सीमाओं को लांघने का मज़ा
सीमाओं को लांघने का भी,
अपना एक मज़ा है
कूप मंडूक की तरह,
घर की चार दीवारी में ,
सिमट कर रहना
और मौजूदा हालात में,
सुखी और संतुष्ट रहना
आदमी की नेसर्गिक प्रवृर्र्ती है
वो जिस हाल में है,
समझता है खुशहाल है
पर जब वो अपने घोंसले से निकल,
खुली हवा में तैरता है,
तब उसे लगता है ,
कि दुनिया कितनी विशाल है
लहराते समुन्दर,
बर्फ से ढके पहाड़,
झरते हुए झरने,
कल कल करती नदियाँ,
विभिन्न वेशभूषा,
विभिन्न खानपान,
विभिन्न चेहरे मोहरे,
विभिन्न संस्कृतियाँ
ये सब देख कर,
उसकी संकुचित विचारधारा में,
कितना बदलाव आता है
प्रकृति कि इन अद्भुत कृतियों को देख,
वह उस सर्जक को सराहता है
एक बार जरा पंख फडफडा कर,
घोंसले से निकल कर तो देखो,
खुले आसमान में विचर कर तो देखो,
रोज रोज दाल रोटी खाने के बदले,
पीज़ा या नूडल खा ,स्वाद बदल कर तो देखो
तभी जान पाओगे,परिवर्तन क्या है
सीमायें लांघने पर,
समय भी बदल जाता है,
एक बार सीमायें लांघ कर तो देखो,
सीमायें लांघने में,बड़ा मज़ा आता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सागर सी आत्मा
-
सागर सी आत्मा दिन-रात सागर में लहरें उठती हैं फेन, बुदबुदे, तरंगें सभी तो
जल हैं !आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ भाव, विचार, कल्पनाएँ सभी तो ऊर्जा हैं
!!सागर अपन...
8 घंटे पहले
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपने बहुमूल्य टिप्पणी के माध्यम से उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन करें ।
"काव्य का संसार" की ओर से अग्रिम धन्यवाद ।