्थी
थक गयी होगी ,जरा आराम देखो
शांति से मैं कर रही वो काम देखो
लालसा सत्ता की है जो भी हटा दो
मन में लालच है अगर ,उसको घटा दो
आपने की सेवा ,पाया खूब मेवा
छोड़ गृहसेवा ,करो अब प्रभु सेवा
घोटू
अब दीवारें फांदने के दिन गये
हसीनो को साधने के दिन गये गये
हुआ जो तुमको किसी से प्यार है
पहुँचने के लिए घर का द्वार है
खिड़कियों से झाँकने के दिन गये
अब दीवारें फांदने के दिन गये
ढला ही करती सभी की उमर है
दिल का आना पर न कोई जुरम है
प्यार के अधिकार तो ना छिन गये
अब दीवारें फांदने के दिन गये
सब के मन में मचलता रोमांस है
हरेक को पर नहीं मिलता चांस है
ढूंढ लो तुम,मिलन के पल छिन नये
अब दीवारें फांदने के दिन गये
खुल अब ना खेलने की है उमर
मिले जितना ,करो उससे ही सबर
अब छलांगे मारने के दिन गये
अब दीवारें फांदने के दिन गये
घोटू
रविवार, 23 जून 2019
किसी ने मुझसे पूछा यार ये इज्जत क्या है
सभी की नाक में दम ,इसने कर के रख्खा है
कहा हमने किसी के, जब भी छुए जाते चरण
इसका मतलब है कि उसकी इज्जत करते हम
कोई धनवान है तो उसकी बड़ी इज्जत है
कोई बलवान है तो उसकी बड़ी इज्जत है
कोई सत्ता में है तो लोग करते है इज्जत
कोई को दिलवाता इज्जत है उसका ऊंचा पद
देश की इज्जत को सैनिक शहीद हो जाते
बढ़ती इज्जत ,खिलाड़ी ,जीत पदक जब लाते
किसीको सर झुकाओ ,नमस्कार प्रणाम करो
कहो आदाब अर्ज ,झुक के या सलाम करो
ये तो इज्जत के प्रदर्शन के सब तरीके है
जो कि सब हमने अपने बुजुर्गों से सीखे है
ये इज्जत क्या है और ये रहती कहाँ पर है
किसी के सर की पगड़ी इज्जत का उसकी घर है
कोई की नाक ऊंची ,याने कि इज्जत उसकी
गयी इज्जत तो समझो नाक कट गयी उसकी
कभी घटती है इज्जत तो नज़र झुक जाती
पकड़ के कान ,बनो मुर्गा तो इज्जत जाती
कोई की इज्जत उसकी मूछों में नज़र आती
मूंछ बाल हुआ बांका ,इज्जत घट जाती
टेकना घुटने ,किसी आगे ,घटाता इज्जत
आपके हाथों में रहती है आपकी इज्जत
आपके वस्त्र भी इज्जत को ढका करते है
गलती की ,दाग फिर इज्जत पे लगा करते है
काम अच्छे करो ,इज्जत कमाई जाती है
गलत हो काम तो इज्जत गमाई जाती है
कहीं नीलाम होती और कहीं बेचीं जाती
धूल हो जाती कहीं मिट्टी में ये मिल जाती
जरा सी भूल से इज्जत पे बट्टा लग जाता
डूब जाती है या फिर उसपे पानी फिर जाता
कभी उतारी कभी लूटी जाती है इज्जत ,
ये घटित होता है माँ और बहनो संग जब तब
फेल बेटा हुआ ,माँ बाप की इज्जत जाती
अच्छे कॉलेज में पढता है तो इज्जत आती
ये इज्जत अहम् है ,व्यवहार की प्रक्रिया है
बड़ा मुश्किल है समझना कि ये इज्जत क्या है
छोड़ दो शान झूठी ,जड़ है जो फ़जीहत की
चैन से जियो ,खाओ ,दाल रोटी इज्जत की
मदन मोहन बाहेती ;घोटू '
हमें वो प्यार की बातें पुरानी याद आती है
एक राजा याद आता है एक रानी याद आती है
जवानी में कभी ना ख्याल तक आया बुढ़ापे का ,
बुढ़ापा आगया तो अब जवानी याद आती है
सुनहरे होते थे दिन और रंगीली रात होती थी ,
हवा में उड़ते थे ,साँझें सुहानी याद आती है
बहुत पुश्तैनी दौलत थी,उड़ादी यूं ही मस्ती में ,
अब करना काम पड़ता है तो नानी याद आती है
सुनु में माँ की या फिर बात अपनी बीबी की मानूँ ,
मुसीबत मेरी ,उनकी खींचातानी याद आती है
बुढ़ापे में सहारे की ,बड़ी उम्मीद थी जिनसे ,
न पूंछें ,बच्चों की हरकत ,बेगानी याद आती है
तभी कोने से एक दिल के ,आई आवाज ये 'घोटू '
नहीं ये मेरी, घर घर की ,कहानी याद आती है
घोटू
हमें बचपन की वो बातें सुहानी याद आती है
बेफिकर छुट्टी गरमी की मनानी याद आती है
जहाँ हम खेलते थे कंचे और लट्टू घुमाते थे ,
पेड़ की छाँव, वो पीपल पुरानी याद आती है
वो पानी के पताशे ,आलू टिक्की ,दही के भल्ले ,
चाट वो भरती थी जो मुंह में पानी ,याद आती है
तली जो देशी घी में ,चासनी में डूब इतराती ,
जलेबी वो रसीली और सुहानी याद आती है
तपिश मुंह की मिटाते ,रंगबिरंगे बर्फ के गोले ,
मलाई दूध की कुल्फी जमानी याद आती है
चौकड़ी खेलते थे रोज पत्ते पीसते जिसके ,
हमें वो ताश की गड्डी ,पुरानी याद आती है
कभी हम तोड़ते थे दूर से ही मार कर पत्थर ,
कभी वो पेड़ पर चढ़ ,जामुन खानी याद आती है
कोई कपडा न बचता ,जिसपे ना हो आम के धब्बे ,
रोज वो डाट हमको माँ की खानी याद आती है
हमारे हाथ में पकड़ाती थी चुपके से दुअन्नी ,
उमड़ता प्यार आँखों में ,वो नानी याद आती है
वो छत पर पागलों सा भीगना ,बरसात होने पर ,
नाव कागज़ की ,पानी में तैरानी याद आती है
वो लंगड़े भूत के किस्से ,जिन्हे सुनसुन के डर लगता,
चाव से सुनते दादी की ,कहानी याद आती है
झपकते ही पलक ,छुट्टी का मौसम बीत जाता था ,
खुलते स्कूल ,बढ़ती परेशानी याद आती है
घोटू
शनिवार, 22 जून 2019
प्यार लैला ने मजनू से किया
शीरी ने फरहाद से किया
सोहनी ने महिवाल से किया
इन सबका प्यार था लाजबाब
फिर भी ये मिलने में रहे नाकामयाब
एक दुसरे से सदा के लिए दूर हो गए
पर उनके प्यार के किस्से मशहूर हो गए
प्यार राधा ने कृष्ण से किया ,
पर पूरी नहीं हो पायी उसकी चाह
कृष्णजी ने उसे छोड़ ,
आठ आठ पटरानियों से किया विवाह
और सभी के साथ ,
कुशलता से किया था निर्वाह
एक पति द्वारा कई पत्नियों को रख पाना
राजा रजवाड़ों का प्रचलन है पुराना
मुस्लिम धर्म में भी वाजिब है तीन निकाह
पर हिन्दू कानूनन कर सकते है एक ही विवाह
क्योंकि हमने जन्म से पाए है ऐसे संस्कार
चाहते न चाहते हुए भी ,
एक पत्नी के साथ जिंदगी देते है गुजार
पर एक पत्नी के कई पति होना ,
ऐसा किंचित ही होता पाया था
वो तो महाभारत काल में ,
एक मात्र द्रौपदी थी ,
जिसने पांच पांच पतियों का साथ ,
बखूबी निभाया था
पर हमारे जीवन में आज भी एक अद्भुत मिसाल है
एक नाजुक सी मुलायम पत्नी ,
जिसे अपने बत्तीस पतियों से प्यार है
सभी पति सख्त है ,बाँध कर रखते है ,
उसे अपने घेरे में
बेचारी मुश्किल से ही निकल पाती है ,
कभी नहीं रह पाती अकेले में
पर फिर भी उनका प्यार है बेमिसाल
ये सब रखते है एक दुसरे का कितना ख्याल
आप यकीन कीजिये मेरी बातों का
ये किस्सा है आपकी जिव्हा और बत्तीस दाँतों का
ये बत्तीस पति बेचारे ,
मेहनत कर ,खाना चबाने के बाद
अपनी नाजुक पत्नी जिव्हा को ,
देते है खाने का पूरा स्वाद
अपनी प्यारी पत्नी को खिलाते है ,
खुद नहीं चखते है
देखो अपनी पत्नी का कितना ख्याल रखते है
नाजुक से प्यारी पत्नी के प्रति
बहुत प्रीत है उनके मन में
पत्नी चंचल और बातूनी है ,
रखते है उसे अपने नियंत्रण में
ख्याल रखते है उसका पल पल
सख्त है ,औरों को चुभते भी है ,
पर बीच में रहती हुई पत्नी को ,
कभी भी नहीं करते घायल
पत्नी भी अपने पतियों पर ,
लुटाती है ढेर सारा प्यार
सभी का रखती है पूरा पूरा ख्याल
कहीं से भी कोई कतरा दाँतों में यदि फंसता है
तो वह जिव्हा के मन को बहुत खटकता है
बार बार जा जा कर ,धकेलती है उसे बाहर
कैसे भी निकल जाय ,करती है कोशिश जी भर
ये उसका ,अपने पतियों के प्रति ,
सच्चे प्रेम का परिचायक है
पति और पत्नी ,दोनों ही कितने लायक है
हम पति पत्नियों को भी ,
इनसे कुछ सबक लेना चाहिए
एक दुसरे की तरफ पूरा ध्यान देना चाहिए
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुझको छूकर सारे दर्द भुला देता मैं
तुझको छूकर ,मौसम सर्द भुला देता मैं
तुझको छूकर ,मन मेरा हो जाता चंचल
तुझको छूकर ,तन में कुछ हो जाती हलचल
तुझको छू कर ,मुझे सूझती है शैतानी
तुझ छूकर ,करने लगता ,मैं मनमानी
मादक तेरी नज़रें जब मुझसे मिलजाती
हो जाता है मेरा मन ज्यादा उन्मादी
और छुवन जब ,मिलन अगन बन लगती जलने
साँसों के स्वर ,जोर जोर से लगते चलने
पहुंच शिखर पर ,जब ढल जाती ,सब चंचलता
छा जाती है तन में मन में एक शिथिलता
थम जाता सारा गुबार ,उफनाते तन का
ऐसे ही तो होता है बस अंत छुवन का
घोटू
मैं रख्खुँ ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो
तारीफ़ करे जो अपनी ,कुछ चमचे पाल रखो
हम राजनीती चमकायें ,रह कर के अलग दलों में
टोपी सफ़ेद मैं पहनू ,तुम टोपी लाल रखो
हम एक दुसरे दल के ,हो खुले आम आलोचक
पर आपस में मिल जाएँ ,यदि सिद्ध हो रहा मतलब
पाँचों ऊँगली हो घी में ,जब ऐसा मौका आये ,
तुम आधा माल मुझे दो खुद आधा माल रखो
मैं रख्खुँ ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो
हम तुम दोनों के दल में ,कोई भी हो पावर में
लोगों का काम करा कर ,बरसायें लक्ष्मी घर में
कोई भी घोटाले में ,ना आये नाम किसी का ,
ये लूटपाट का धंधा ,कुछ सोच सम्भाल रखो
मैं रख्खुँ ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो
है कमी कौन इस दल की उस दल की भी कमजोरी
थोड़ी तुमको मालुम है ,मालुम है मुझको थोड़ी
हम इसका लाभ उठायें ,ऊँचे पद पर चढ़ जाये ,
जब जरूरत हो मैं सीधी ,तुम उलटी चाल रखो
मैं रख्खुँ ख्याल तुहारा ,तुम मेरा ख्याल रखो
मदन मोहन बाहेती ;घोटू '
एक ऐसा भी हो रविवार
दिन भर हो मस्ती ,प्यार प्यार
रत्ती भर भी ना काम करें
बस हम केवल आराम करें
इतनी सी इस दिल की हसरत
पूरा दिन फुरसत ही फुरसत
जब तक इच्छा ,तब तक सोयें
सपनो की दुनिया में खोयें
हों चाय ,पकोड़े ,बिस्तर पर
घर बैठें मज़ा करें दिन भर
ना जरुरत जल्द नहाने की
ना फ़िक्र हो दफ्तर जाने की
रख एक रेडियो ,सिरहाने
बस सुने पुराने हम गाने
या बैठ धूप में हम छत पर
हम खाये मूंगफली तबियत भर
या बाथरूम में चिल्ला कर
गाना हम गायें ,जी भर कर
मस्ती में गुजरे दिन सारा
मिल जाय प्यार जो तुम्हारा
सोने में सुहागा मिल जाए
हमको मुंह माँगा मिल जाए
तुम मुझमे ,मैं तुम में खोकर
बस एक दूसरे के होकर
हम उड़े एक नयी दुनिया में
एक दूजे की बाहें थामे
जो इच्छा हो, खाये पियें
एक दिन खुद के खातिर जियें
कम से कम महीने में एक बार
एक ऐसा भी हो रविवार
भूलें सब चिंता और रार
दिन भर बरसे बस प्यार प्यार
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
शुक्रवार, 21 जून 2019
ये प्यार बुढ़ापे वाला भी
करता हमको मतवाला भी
कहते देती दोगुना मज़ा ,
हो अगर पुरानी हाला भी
इतने दिन यौवन की संगत
लाती है बुढ़ापे में रंगत
आ जाता रिश्तों में मिठास,
दिन दिन दूनी बढ़ती चाहत
कर रोज रोज भागादौड़ी
कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी
बच्चे घर बसा दूर जाते ,
सब उम्मीदें जाती तोड़ी
वो भरा हुआ घर ,चहल पहल
होता है खाली एक एक कर
सब सूना होता ,बचते है ,
घर में पति पत्नी ही केवल
जो साथ निभाते जीवन भर
रहते है आपस में निर्भर
अपने मन का सब बचा प्यार ,
देते उंढेल ,एक दूजे पर
थे बहुत व्यस्त ,जब था यौवन
संग रहने मिलते थे कुछ क्षण
अब पूरा समय समर्पित है,
हम रहते एक दूजे के बन
संग बैठो ,मिल कर बात करो
बीते किस्सों को याद करो
अपने ढंग से जीवन जियो ,
मस्ती ,खुशियां ,आल्हाद करो
ये साथ समर्पण वाला भी
सब अर्पण करने वाला भी
हम तुम मिल कर गप्पे मारे ,
हो हाथ चाय का प्याला भी
घोटू
सोमवार, 17 जून 2019
दीवाली पर दिये जाने वाले उपहार
के होते है चार प्रकार
एक त्वरित खानेवाले
दूसरे अलमारी में जानेवाले
तीसरे काम में आनेवाले
और चौथे निपटानेवाले
त्वरित खानेवाली श्रेणी में
आते है फल और मिठाई
जो दो तीन दिन में जाना चाहिए खाई
वर्ना आसपास पड़ोसियों को देकर
जा सकती है निपटाई
सिर्फ सोहनपपड़ी का डब्बा इसका अपवाद है
जो काम में आ सकता काफी समय बाद है
दूसरी श्रेणी में चाँदी के सिक्के या बर्तन
या लक्ष्मी गणेश की मूर्तियां आती है
जो सीधी अलमारी में जाती है
और कोई ख़ास मौकों पर
जरुरत पड़ने पर काम में आती है
पुष्पगुच्छ ,मोमबत्तियां ,दीपक ,
रंगोली बंदरवार आदि तीसरी श्रेणी में आती है
जो दिवाली पर ही साजसजावट के काम में आती है
इस श्रेणी में कुछ रसोई के उपकरण ,बर्तन
और क्रॉकरी आदि भी आते है
जिन्हे लोग इसलिए बचाते है कि ये बाद में
कभी भी काम में आ जाते है
चौथी श्रेणी याने निपटानेवाली श्रेणी के उपहार
होते है बेशुमार
बेचारे कई वर्षों से इसी श्रेणी में पाए जाते है
और तीन चार घर घूम कर आपके यहाँ आते है
आपकी कोशिश होती है कि इनमे से ,
जितने भी निकल सके,निकालो
और जल्दी से छुटकारा पा लो
जब न चाहते हुए भी किसी को उपहार देना पड़े
ये काम आते है बड़े
पर ऐसे अटपटे उपहार देकर ,
आप इनसे छुटकारा तो पा लेते है
पर अक्सर ये आपको ,
उपहास का पात्र बना देते है
जैसे एक बच्चे के जन्मदिन पर ,
एक टोकरी में मोमबत्ती और कुछ सूखा मेवा ,
अगर है उपहार दिया जाता
तो ये कहीं से भी उपहार का ओचित्य नहीं बताता
तो ऐसे निपटाने वाले उपहारदाता बंधू जन ,
आपसे है मेरा एक नम्र निवेदन
ऐसे उपहार देने की औपचारिता मत पालो
अटपटे उपहार के बदले ,
एक गुलाब के फूल से ही काम चलालो
क्योकि आपके ऐसे निपटाने वाले उपहार
नहीं दर्शाते है आपका प्यार
बल्कि एक बला टालना कहलाता है
उपहार पानेवाले को किँचित ही प्रसन्नता दे पाता है
लोग आपके उपहार और मनोवृत्ति का मजाक उड़ाते है
उपहार देकर आप उपहास के पात्र बन जाते है
इसलिए आप समझदार बन
बंद करो ये निपटाने वाले उपहार का चलन
घोटू
मेरे मन में पूरे जीवन भर ये ही संताप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा
मेरे दो दो ,काबिल बेटे ,होनहार और पढ़ेलिखे
मैंने लाख करी कोशिश पर दोनों घर पर नहीं टिके
शादी करके फुर्र हो गये ,नीड़ बसा अपना अपना
मैं तन्हा रह गया अकेला ,टूट गया मेरा सपना
भूले भटके याद न करते ,ऐसा मुझको भुला दिया
तोड़ दिया उनने मेरा दिल अंतर्मन से रुला दिया
मैं फिर भी वो सुखी रहें यह ,करता प्रभु से जाप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा
मेरी एक नन्ही गुड़िया सी प्यारी प्यारी है बेटी
मन उलझाया एक विदेशी को अपना दिल ,दे बैठी
बड़ा चाव था धूमधाम से उसका ब्याह रचाऊँगा
मुझको छोड़ विदेश जा बसी ,कैसे मन समझाऊंगा
संस्कार जो मैंने डाले ,सारे यूं ही फिजूल गये
उड़ना सीख ,उड़ गए सारे ,बच्चे मुझको भूल गए
उनका यह व्यवहार बेगाना ,सहता मैं चुपचाप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा
कई बार रह रह कर है एक हूक उठा करती मन में
कुछ ना कुछ तो कमी रह गयी ,मेरे लालन पोषण में
वर्ना आज बुढ़ापे में है ये एकाकीपन ना रहता
मेरे सारे अरमानो का ,किला इस तरह ना ढहता
फिर भी लेखा मान विधि का ,खुश हूँ मैं जैसा भी हूँ
सदा रहा उनका शुभचिंतक ,चाहे मैं कैसा भी हूँ
हरेक हाल में ,ख़ुशी ढूंढता ,मैं तो अपनेआप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
ना व्हिस्की ,रम या कोई बियर पी रहा हूँ मैं
फिर भी नशे की मस्ती में अब जी रहा हूँ मैं
थोड़ा सा नशा दोस्तों के साथ ने दिया
थोड़ा नशा बेफिक्री के हालात ने दिया
बीबी का बुढ़ापे में है कुछ प्यार बढ़ गया
इस वजह से भी थोड़ा नशा और चढ़ गया
मन मस्तमौला बन के लगा फिर से फुदकने
बुझता हुआ अलाव लगा फिरसे धधकने
अंकल हसीना कहती ,मगर बोलती तो है
कानो में मीठी बोली अमृत घोलती तो है
आँखों से उनके हुस्न का रस ,पी रहा हूँ मैं
फिर भी नशे में मस्ती के अब जी रहा हूँ मैं
ना उधो से लेना है कुछ ना माधो का देना
ना कोई सपन देखते ,धुंधले से ये नैना
कर याद बीते अच्छे बुरे वाकिये सारे
कुछ वक़्त गुजर जाता है यादों के सहारे
क्या क्या गमाया और क्या क्या कर लिया हासिल
किसने लुटाया प्यार किसने तोड़ दिया दिल
कर कर के याद बीते दिन ,सुख दुःख में जो काटे
दिल के तवे पे सिकते है यादों के परांठे
दिल पे जो लगे जख्म ,सारे सी रहा हूँ मैं
फिर भी नशे में मस्ती के अब जी रहा हूँ मैं
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
थे कभी जो बाल काले
सजा करते थे निराले
उम्र के संग हाल उनका ,ज़रा छितराने लगा है
बुढ़ापा आने लगा है
हौंसले थे बुलंदी पर ,पस्त अब होने लगे है
शारीरिक कमजोरियों से ग्रस्त हम होने लगे है
काम मेहनतवाला कोई,अब नहीं हो पाता हमसे
फूलने लगती है सांसे ,ज़रा से भी परिश्रम से
और उस पर नौकरी से भी रिटायर कर दिया है
हो गए है हम निकम्मे ,भाव मन में भर दिया है
नहीं वो मौसम रहा अब
थी नसों में बिजलियाँ जब
जवानी के नये नुस्खे ,मन ये आजमाने लगा है
बुढ़ापा आने लगा है
हमें आता याद रह रह ,जवानी का बावरापन
सुनहरी रातें रंगीली ,प्यार का उतावलापन
और अब हालात ये है ,इस तरह पड़ रहा जीना
प्यार की जब बात चलती छूटने लगता पसीना
मगर ये दिल लालची है ,नहीं बिलकुल मानता है
उम्र की अपनी हक़ीक़त ,भले ही पहचानता है
आज तन और मन शिथिल है
समस्याये अब जटिल है
था खिला जो जवानी का कमल कुम्हलाने लगा है
बुढ़ापा आने लगा है
आदतें बिगड़ी हुई जो नहीं पीछा छोड़ पाती
दिखे अब भी जब जवानी ,उधर नज़रें दौड़ जाती
कई घोड़े कल्पना के ,दौड़ते है मन के अंदर
गुलाटी ना भूल पाता ,कितना ही बूढा हो बन्दर
क्षीण सी होने लगी है जवानी की वो धरोहर
बुढ़ापे के चिन्ह सारे ,लगे होने दृष्टीगोचर
याद कर आल्हाद के दिन
वो मधुर उन्माद के दिन
उम्र का अवसाद मुझ पर ,अब कहर ढाने लगा है
बुढ़ापा आने लगा है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
गुरुवार, 13 जून 2019
कल मैंने फिर एक लड़की देखी
पचास साल के अंतराल के बाद
मुझे है याद
पहली ल ड़की तब देखी थी जब मुझे करनी थी शादी
ढूंढ रहा था एक कन्या सीधी सादी
मैं उसके घर गया
मेरे लिए ये अनुभव था नया
वैसे तो कॉलेज के जमाने में खूब लड़कियों को छेड़ा था
काफी किया बखेड़ा था
पर उस दिन की बात अलग थी इतनी
मैं ढूंढ रहा था अपने लिए एक पत्नी
थोड़ी देर में ,
हाथ में एक ट्रे में चाय के कप लिए ,
वो शरमाती हुई आई
थोड़ी डगमगाती हुई आई
चाय के कप आपस में टकरा कर छलक रहे थे
उसके मुंह पर घबराहट के भाव झलक रहे थे
थोड़ी देर में वो सेटल हुई और चाय का कप मेरी ओर बढ़ाया
मैं भी शरमाया,सकुचाया और मुस्काया
फिर चाय का कप होठों से लगाया
तो उसकी मम्मी ने फ़रमाया
चाय बेबी ने है खुद बनाई ,
आपको पसंद आई
बेसन की बर्फी लीजिये बेबी ने ही बनाया है
इसके हाथों में स्वाद का जादू समाया है
मैंने लड़की से पूछा और क्या क्या बना लेती हो ,
लड़की घबरा गयी ,भोली थी
बोली कृपया क्षमा करना ,मम्मी झूंठ बोली थी
मम्मी ने कहा था की लड़का अगर पूछे किसने बनाया ,
तुम झूंठ बोल देना ,पर मेरा मन झूंठ नहीं बोल पाता
पर सच ये है कि किचन का काम मुझे ज्यादा नहीं आता
ये चाय मैंने नहीं बनाई है
और बर्फी भी बाजार से आई है
उसकी इस सादगी और सच्चाई पर मैं रीझ गया
प्रेम के रस भीज गया
उसकी ये अदा ,मेरा मन चुरा गयी
और वो मेरे मन भा गयी
और एक दिन वो मेरी बीबी बन कर आ गयी
बाद में पता लगा कि ये सच और झूंठ का खेल ,
सोचा समझा प्लान था
जिस पर मैं हुआ कुर्बान था
जिसने लड़की की कमजोरी को खूबसूरती से टाल दिया
और उस पर सादगी का पर्दा डाल दिया
पचास वर्षों के बाद ,
मैं अपने बेटे के लिए लड़की देखने गया था कल
मिलने की जगह उसका घर नहीं ,
थी एक पांच सितारा होटल
न लड़की डगमगाती हुई हाथ में चाय की ट्रे लाइ
न शरमाई
बल्कि आर्डर देकर वेटर से कोल्ड कोफ़ी मंगवाई
अब मेरा कॉफी किसने बनाई पूछना बेकार था
पर मैं उसके कुकिंग ज्ञान को जानने को बेकरार था
जैसे तैसे मैंने खानपान की बात चलाई पर
इस फील्ड के ज्ञान में भी वो मुझसे भारी थी
उसे 'मेग्गी' से लेकर 'स्विग्गी' की पूरी जानकारी थी
फिर मैंने ऐसे मौको पर पूछे जानेवाला,
सदियों पुराना प्रश्न दागा
क्या तुम पापड़ सेक सकती हो जबाब माँगा
उसने बिना हिचकिचाये ये स्पष्ट किया
वो जॉब करती है और प्रोफेशनल लाइफ के दरमियाँ
बेलने पड़ते है कितने ही पापड़
तभी पा सकते हो तरक्की की सीढ़ी चढ़
जब ये पापड़ बेलने की स्टेज निकल जायेगी
पापड़ सेकने की नौबत तो तब ही आएगी
जबाब था जबरजस्त
मैं हो गया पस्त
मैंने टॉपिक बदलते हुए पूछा 'तुम्हारी हॉबी '
उसने अपने माँ बाप की तरफ देखा
और उत्तर फेंका
मैं किसी को भी अपने पर हॉबी नहीं होने देती हूँ
घर में सब पर मैं ही हाबी रहती हूँ
और शादी के बाद ये तो वक़्त बताएगा
कौन किस पर कितना हॉबी रह पायेगा
हमने कहा हॉबी से हमारा मतलब तुम्हारे शौक से है
वो बोली शौक तो थोक से है
देश विदेश घूमना ,लॉन्ग ड्राइव पर जाना
मालों में शॉपिंग ,होटलों में खाना
सारे शौक रईसी है
उनकी लिस्ट लंबी है
हमने कहा इतने ही काफी है
इसके पहले कि मैं कुछ और पूछता ,
उसने एक प्रश्न मुझ पर दागा
और मेरा जबाब माँगा
आप अपने बेटे बहू के साथ रहेंगे
या उन्हें अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने देंगे
और बात बात में उनकी लाइफ में इंटरफियर करेंगे
ये प्रश्न मेरे दिमाग में इसलिए आया है
क्योंकि मुझे देखने जिसे शादी करनी है वो नहीं आया है
आपको भिजवाया है
प्रश्न सुन कर मैं सकपकाया
क्या उत्तर दूँ ,समझ में नहीं आया
मैंने कहा ये सोच नाहक है
हर एक को स्वतंत्रता से जीने का हक़ है
हम भला बच्चों की जिंदगी में टांग क्यों अड़ायेगे
अपने अपने घर में अपनी अपनी मल्हार जाएंगे
हम भी अपनी आजादी और सुख देखेंगे
और किसी को अपने पर हॉबी नहीं होने देंगे
वो तो उत्सुकता वश हम तु म्हे देखने आ गए ,
वर्ना अंतिम निर्णय तो हमारा बेटा ही ले पायेगा
जो किसी के साथ अपना घर बसाएगा
खैर हम लड़की देख कर
आ गए अपने घर
लड़की तब भी देखी थी
लड़की अब भी देखी है
पर पचास साल बाद आया है इतना अंतर
पहले लड़कियां लूटती थी भोली बन कर
आजकल लूटती है तन कर
पहले शादी के बाद अपनी चलाती थी
अब शादी के पहले से अपनी चलाती है
क्योंकि खुद नौकरी करती है ,कमाती खाती है
इसलिए खुद को 'इंडिपेंडेंट 'समझती है
अपनी मन मर्जी से चलती है
सकुचाने शरमाने का फैशन हो गया है ओल्ड
आज की लड़कियां हो गयी है बोल्ड
उनका अहम् प्रबल हो गया है
उनका 'आई ' केपिटल ' हो गया है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बुधवार, 12 जून 2019
पत्नी अष्टक
ब्याह समय सही लक्ष लियो और फूल को हार गले मोरे डारो
तबसे बंध्यो ,बंधुवा मजदूर सो ,पत्नी इशारों पे नाचूँ बिचारो
ऐसो वो पहनयो है हार गले ,कभी जीत न पायो ,सदा मैं हारो
को नहीं जानत जग में भामिनि,संकट दायिनी नाम तिहारो -१
हाथ में हाथ मिलाय पुरोहित ,बांध्यो है बंधन ,ऐसो हमारो
कोशिश लाख करी पर कबहुँ भी ,भाग नहीं मैं पायो बिचारो
भाग्य लिखी है जो भाग्यविधाता ने ,मान वो ही सौभाग्य हमारो
को नहीं जानत जग में भामिनि संकटदायिनी नाम तिहारो -२
मंत्र पढाय कराय के पंडित ,पावन यज्ञ को फेरा थो डारो
हर फेरन संग ,एक वचन दई ,सात वचन पत्नी संग हारो
फेर में फेरन के ऐसो ,फस्यो फिर ,शादीशुदा भयो ,रह्यो न कंवारों
को नहीं जानत जग में भामिनि ,संकट दायिनी नाम तिहारो -३
लछमी बन करती छम छम तुम आई प्रसन्न हुयो घर सारो
नैनन से, मृदु बैनन से अरु अधरन से इहि जादू सो डारो
रूप के जाल में ,ऐसो मैं उलझयो कि निकल न पायो ,वासना मारो
को नहीं जानत जग में भामिनि, संकट दायिनी नाम तिहारो -४
चार दिनन की रही मस्ती फिर ऐसो गृहस्थी को बंधन डारो
कोल्हू को बैल बन्यो दिन भर फिर ,काम में उलझ्यो रहुँ मैं बिचारो
मै दिन रेन ,करूँ विनती प्रभु ,लौटा दो फिर से तुम चैन हमारो
को नहीं जानत है जग में भामिनि , संकट दायिनी नाम तिहारो -५
नाच नचाय ईशारन पर नित ,रोज मैं नाच नाच प्रभु हारो
देवी की सेवा करूं इतनी सब ,देवीदास कह ,मोहे पुकारो
स्वर्णाभूषण भेंट करूं जब ,तब ही लगूं ,उनके मन प्यारो
को नहीं जानत, जग में भामिनि , संकट दायिनी नाम तिहारो -६
कौन कला तुम्हे आये रमापति ,कौन सो जादू रमा पर डारो
शेष की शैया पे आप बिराजो ,लक्ष्मीजी पाँव दबाय तुम्हारो
वो ही कला प्रभु मोहे सिखला दो ,मानूंगा मैं उपकार हजारों
को नहीं जानत , जग में भामिनि , संकट दायिनी नाम तिहारो -७
काज कियो बड़ देवन के तुम ,हे हनुमान ,मोहे भी उबारो
शादी के फेरे में आप फंसे नाही ,तबही रह्यो वर्चस्व तुम्हारो
त्रिया त्रसित प्रभु दास तुम्हारो ,पत्नी को अब स्वभाव सुधारो
को नहीं जानत जग में भामिनि, संकट दायिनी नाम तुम्हारो -८
दोहा
स्वर्ण देह ,जादू बसे ,नैनन में भरपूर
कृपा करो पत्नी प्रिया ,रहे न मद में चूर
घोटू
बुधवार, 17 अप्रैल 2019
बस्ती की एक सुबह
कबूतरों की बस्ती की एक सुबह
पौ फटी
कबूतरों की बस्ती में हलचल मची
एक बूढी कबूतरनी ने ,
अपने पंखों को फड़फड़ाया
और पास में सोये अपने कबूतर को जगाया
बोली जागो प्रीतम प्यारे
मोर्निग उड़ान पर निकल चुके है दोस्त तुम्हारे
तुम्हे भी व्यायाम के लिए जाना है
विटामिन डी की कमी को दूर करने ,
थोड़ी देर धूप भी खाना है
आलस में डूबा कबूतर जब कुछ न बोला
तो कबूतरनी ने उसे झिंझोड़ा
बोली उठो ,इस बुढ़ापे में हमें ही ,
अपनी सेहत का ध्यान खुद ही रखना पडेगा
दूसरा कोई ख्याल नहीं रखेगा
क्योंकि बच्चे तो अपना अपना नीड़ बसा
हो गए है हमसे अलग
मुश्किल से ही हमें पूछते है अब
आप उधर व्यायाम करके आओ,
इधर मैं कुछ दाना चुग कर आती हूँ
आपके लिए ब्रेकफास्ट बनाती हूँ
और सुनो तुम दो दिन से नहाये नहीं हो
आते समय स्विंमिंगपूल में पंख फड़फड़ा कर आ जाना
और किसी अन्य कबूतरी से नैन मत लड़ाना
एक बात और याद रखना
कुछ लोगो ने मंदिर के आसपास ,
बाजरे के दाने बिखरा रखे है ,उन्हें मत चखना
इस तरह दाने बिखरा कर ,
ये लोग सोचते है कि वो पुण्य कमा रहे है
पर दर असल वो हमारी कौम को ,
आलसी और निकम्मा बना रहे है
सुन कर के उनका वार्तालाप
पड़ोस के घोसले में 'लिविंग इन रिलेशनशिप 'में
रहनेवाला एक जवान कबूतर का जोड़ा गया जाग
कबूतरनी ने ली अंगड़ाई
'गुडमॉर्निंग किस' के लिए ,
कबूतर की चोंच से चोंच मिलाई
वो मुस्कराई और बोली डार्लिंग आपका क्या प्रोग्राम है
कहाँ गुजारनी आज की शाम है
कबूतर बोला आज मैंने छुट्टी लेली है
दिन भर करना अठखेली है
पहले हम स्वीमिंगपूल के किनारे जायेगे
पूल में तैरती सुंदरियों के दीदार का मज़ा उठाएंगे
बीच बीच में हम भी थोड़ी जलक्रीड़ा करेंगे
चोंचे मिला कर ,रासलीला करेंगे
और फिर उस चौथी मंजिल वाली बालकनी को
अपनी इश्कगाह बनाएंगे
गुटरगूँ कर पंख फैलाएंगे
हंसी ख़ुशी दिन गुजारेंगे और फिर
अपने घोंसले में लौट आएंगे
पता नहीं क्यों लोग इतने संगदिल होते जारहे है
जो हमारी इश्कगाहों याने अपनी बालकनियों पर ,
जाली लगवा रहे है
वो लोग कभी जिनके प्रेमसन्देशे हम लेकर जाते थे
कबूतर जा जा के गाने गाते थे
आजकल वो ही गए है बन
हमारे प्यार के दुश्मन
बड़ी मुश्किल से कहीं कहीं मिलता है ठिकाना
वरना तड़फता ही रहता ये दिल दीवाना
कबूतरनी बोली छोडोजी ,
जब तक जवानी है ,मौज मना लें
थोड़ा सा हंस लें ,थोड़ा मुस्करालें
वरना फिर तो वो ही दूसरे कबूतरों की तरह ,
रोज रोज दाना चुगने ,दूर दूर जाना पड़ेगा
गृहस्थी की गाडी चलना पड़ेगा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मंगलवार, 16 अप्रैल 2019
सोमवार, 8 अप्रैल 2019
बुधवार, 3 अप्रैल 2019
योगी सरकार मिल मालिकों की सरकार
मिल मालिकों ने 14 7 मजदूरों को श्रम कानूनों को लागू करने की मांग करते ही बगैर नोटिस दिए निकाला गया है।
योगी मोदी सरकार में मिल मजदूरों की दशा अत्यधिक खराब है
स्थानीय वेब शराब व बीयर फैक्ट्री के निष्काषित मजदूरों का अनिश्चित कालीन धरना आज आठवें दिन भी जारी रहा।
जिला प्रशासन के उदासीन व्यवहार के चलते आंदोलन रत मजदूरों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है,इनका मानना है कि जिला प्रशासन फैक्ट्री मालिकों के हाथ में खिलौना बना हुआ है और फैक्ट्री प्रबन्धन के विरुद्ध कार्यवाही करने की उसमें हिम्मत नहीं है, जबकि मजदूरों की मांगें संवैधानिक एवं न्यायोचित हैं।मजदूरों का कहना है कि यदि शीघ्र ही फैक्ट्री प्रबन्धन पर दबाब बनाकर हमारी माँगे पूरी न करायी गई तो हम आंदोलन के अन्य विकल्पो पर विचार करने पर मजबूर होंगे,जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
इस अवसर पर आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सुहेब शेरवानी, सचिव रामबाबू गुप्ता, रामवीर सिंह, जगदीश प्रसाद , धर्मवीर उपस्थित रहे।
मंगलवार, 2 अप्रैल 2019
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बुधवार, 27 मार्च 2019
रविवार, 17 मार्च 2019
बुधवार, 13 मार्च 2019
शुक्रवार, 1 मार्च 2019
सोमवार, 25 फ़रवरी 2019
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प्रेम करती हूँ तुमसे - यमुना किनारे उस रात मेरे हाँथ की लकीरों में एक स्वप्न दबाया था ना उस क्षण की मधुस्मृतियाँ तन को गुदगुदाती है उस मनभावन रुत में धडकनों का मृदंग बज उ...8 वर्ष पहले
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गाँधी जी...... - गाँधी जी...... --------- चौराहॆ पर खड़ी,गाँधी जी की प्रतिमा सॆ,हमनें प्रश्न किया, बापू जी दॆश कॊ आज़ादी दिला कर, आपनॆं क्या पा लिया, बापू आपके सारॆ कॆ सारॆ सि...9 वर्ष पहले
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Demonetization and Mobile Banking - *स्मार्टफोन के बिना भी मोबाईल बैंकिंग संभव...* प्रधानमंत्री मोदीजी ने अपनी मन की बात में युवाओं से आग्रह किया है कि हमें कैशलेस सोसायटी की तरफ बढ़ना है औ...9 वर्ष पहले
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आप अदालत हैं - अपना मानते हैं जिन्हें वही नहीं देते अपनत्व। पक्षपात करते हैं सदैव वे पुत्री के आँसुओं का स्वर सुन। नहीं जाना उन्होंने मेरी कटुता को न ही मेरी दृष्टि में बन...9 वर्ष पहले
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फिर अंधेरों से क्यों डरें! - प्रदीप है नित कर्म पथ पर फिर अंधेरों से क्यों डरें! हम हैं जिसने अंधेरे का काफिला रोका सदा, राह चलते आपदा का जलजला रोका सदा, जब जुगत करते रहे हम दीप-बा...9 वर्ष पहले
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चलो नया एक रंग लगाएँ - लाल गुलाबी नीले पीले, रंगों से तो खेल चुके हैं, इस होली नव पुष्प खिलाएँ, चलो नया एक रंग लगाएँ । मानवता की छाप हो जिसमे, स्नेह सरस से सना हो जो, ऐसी होली खू...10 वर्ष पहले
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स्वागतम् - मित्रों, सभी को अभिवादन !! बहुत दिनों के बाद कोई पोस्ट लिख रहा हूँ | इतने दिनों ब्लॉगिंग से बिलकुल दूर ही रहा | बहुत से मित्रों ने इस बीच कई ब्लॉग के लि...10 वर्ष पहले
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विचार शून्यता। - विचार , कई बार बहते है हवा से, छलकते है पानियों से, झरते है पत्तियों से और कई बार उठते है गुबार से घुटते है, उमड़ते है, लीन हो जाते है शून्य में फिर यह...10 वर्ष पहले
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बीमा सुरक्षा और सुनिश्चित धन वापसी - कविता - अविनाश वाचस्पति - ##AssuredIncomePlanPolicy निश्चित धन वापसी और बीमा सुविधा संदेह नहीं यह पक्का बनाती है विश्वास विश्वास में ही मौजूद रहती है यह आस धन भी मिलेगा और निडर ...10 वर्ष पहले
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एक रामलीला यह भी - एक रामलीला यह भी यूं तो होता है रामलीला का मंचन वर्ष में एक बार पर मेरे शरीर के अंग अंग करते हैं राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के पात्र जीवन्त. देह की सक...10 वर्ष पहले
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मन गुरु में ऐसा रमा, हरि की रही न चाह - ॐ श्री गुरुवे नमः *ॐ ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ।* * द्वंद्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम् । ...10 वर्ष पहले
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गुरु पूर्णिमा - आज गुरु पूर्णिमा है ! अपने गुरु के प्रति आभार प्रकट करने का दिवस ,गुरु शब्द का अर्थ होता है अँधेरे से प्रकाश की और ले जाने वाला ,अज्ञान ज्ञान की और ले...10 वर्ष पहले
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हमारा सामाजिक परिवेश और हिंदी ब्लॉग - वर्तमान नगरीय समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस परिवेश में सामाजिक संबंध सिकुड़ते जा रहे हैं । सामाजिक सरोकार से तो जैसे नाता ही खत्म हो गया है। प्रत्येक...11 वर्ष पहले
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क्रिकेट विश्व कप 2015 विजय गीत - धोनी की सेना निकली दोहराने फिर इतिहास अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस | शास्त्री की रणनीति भी है और विराट का शौर्य , धोनी की तो धूम मची है विश्व ...11 वर्ष पहले
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'मेरा मन उचट गया है त्यौहारों से' - मेरा मन उचट गया है त्यौहारों से… मेरे कान फ़ट चुके हैं सवेरे से लाउड वाहियत गाने सुनकर और फ़ुर्र हो चुका है गर्व। ये कौनसा रंग है मेरे देश का? बिल्कुल ऐसा ...11 वर्ष पहले
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कथा सुनो शबाब की - *कथा सुनो शबाब की* *सवाल की जवाब की* *कली खिली गुलाब **की* *बड़े हसीन ख़ाब की* * नया नया विहान था* * घ...11 वर्ष पहले
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कम्बल और भोजन वितरण के साथ "अपंगता दिवस" संपन्न हुआ - *नई दिल्ली: विगत 3 दिसम्बर 2014 दिन-बधुवार को सुबह 10 बजे, स्थान-कोढ़ियों की झुग्गी बस्ती,पीरागढ़ी, दिल्ली में गुरु शुक्ल जैन चैरिटेबल ट्रस्ट (पंजीकृत) दिल...11 वर्ष पहले
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जून 2014 के बाद की गज़लें/गीत (21) चलो-चलो यह देश बचायें ! (‘शंख-नाद’ से) - (सारे चित्र' 'गूगल-खोज' से साभार) चुपके-खुल कर अमन जलाते | खिलता महका चमन जलाते || अशान्ति की जलती ज्वाला से- सुखद शान्ति का भवन जलाते || हिंसा के दुर्दम प...11 वर्ष पहले
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झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (14) आधा संसार (नारी उत्पीडन के कारण) (क) वासाना-कारा (vi) कुबेर-सुत | - (सारे चित्र' 'गूगल-खोज' से साभार) दरिद्रता-दुःख-दीनता, निर्धनता की मार ! कितना पीड़ित विश्व में, है आधा संसार !! पुत्र कुबेरों के कई, कारूँ के कुछ लाल ! ज...11 वर्ष पहले
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आहटें ..... - *आज भोर * *कुछ ज्यादा ही अलमस्त थी ,* *पूरब से उस लाल माणिक का * *धीरे धीरे निकलना था * *या * *तुम्हारी आहटें थी ,* *कह नहीं सकती -* *दोनों ही तो एक से...11 वर्ष पहले
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झाँसी की रानी पर आधारित "आल्हा छंद" - झाँसी की रानी पर आधारित 'अखंड भारत' पत्रिका के वर्तमान अंक में सम्मिलित मेरी एक रचना. हार्दिक आभार भाई अरविन्द योगी एवं सामोद भाई जी का. सन पैंतीस नवंबर उ...11 वर्ष पहले
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हम,तुम और गुलाब - आज फिर तुम्हारी पुरानी स्मृतियाँ झंकृत हो गई और इस बार कारण बना वह गुलाब का फूल जिसे मैंने दवा कर किताबों के दो पन्नों के भूल गया गया था और उसकी हर पंखुड़िय...11 वर्ष पहले
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गाँव का दर्द - गांव हुए हैं अब खंढहर से, लगते है भूल-भुलैया से। किसको अपना दर्द सुनाएँ, प्यासे मोर पप्या ? आंखो की नज़रों की सीमा तक, शहरों का ही मायाजाल है, न कहीं खे...12 वर्ष पहले
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रंग रंगीली होली आई. - [image: Friends18.com Orkut Scraps] रंग रंगीली होली आई.. रंग - रंगीली होली आई मस्तानों के दिल में छाई जब माह फागुन का आता हर घर में खुशियाली...12 वर्ष पहले
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भ्रष्ट आचार - स्वतंत्र भारत की नीव में उस समय के नेताओं ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के रख दिये थे भ्रष्ट आचार फिर देश से कैसे खत्म हो भ्रष्टाचार ?12 वर्ष पहले
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अन्त्याक्षरी - कभी सोचा नहीं था कि इसके बारे में कुछ लिखूँगी: बचपन में सबसे आमतौर पर खेला जाने वाला खेल जब लोग बहुत हों और उत्पात मचाना गैर मुनासिब। शायद यही वजह है कि इ...12 वर्ष पहले
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संघर्ष विराम का उल्लंघन - जम्मू,संघर्ष विराम का उल्लंघनकरते हुए पाकिस्तानी सेना ने रविवार को फिर से भारतीय सीमा चौकियों पर फायरिंग की। इस बार पाकिस्तान के निशाने पर जम्मू जिले के का...12 वर्ष पहले
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प्रतिभा बनाम शोहरत - “ हम होंगें कामयाब,हम होंगें कामयाब,एक दिन ......माँ द्वारा गाये जा रहे इस मधुर गीत से मेरे अन्तःकरण में नए उत्साह का स्पंदन हो रहा था .माँ मेरे माथे को...13 वर्ष पहले
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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 7 ........दिनकर - 'हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ? कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ? धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान? जाति-गोत्...13 वर्ष पहले
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आवरण - जानती हूँ तुम्हारा दर्प तुम्हारे भीतर छुपा है. उस पर मैं परत-दर-परत चढाती रही हूँ प्रेम के आवरण जिन्हें ओढकर तुम प्रेम से भरे सभ्य और सौम्य हो जाते हो जब ...13 वर्ष पहले
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OBO -छंद ज्ञान / गजल ज्ञान - उर्दू से हिन्दी का शब्दकोश *http://shabdvyuh.com/* ग़ज़ल शब्दावली (उदाहरण सहित) - 2 गीतिका छंद वीर छंद या आल्हा छंद 'मत्त सवैया' या 'राधेश्यामी छंद' :एक ...13 वर्ष पहले
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इंतज़ार .. - सुरसा की बहन है इंतज़ार ... यह अनंत तक जाने वाली रेखा जैसी है जवानी जैसी ख्त्म होने वाली नहीं .. कहते हैं .. इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी होती हैं ख़त्म भ...13 वर्ष पहले
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यार की आँखों में....... - मैं उन्हें चाँद दिखाता हूँ उन्हे दिखाई नही देता। मैं उन्हें तारें दिखाता हूँ उन्हें तारा नही दिखता। या खुदा! कहीं मेरे यार की आँखों में मोतियाबिंद...13 वर्ष पहले
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आज का चिंतन - अक्सर मैं ऐसे बच्चे जो मुझे अपना साथ दे सकते हैं, के साथ हंसी-मजाक करता हूँ. जब तक एक इंसान अपने अन्दर के बच्चे को बचाए रख सकता है तभी तक जीवन उस अंधकारमय...13 वर्ष पहले
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Pujya Tapaswi Sri Jagjivanjee Maharaj Chakchu Chikitsalaya, Petarbar - Pujya Tapaswi Sri Jagjivanjee Maharaj Chakchu Chikitsalaya, Petarbar is a Charitable Eye Hospital which today sets an example of a selfless service to the...14 वर्ष पहले
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क्राँति का आवाहन - न लिखो कामिनी कवितायें, न प्रेयसि का श्रृंगार मित्र। कुछ दिन तो प्यार यार भूलो, अब लिखो देश से प्यार मित्र। ……… अब बातें हो तूफानों की, उम्मीद करें परिवर्तन ...14 वर्ष पहले
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कल रात तुम्हारी याद - कल रात तुम्हारी याद को हम चाह के भी सुला न पाये रात के पहले पहर ही सुधि तुम्हारी घिर कर आई अहसास मुझको कुछ यूँ हुआ पास जैसे तुम हो खड़े व्याकुल हुआ कुछ मन...14 वर्ष पहले
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HAPPY NEW YEAR 2012 - *2012* *नव वर्ष की शुभकामना सहित:-* *हर एक की जिंदगी में बहुत उतार चढाव होता रहता है।* *पर हमारा यही उतार चढाव हमें नया मार्ग दिखलाता है।* *हर जोखिम से ...14 वर्ष पहले
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"भइया अपने गाँव में" -- (बुन्देली काव्य-संग्रह) -- पं० बाबूलाल द्विवेदी - We're sorry, your browser doesn't support IFrames. You can still <a href="http://free.yudu.com/item/details/438003/-----------------------------------------...14 वर्ष पहले
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अब बक्श दे मैं मर मुकी - चरागों से जली शाम ऐ , मुझे न जला तू और भी, मेरा घर जला जला सा है,मेरा तन बदन न जला अभी, मैंने संजो रखे हैं बहुत से राख के ढेर दिल मैं कहीं, सुलग सुलग के आय...14 वर्ष पहले
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अपनी भाषाएँ - *जैसे लोग नहाते समय आमतौर पर कपड़े उतार देते हैं वैसे ही गुस्से में लोग अपने विवेक और तर्क बुद्धि को किनारे कर देते हैं। कुछ लोगों का तो गुस्सा ही तर्क...14 वर्ष पहले
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दरिन्दे - बारूद की गन्ध फैली है, माहौल है धुआँ-धुआँ कपड़ों के चीथड़े, माँस के लोथड़े फैले हैं यहाँ-वहाँ। ये छोटा चप्पल किसी मासूम का पड़ा है यहाँ ढूँढो शयद वह ज़िन...16 वर्ष पहले
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