सपनो के सौदागर से
बहुत जिन्दाबादी के नारे सुने,
अब असली मुद्दों पे आओ जरा
करेंगे ये हम और करेंगे वो हम,
हमें कुछ तो कर के दिखाओ जरा
ये जनता दुखी है,परेशान है,
उसे थोड़ी राहत दिलाओ जरा
ये सुरसा सी बढती चली जारही ,
इस मंहगाई को तुम घटाओ जरा
भाषण से तो पेट भरता नहीं,
खाना मयस्सर कराओ जरा
खरचते थे सौ ,मिलते पंद्रह थे,
नन्यान्वे अब दिलाओ जरा
गरीबों के घर खाली रोटी बहुत,
गरीबों को रोटी खिलाओ जरा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
प्रेम रहेगा कैसे मन में
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प्रेम रहेगा कैसे मन मेंजब ना कोई घर में रहता तब चुपके से कान्हा आता, नवनीत
चुरा मटका तोड़े गोपी का हर दुख मिट जाता !द्वार खुला ही छोड़ गई थी निशदिन
उसकी र...
5 घंटे पहले
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