नहीं गलती कहीं भी दाल है बुढ़ापे में
वो भी क्या दिन थे मियां फाख्ता उड़ाते थे ,
जवानी ,आती बहुत याद है बुढ़ापे में
करने शैतानियाँ,मन मचले,भले ना हिम्मत,
फिर भी आते नहीं हम बाज है बुढ़ापे में
बड़े झर्राट ,तेज,तीखे,चटपटे थे हम,
गया कुछ ऐसा बदल स्वाद है,बुढ़ापे में
अब तो बातें ही नहीं,खून में भी शक्कर है,
आगया इस कदर मिठास है बुढ़ापे में
देख कर गर्म जलेबी,रसीले रसगुल्ले ,
टपकने लगती मुंह से लार है बुढ़ापे में
लगी पाबंदियां है मगर मीठा खाने पर ,
मन को ललचाना तो बेकार है बुढ़ापे में
देख कर ,हुस्न सजीला,जवान,रंगीला ,
बदन में जोश फिर से भरता है बुढ़ापे में
जब की मालूम है,हिम्मत नहीं तन में फिर भी,
कुछ न कुछ करने को मन करता है बुढ़ापे में
न तो खाने का,न पीने का ,नहीं जीने का,
कोई भी सुख नहीं ,फिलहाल है बुढ़ापे में
कभी अंकल ,कभी बाबा कहे हसीनायें ,
नहीं गलती कहीं भी दाल है ,बुढ़ापे में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
SELECTED ADVOCATES के लिए है QR CODE SYSTEM
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बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा अधिवक्ताओं के लिए रजिस्ट्रेशन और COP
certificate प्राप्त करने के लिए QR CODE SYSTEM जारी किया गया है और अब इस
सिस्टम...
1 दिन पहले
सबसे बड़ा दुख -चंद्र बदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि जायँ !
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