मन- बसंत
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा ,इच्छाओं का बस अंत हो गया
जब से मेरी ,प्राण प्रिया ने करी ,ठिठौली ,
राम करूं क्या ,बूढा मेरा कंत हो गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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*डॉ**. सुरंगमा यादव की कविताएँ*
* 1 यूँ हीं न मिले कुछ *
फलक पर सितारे न यूँ ही सजे हैं
सिफ़र से शिखर तक जमाने लगे हैं
खुशियों का मौसम न यूँ ही मि...
17 घंटे पहले
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