सपनो के सौदागर से
बहुत जिन्दाबादी के नारे सुने,
अब असली मुद्दों पे आओ जरा
करेंगे ये हम और करेंगे वो हम,
हमें कुछ तो कर के दिखाओ जरा
ये जनता दुखी है,परेशान है,
उसे थोड़ी राहत दिलाओ जरा
ये सुरसा सी बढती चली जारही ,
इस मंहगाई को तुम घटाओ जरा
भाषण से तो पेट भरता नहीं,
खाना मयस्सर कराओ जरा
खरचते थे सौ ,मिलते पंद्रह थे,
नन्यान्वे अब दिलाओ जरा
गरीबों के घर खाली रोटी बहुत,
गरीबों को रोटी खिलाओ जरा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
किसी दिन....
-
1. *जो कभी भूल जाऊँ मैं-*
भूलते - भूलते
अगर कभी तुम्हें भूल जाऊँ मैं
उस समय को उस पल को दोष नहीं देना
जब पहली बार मिले थे हम तुम!
चाय के उन दो कपों ...
1 दिन पहले
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपने बहुमूल्य टिप्पणी के माध्यम से उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन करें ।
"काव्य का संसार" की ओर से अग्रिम धन्यवाद ।