यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |
सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com pradip_kumar110@yahoo.com
इस ब्लॉग से जुड़े
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014
एसा लगता है वो हमसे नाराज है आज सूरज ने सूरत दिखाई नहीं बेरुखी देख उसकी खफा हम हुये हमने सर से हटाइ रजाइ नहीं धूप के रूप का गर न जलवा दिखे तो जरूरी नहीं हम ठिठुरते रहे कम से कम परवाने तो जलेगे नहीं जो अगर उनने शमा जलाई नहीं घोटू
796. पाँव तैयार नहीं
-
पाँव तैयार नहीं
***
राह सामने है, चलने को पाँव तैयार नहीं
खड़े रहने, अड़े रहने को पाँव मददगार नहीं
पाँव ज़ख़्मी हो गए, अब वे ठहरे रहेंगे
न ज़मीन न स्वर्ग की...
1477-नया साल
-
*नया साल/ डॉ.सुरंगमा यादव*
*-0-*
*2-साल पुराना चला गया /डॉ. कनक लता*
*कुछ खट्टे**, कुछ मीठे, कुछ कड़वे लम्हों को सँजोया गया*
*कभी ख़ुशनुमा हुई ज़ि...
नव वर्ष
-
नयी उम्मीदों के साथ नयी बातों के साथ नए ख्यालों के साथ ख्वाब सबके पूरे हों
। जो बरसों से अधूरे रहे अनकहे-अनसुने रहेचाहे जितने प्रकार हों शब्द सब
साकार हों...
ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पाँच (05)
-
ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पाँच (05) भाग 5 प्रियंकाजैसे ही मैंने सनशाइन
होम्स रिज़ॉर्ट के बरामदे में कदम रखा, मुझे हल्का महसूस हुआ, जैसे अपने
परिवार को पी...
छठी इंद्री पर निर्णय दे रही सुप्रीम कोर्ट
-
सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर एक महिला का यौन शोषण करने के आरोपी
व्यक्ति की रेप की सज़ा और दंड रद्द किया, क्योंकि अपील के दौरान दोनों पक्षों
ने...
फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - ३
-
फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा अंतिम भाग ४ सितंबर २०२५ आज सुबह साढ़े आठ
बजे हम बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग पर रुके, जो जोशीमठ
के ...
सब कुछ भूलने के लिए बना है
-
*सब कुछ भूलने के लिए बना है *
*वो बचपन का घर *
*शहर-शहर घूम कर भी *
*ज़िंदा है ज़हन में *
*मगर भूलने के लिए बना है *
*हम बड़ी दूर चले आये हैं , *
*उ...
वेदांगों की साधना
-
04 वेदांग वेद - साधना के 04 चरण हैं
वर्तमान में 04 वेद हैं और हर वेद के अपने - अपनें चार अंग हैं , जैसा नीचे
दिखाया गया है ⤵️
आदि सतयुग में प्रसव ,एक व...
वक्त...
-
कहीं कोई एक झलक सी मिल जाती है
तेज हवा के झोंके सा
जिंंदगी का पन्ना, यकायक पलटने लगता है
ठिठकती हूं, देखती हूं उस वक्त को
जो जाने कब, कैसे
गुजर गया,...
ये क्या है...? संध्या शर्मा
-
ये क्या है?
ये पुलक है, ये झंकार है,
ये अधूरे बोलों का संचार है।
ये चुप्पी में सिमटा कोलाहल है,
ये मन से उठता हालाहल है।
ये क्या है?
ये प्राणों का ...
अपने सारथी हम खुद
-
अपने सारथी हम खुद
अगले दिन सुबह उठे तो कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं थी। आज हमें उन्हीं जगह पर
जाना था जहाँ अपनी गाड़ी से जाया जा सकता था। किस जगह जाना ...
डर क्यूँ
-
*मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ*
*जिंदगी आ, तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ*
*जिसमें माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो*
*चाहता हूँ मैं भी...
किताब मिली -शुक्रिया -23
-
हमारी आंख में खद्दर के ख़्वाब बिकते थे
तुम आए और यहां बोस्की के थान खुले
ये कौन भूल गया उन लबों का ख़ाका
यहां ये कौन छोड़ गया गुड़ के मर्दबान खुले
**
ब...
कोदंड
-
उत्कृष्ट पत्रिका अनुभूति के कोदंड विशेषांक में प्रकाशित
शक्ति का प्रतीक कोदंड
मर्यादा संग शक्ति का प्रतीक बना कोदंड
देख अविनय के भाव को
होता रहा प...
आखिर क्यों ?
-
*आखिर क्यों **?*
आखिर क्यों मानव इतना परेशान है कि लोग हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से भी
नहीं डर रहे है. क्या यह क़ानून व्यवस्था की कोई कमी है कि लोगो...
रुख़ से लेकिन ख़ुशी नहीं जाती
-
सोच यह बेतुकी नहीं जाती
के मेरी ज़िन्दगी नहीं जाती
कोई भी कैफ़ियत हो लेकिन उधर
मेरी तबियत कभी नहीं जाती
बात निकली कहीं से पर मुझतक
आयी जो भी वही नहीं ...
लंगड़ा आम की विदेश-यात्रा
-
(एक हास्य-प्रधान लेख)➖➖➖➖➖➖-डॉ. डंडा लखनवी ➖➖➖➖➖लंगड़ा आम को आम समझना, आम
की तौहीन है। उसका नाम भले ही ‘लंगड़ा’ हो, पर ठाठ-बाट में वह किसी महाराजा से
कम नह...
लालबुझक्कड़ की राजनैतिक हार
-
सुबह-सुबह अपने घर की बगिया में हरे-भरे पेड़ के नीचे पड़ी पत्थर की बेंच पर
बैठे चाय की चुस्कियों का स्वाद लिया जा रहा था, उसी समय मोबाइल की घंटी ने
ध्यान अप...
काश मैं कार्टूनिस्ट होता
-
काश मैं कार्टूनिस्ट होता। बचपन में जो किरकिरा चेहरा किताब की कॉपी पर बनाता
था, वो कभी मास्टर जी की डांट का पात्र बना, तो कभी दोस्तों की वाहवाही का।
सोचा था...
हे रुष्ट प्रकृति
-
हे रुष्ट प्रकृति
करके क्रोध का त्याग
होंगी तुम कैसे प्रसन्न?
ये मूढ़ मानव
है तो तुम्हारी ही संतान
लाड़ का कर दुरुपयोग
पहुँचाई तुम्हारे जिया को ठेस
जानता ...
बढ़ा हुआ हाथ
-
कल शाम अपनी नातिन दित्सा को लेकर पास वाली कॉलोनी के बगीचे में गई थी. ये
थोड़ा बड़ा बगीचा है. वहीं चार झूले और फिसलपट्टी लगी है l घूमने के लिए चारों
तरफ ज...
सुर्ख गुलाब
-
एक सुर्ख़ गुलाब देकर
कर देते हैं लोग
अपनी भावनाओं का इज़हार।
यदि
यही है
अपने प्रीत को बयाँ करना
तो कई बार बांधे मैंने
ख़ुद ही अपने
जुड़े में सुर्ख़ गुल...
हम सभी बेचैन से हैं न
-
अभी कुछ दिनों से मैं अपनी कजिन के घर आई हुई हूं, वजह कुछ खास नहीं बस अपनी
खामखाह की बैचेनी को की कुछ कम करने का इरादा था और अपने मन को हल्का करना था।
अब वाप...
किन भावों का वरण करूँ मैं?
-
हर पल घटते नए घटनाक्रम में,
ऊबड़-खाबड़ में, कभी समतल में,
उथल-पुथल और उहापोह में,
किन भावों का वरण करूँ मैं ?
एक भाव रहता नहीं टिककर,
कुछ नया घटित फिर ह...
बचपन के रंग -
-
बहुत पुरानी , घोर बचपन की बातें याद आ रही है.
मुझसे पाँच वर्ष छोटे भाई का जन्म तब तक नहीं हुआ था. पिताजी का ट्रांस्फ़र
होता रहता था - उन दिनों हमलोग तब ...
बीज - मंत्र .
-
शब्द बीज हैं!
बिखर जाते हैं,
जिस माटी में ,
उगा देते हैं कुछ न कुछ.
संवेदित, ऊष्मोर्जित
रस पगा बीज कुलबुलाता
फूट पड़ता ,
रचता नई सृष्टि के अंकन...
युद्ध
-
युद्ध / अनीता सैनी
…..
तुम्हें पता है!
साहित्य की भूमि पर
लड़े जाने वाले युद्ध
आसान नहीं होते
वैसे ही
आसान नहीं होता
यहाँ से लौटना
इस धरती पर आ...
कविता : खेल
-
शहर के बीच
मैदान
जहाँ खेलते थे बच्चे
और उनके धर्म घरों में
खूँटी पर टँगे रहते थे
जबसे एक पत्थर
लाल हुआ तो
दूसरे ने ओढ़ी हरी चादर
तबसे बच्चे
घरों में कैद...
कांच के टुकड़े
-
सुनो
मेरे पास कुछ
कांच के टुकड़े हैं
पर उनमें
प्रतिबिंब नहीं दिखता
पर कभी
फीका महसूस हो
तो उन्हें धूप में
रंग देती हूं
चमक तीक्ष्ण हो जाते
तो दुबारा
...
-
उसने कहा था
आज गुलाब का दिन है
न गुलाब लेने का
न देने का,
बस गुलाब हो जाने का दिन है
आज गुलाब का दिन है
उसी दिन गुलाब सी तेरी सीरत से
गुलाबी हो गयी मैं ।
-...
मॉर्निंग वॉक- एक सुरक्षित भविष्य
-
जीवन में चलते चलते कभी कुछ दिखाई दे जाता है, जो अचानक दिमाग में एक बल्ब जला
देता है , एक विचार कौंधता है, जो मन में कुनमुनाता रहता है, जब तक उसे
अभिव्यक...
2019 का वार्षिक अवलोकन (सत्ताईसवां)
-
डॉ. मोनिका शर्मा का ब्लॉग
Search Results
Web results
परिसंवाद
*आपसी रंजिशों से उपजी अमानवीयता चिंतनीय*
अमानवीय सोच और क्रूरता की कोई हद नहीं बची ह...
जियो सेट टॉप बॉक्स - महा बकवास
-
जियो फ़ाइबर सेवा धुंआधार है, और जब से इसे लगवाया है, लाइफ़ है झिंगालाला. आज
तक कभी ब्रेकडाउन नहीं हुआ, बंद नहीं हुआ और स्पीड भी चकाचक. ऊपर से लंबे समय
से...
परमेश्वर
-
प्रार्थना के दौरान
वह मुझसे मिला
उसे मुझसे प्रेम हुआ
उसकी मैली कमीज के
दो बटन टूटे थे
टिका दिया उसने अपना सर मेरे कंधे पर
वह युद्ध में हारा सैनिक था शायद!...
Aakhir kab ? आखिर कब ?
-
* आखिर कब ? आखिर क्यों आखिर कबतक यूँ बेआबरू होती रहेंगी बेटीयाँ आखिर कबतक
हवाला देंगे हम उनके पहनावे का उनकी आजादी का उनकी नासमझी और समझदारी का क्यों
...
तुम्हारा स्वागत है
-
1
तुम कहती हो
" जीना है मुझे "
मैं कहती हूँ ………… क्यों ?
आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ?
क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?
बचपन से ही बेटी होने के दंश ...
ना काहू से दोस्ती ....
-
*पुलिस और वकील एक ही परिवार के दो सदस्य से होते हैं, दोनों के लक्ष समाज को
क़ानून सम्मत नियंत्रित करने के होते हैं, पर दिल्ली में जो हुआ या हो रहा है
उस...
इंतज़ार और दूध -जलेबी...
-
वोआते थे हर साल। किसी न किसी बहाने कुछ फरमाइश करते थे। कभी खाने की कोई खास
चीज, कभी कुछ और। मैं सुबह उठकर बहन को फ़ोन पे अपना वह सपना बताती, यह सोचकर
कि ब...
राजू उठ ... चल दौड़ लगाने चल
-
राजू उठ
भोर हुई
चल दौड़ लगाने चल
पानी गरम कर दिया है
दूध गरम हो रहा है
राजू उठ
भोर हुई
चल दौड़ लगाने चल
दूर नहीं अब मंजिल
पास खड़े हैं सपने
इक दौड़ लगा कर जीत...
काया
-
काया महकाई सतत, लेकिन हृदय मलीन।
चहकाई वाणी विकट, प्राणी बुद्धिविहीन।
प्राणी बुद्धिविहीन, भरी है हीन भावना।
खिसकी जाय जमीन, न करता किन्तु सामना।
पाकर उच्चस्...
cara mengobati herpes atau dompo
-
*cara mengobati herpes atau dompo* - Kita harus mengetahui apa Gejala
Penyakit Herpes Dan Pengobatannya, agar ketika kita terjangkiti penyakit
herpes, kit...
अरे अरे अरे
-
आ गईं तुम
आना ही था तुम्हे
देहरी पर कटोरी उलटी रख कर माँ ने कहा था,
आती ही होगी वह देखना पहुँच जायेगी।
वह भीगी हुई चने की दाल और हरी मिर्च
जो तोते के लिये...
यह विदाई है या स्वागत...?
-
एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है |
अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं
पह...
पापा तुम क्यों चले गए ?
-
पापा ………………………………..
तुम्हारी साँसों में धडकन सी थी मैं ,
जीवन की गहराई में बचपन सी थी मैं ।
तुम्हारे हर शब्द का अर्थ मैं ,
तुम्हारे बिना व्यर्थ मैं , ...
मेरी कविता - जीवन
-
*जीवन*
*चित्र - google.com*
*जीवन*
* तुम हो एक अबूझ पहेली, न जाने फिर भी क्यों लगता है तुम्हे बूझ ही
लूंगी. पर जितना तुम्हे हल करने की कोशिश कर...
उड़ चला है वक्त.....
-
वक्त है या नहीं है वक्त वक्त का क्या बीतता जाता है कोसना वक्त को मूर्खता है
निरी अनमोल देन है ये वक्त.....दाता की नेमत है ये वक्त वक्त का... हर लम्हा
अकूत ...
“ रे मन ”
-
*रूह की मृगतृष्णा में*
*सन्यासी सा महकता है मन*
*देह की आतुरता में*
*बिना वजह भटकता है मन*
*प्रेम के दो सोपानों में*
*युग के सांस लेता है मन*
*जीवन के ...
-
चलने को तो चल रही है ज़िंदगी
बेसबब सी टल रही है ज़िंदगी ।
बुझ गये उम्मीद के दीपक सभी
तीरगी में ही पल रही है ज़िंदगी ।
ऐ खुदा ,रहमो इनायत पे तेरी
ये मुकम...
ये कैसा संस्कार जो प्यार से तार-तार हो जाता है?
-
जात-पात न धर्म देखा, बस देखा इंसान औ कर बैठी प्यारछुप के आँहे भर न सकी,
खुले आम कर लिया स्वीकारहाय! कितना जघन्य अपराध! माँ-बाप पर हुआ वज्रपातनाम
डुबो दिया,...
हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...3
-
गत अंक से आगे.....हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर बहुत ही रचनात्मक था.
इस दौर में जो भी ब्लॉगर ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय थे, वह इस माध्यम के
प्रति ...
प्रेम करती हूँ तुमसे
-
यमुना किनारे उस रात
मेरे हाँथ की लकीरों में
एक स्वप्न दबाया था ना
उस क्षण की मधुस्मृतियाँ
तन को गुदगुदाती है
उस मनभावन रुत में
धडकनों का मृदंग
बज उ...
गाँधी जी......
-
गाँधी जी......
---------
चौराहॆ पर खड़ी,गाँधी जी की प्रतिमा सॆ,हमनें प्रश्न किया,
बापू जी दॆश कॊ आज़ादी दिला कर, आपनॆं क्या पा लिया,
बापू आपके सारॆ कॆ सारॆ सि...
Demonetization and Mobile Banking
-
*स्मार्टफोन के बिना भी मोबाईल बैंकिंग संभव...*
प्रधानमंत्री मोदीजी ने अपनी मन की बात में युवाओं से आग्रह किया है कि हमें
कैशलेस सोसायटी की तरफ बढ़ना है औ...
आप अदालत हैं
-
अपना मानते हैं जिन्हें
वही नहीं देते अपनत्व।
पक्षपात करते हैं सदैव वे
पुत्री के आँसुओं का स्वर सुन।
नहीं जाना उन्होंने मेरी कटुता को
न ही मेरी दृष्टि में बन...
फिर अंधेरों से क्यों डरें!
-
प्रदीप है नित कर्म पथ पर
फिर अंधेरों से क्यों डरें!
हम हैं जिसने अंधेरे का
काफिला रोका सदा,
राह चलते आपदा का
जलजला रोका सदा,
जब जुगत करते रहे हम
दीप-बा...
चलो नया एक रंग लगाएँ
-
लाल गुलाबी नीले पीले,
रंगों से तो खेल चुके हैं,
इस होली नव पुष्प खिलाएँ,
चलो नया एक रंग लगाएँ ।
मानवता की छाप हो जिसमे,
स्नेह सरस से सना हो जो,
ऐसी होली खू...
-
तू होती गई जब दूर मुझसे,
मैं तुझमे ही और खोता गया,
भीड़ बढ़ती गई महफिल में,
मैं तन्हा और तन्हा होता गया ।
तू खुद की ही करती रही जब,
मैं तेरे ही सपने पिरोता...
स्वागतम्
-
मित्रों,
सभी को अभिवादन !!
बहुत दिनों के बाद कोई पोस्ट लिख रहा हूँ |
इतने दिनों ब्लॉगिंग से बिलकुल दूर ही रहा | बहुत से मित्रों ने इस बीच कई
ब्लॉग के लि...
विचार शून्यता।
-
विचार ,
कई बार बहते है हवा से,
छलकते है पानियों से,
झरते है पत्तियों से
और
कई बार उठते है गुबार से
घुटते है, उमड़ते है,
लीन हो जाते है शून्य में
फिर
यह...
एक रामलीला यह भी
-
एक रामलीला यह भी
यूं तो होता है
रामलीला का मंचन
वर्ष में एक बार
पर मेरे शरीर के
अंग अंग करते हैं
राम, लक्ष्मण,
सीता और हनुमान
के पात्र जीवन्त.
देह की सक...
त्यौहार
-
मुझे याद है जब हम छोटे थे नवरात्री की अष्टमी से दिवाली की छुट्टियाँ लग
जाती थीं। झाबुआ जिले के रानापुर में रहते पहली बार गरबे सीखे थे। दशहरे के
दिन से रोज़...
हरिगीतिका
-
"आओ कविता करना सीखें" आज का छंद....
*हरिगीतिका* में --------विरहणी---
जब भी हुआ यह भान मानव, आपको घनघोर से
तब ही बनी यह धारणा कुछ, नाचते मन मोर से
अब आ गय...
मन गुरु में ऐसा रमा, हरि की रही न चाह
-
ॐ
श्री गुरुवे नमः
*ॐ ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ।*
* द्वंद्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥ एकं नित्यं विमलमचलं
सर्वधीसाक्षीभूतम् । ...
गुरु पूर्णिमा
-
आज गुरु पूर्णिमा है ! अपने गुरु के प्रति आभार प्रकट करने का दिवस ,गुरु
शब्द का अर्थ होता है अँधेरे से प्रकाश की और ले जाने वाला ,अज्ञान ज्ञान की
और ले...
-
*जरा अपनी पॉलटिक्स तो बताओ राहुल!*
...............................................................
राहुल गांधी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक पूरी बीट हैं ...
-
बिखरती ही रही
कभी सिमटी ही नही ।
वफ़ा के साये में
बेवफाई पलटी रही ।
बातों किस्सों में
उलझकर रह गई ...
जमाना खामोश रहा
किसी की एक न चली ।
धुवाँ बनकर उड़ती र...
-
ख्वाबों की ताबीर
सुना है उसके शहर की ...
बात बड़ी निराली है ,
सुना है ढलते सूरज ने ...
कई दास्ताँ कह डाली है ,
सुना है जुगनुओं ने ...
कई बारात निकाली है ,
...
हमारा सामाजिक परिवेश और हिंदी ब्लॉग
-
वर्तमान नगरीय समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस परिवेश में सामाजिक संबंध
सिकुड़ते जा रहे हैं । सामाजिक सरोकार से तो जैसे नाता ही खत्म हो गया है। प्रत्येक...
क्रिकेट विश्व कप 2015 विजय गीत
-
धोनी की सेना निकली दोहराने फिर इतिहास
अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस |
शास्त्री की रणनीति भी है और विराट का शौर्य ,
धोनी की तो धूम मची है विश्व ...
'मेरा मन उचट गया है त्यौहारों से'
-
मेरा मन उचट गया है त्यौहारों से… मेरे कान फ़ट चुके हैं सवेरे से लाउड वाहियत
गाने सुनकर और फ़ुर्र हो चुका है गर्व। ये कौनसा रंग है मेरे देश का? बिल्कुल
ऐसा ...
आहटें .....
-
*आज भोर *
*कुछ ज्यादा ही अलमस्त थी ,*
*पूरब से उस लाल माणिक का *
*धीरे धीरे निकलना था *
*या *
*तुम्हारी आहटें थी ,*
*कह नहीं सकती -*
*दोनों ही तो एक से...
झाँसी की रानी पर आधारित "आल्हा छंद"
-
झाँसी की रानी पर आधारित 'अखंड भारत' पत्रिका के वर्तमान अंक में सम्मिलित
मेरी एक रचना. हार्दिक आभार भाई अरविन्द योगी एवं सामोद भाई जी का.
सन पैंतीस नवंबर उ...
हम,तुम और गुलाब
-
आज फिर
तुम्हारी पुरानी स्मृतियाँ झंकृत हो गई
और इस बार कारण बना
वह गुलाब का फूल
जिसे मैंने
दवा कर
किताबों के दो पन्नों के
भूल गया गया था
और उसकी हर पंखुड़िय...
गाँव का दर्द
-
गांव हुए हैं अब खंढहर से,
लगते है भूल-भुलैया से।
किसको अपना दर्द सुनाएँ,
प्यासे मोर पप्या ?
आंखो की नज़रों की सीमा तक,
शहरों का ही मायाजाल है,
न कहीं खे...
-
*चल हसरतो के गावँ एक पौधा लगाये*
*चल हसरतो के गावँ एक पौधा लगाये*
नीला था जो था हरा कभी
मद्धम था जो वेगा कभी
काली पड़ी नदिया को चल निर्मल बनाए
छिन छिन पड़े...
रंग रंगीली होली आई.
-
[image: Friends18.com Orkut Scraps]
रंग रंगीली होली आई..
रंग - रंगीली होली आई मस्तानों के दिल में छाई
जब माह फागुन का आता हर घर में खुशियाली...
अन्त्याक्षरी
-
कभी सोचा नहीं था कि इसके बारे में कुछ लिखूँगी: बचपन में सबसे आमतौर पर खेला
जाने वाला खेल जब लोग बहुत हों और उत्पात मचाना गैर मुनासिब। शायद यही वजह है
कि इ...
संघर्ष विराम का उल्लंघन
-
जम्मू,संघर्ष विराम का उल्लंघनकरते हुए पाकिस्तानी सेना ने रविवार को फिर से
भारतीय सीमा चौकियों पर फायरिंग की। इस बार पाकिस्तान के निशाने पर जम्मू जिले
के का...
प्रतिभा बनाम शोहरत
-
“ हम होंगें कामयाब,हम होंगें कामयाब,एक दिन ......माँ द्वारा गाये जा रहे इस
मधुर गीत से मेरे अन्तःकरण में नए उत्साह का स्पंदन हो रहा था .माँ मेरे माथे
को...
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 7 ........दिनकर
-
'हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?
कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ?
धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान?
जाति-गोत्...
आवरण
-
जानती हूँ
तुम्हारा दर्प
तुम्हारे भीतर छुपा है.
उस पर मैं
परत-दर-परत
चढाती रही हूँ
प्रेम के आवरण
जिन्हें ओढकर
तुम प्रेम से भरे
सभ्य और सौम्य हो जाते हो
जब ...
OBO -छंद ज्ञान / गजल ज्ञान
-
उर्दू से हिन्दी का शब्दकोश
*http://shabdvyuh.com/*
ग़ज़ल शब्दावली (उदाहरण सहित) - 2 गीतिका छंद
वीर छंद या आल्हा छंद
'मत्त सवैया' या 'राधेश्यामी छंद' :एक ...
इंतज़ार ..
-
सुरसा की बहन है
इंतज़ार ...
यह अनंत तक जाने वाली रेखा जैसी है
जवानी जैसी ख्त्म होने वाली नहीं ..
कहते हैं ..
इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी होती हैं
ख़त्म भ...
यार की आँखों में.......
-
मैं उन्हें चाँद दिखाता हूँ
उन्हे दिखाई नही देता।
मैं उन्हें तारें दिखाता हूँ
उन्हें तारा नही दिखता।
या खुदा!
कहीं मेरे यार की आँखों में
मोतियाबिंद...
आज का चिंतन
-
अक्सर मैं ऐसे बच्चे जो मुझे अपना साथ दे सकते हैं, के साथ हंसी-मजाक करता
हूँ. जब तक एक इंसान अपने अन्दर के बच्चे को बचाए रख सकता है तभी तक जीवन उस
अंधकारमय...
क्राँति का आवाहन
-
न लिखो कामिनी कवितायें, न प्रेयसि का श्रृंगार मित्र।
कुछ दिन तो प्यार यार भूलो, अब लिखो देश से प्यार मित्र।
………
अब बातें हो तूफानों की, उम्मीद करें परिवर्तन ...
कल रात तुम्हारी याद
-
कल रात तुम्हारी याद को हम
चाह के भी सुला न पाये
रात के पहले पहर ही
सुधि तुम्हारी घिर कर आई
अहसास मुझको कुछ यूँ हुआ
पास जैसे तुम हो खड़े
व्याकुल हुआ कुछ मन...
HAPPY NEW YEAR 2012
-
*2012*
*नव वर्ष की शुभकामना सहित:-*
*हर एक की जिंदगी में बहुत उतार चढाव होता रहता है।*
*पर हमारा यही उतार चढाव हमें नया मार्ग दिखलाता है।*
*हर जोखिम से ...
अब बक्श दे मैं मर मुकी
-
चरागों से जली शाम ऐ , मुझे न जला तू और भी,
मेरा घर जला जला सा है,मेरा तन बदन न जला अभी,
मैंने संजो रखे हैं बहुत से राख के ढेर दिल मैं कहीं,
सुलग सुलग के आय...
अपनी भाषाएँ
-
*जैसे लोग नहाते समय आमतौर पर कपड़े उतार देते हैं वैसे ही गुस्से में लोग
अपने विवेक और तर्क बुद्धि को किनारे कर देते हैं। कुछ लोगों का तो गुस्सा ही
तर्क...
-
दिल को आदत सी हो गयी है चोट खाने की
तुमसे दर्द पाकर भी मुस्कुराने की ....
ये जानते हुए की तुम आओगे नहीं कभी
फिर भी न जाने क्यूँ आस लगी है तुम्हारे आन...
दरिन्दे
-
बारूद की गन्ध फैली है, माहौल है धुआँ-धुआँ
कपड़ों के चीथड़े, माँस के लोथड़े फैले हैं यहाँ-वहाँ।
ये छोटा चप्पल किसी मासूम का पड़ा है यहाँ
ढूँढो शयद वह ज़िन...
वाह जी वाह !!!
जवाब देंहटाएंbhaavon kaa aisaa ghotam-ghot
aapke paas hii sambhav hai.
naam pooraa saarthak kar rahe hain aap.
yadi aapki kavita kareene se likhi gayi hoti to
aam paathak bhi iskaa mazaa le paate.
kuchh hi hote hain jo Jamaalghote se bhi tatv doondh lete hain.