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सोमवार, 17 जुलाई 2017

स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी या अनुगामिनी 

जब औरतों के सर पर 
चढ़ जाता है मर्दों से बराबरी का चक्कर 
और वो उन्हें देना चाहती है टक्कर 
तो वो क्या खो रही है ,
उन्हें इसका अहसास नहीं होता है 
क्योंकि जब पति पास होता है 
तो मन में एक आत्मविश्वास होता है 
कोई शोहदों को पास फटकने नहीं देता 
सही सलामत मंजिल तक पहुंचाता है ,
भटकने नहीं देता 
साथ का सारा बोझा खुद उठाता है 
कहता है ये नाजुक लोगों का काम नहीं ,
इसे मर्दों का काम बतलाता है 
दुःख और परेशानी में ,
उसकी मजबूत बाहों का सहारा होता है
वो सच्चा मित्र और हमसफ़र प्यारा होता है 
उसके बलिष्ठ सीने से लग कर औरत ,
अपने आप को महफूज महसूस करती है 
कोई उसके साथ है इसलिए नहीं डरती है 
रोज मेहनत कर,कमा कर लाता है 
घर परिवार का  खर्चा चलाता है 
बच्चों का पालनपोषण और प्यार देता है 
उन्हें अनुशासन में रख ,अच्छे संस्कार देता है 
उसका साथ,एक सबसे बड़ी उपलब्धि है औरत की 
क्योकि वो ,एक जीती जागती मूरत है,
त्याग और मोहब्बत की 
परिवार की ख़ुशी होती उसकी प्राथमिकता है 
उसी के लिए वो दिनभर काम में पिसता है 
छुट्टी के दिन जब वो घर पर रहता है ,
घर में रौनक छाई  रहती है  
पूरे परिवार में ख़ुशी की बहार आयी रहती है 
जब वो आपका सच्चा साथी बन कर ,
निभाता अपना सब फर्ज है 
तो फिर महिलाओं को ,
उसकी अनुगामिनी बन कर रहने में क्या हर्ज है 
जो औरते बराबरी की बात करती है 
वो स्वयं पर कुठाराघात करती है 
क्योकि पति ने उन्हें बराबर का ही नहीं ,
अपने से बहुत ऊंचा दर्जा दिया हुआ है 
अपना सब कुछ उन्हें अर्पित किया हुआ होता है 
उन्हें  गृहलक्ष्मी मन उसकी पूजा करता है 
उन्हें कोई बात बुरी न लगे,डरता है 
उमके इशारों पर नाचता रहता है 
अपनी परेशानी ,हंसी में टालता रहता है 
वो नहीं होता तो घरमे सूनापन बिखरता है 
न खाना बनाने में मन लगता है ,
न सजने संवरने में मन लगता है 
जो औरतें अपने अहम में 
बराबरी की टक्कर के बहम में 
अपने को पुरुष से ऊंचा बतलाती है 
पुरुष का साथ नहीं  पाती है 
वो इन सारे खूबसूरत अहसासो से ,
वंचित रह जाती है 
जीवन में कितना कुछ खोती है 
कोई उनके अंतर्मन से पूछे,,
अकेले में कितनी दुखी होती है 
इसलिए मर्दों से मुकाबला न कर के ,
अपने को उनसे एक दर्जा नीचा ही दिखलाओ 
और जीवन के सारे सुखों का मज़ा उठाओ 
क्योकि इस समर्पण से ,
नीची नहीं होती आपकी नाक है 
यह स्वाभिमान से समझौता नहीं,
दिलों का रिश्ता है ,जो बड़ा पाक है 
आदमी को जब तक आप ये महसूस कराती हो ,
कि आपको उसकी जरूरत है ,
वो आगे बढ़ कर आपको सहारा देता है 
और जब आप अपने आप को श्रेष्ठ बताने का ,
प्रयास करती है तो वो हाथ खेंच लेता है 
इसीलिये प्यारी महिलाओं 
अपनी श्रेष्टता को वरिष्टत्ता मत बनाओ 
स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी न बन कर ,
पति की अनुगामिनी बन जाओ 
और जीवन का मज़ा उठाओ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही उम्दा ! लेखन ,सधी व सुन्दर भाव आभार "एकलव्य"

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