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बुधवार, 27 जून 2012

पाती-पिता के नाम

 पाती-पिता के नाम

आज हम जो कुछ भी हैं,ये मेहरबानी आपकी

हमारा किस्सा नहीं ,ये है कहानी आपकी
जिंदगी के इस सफ़र में ,आई जब भी मुश्किलें,
हम गिरे या लडखडाये,उंगली  थामी आपकी
थपथपा कर पीठ इसी हौसला अफजाई की,
जोश दूना भर गयी  ये कदरदानी  आपकी
इस चमन में खिल रहे है,फूल हम जो महकते,
आपका है खाद पानी, बागवानी   आपकी
आपने डाटा ,दुलारा ,सीख दी ,रस्ता  दिखा,
याद है बचपन की सब ,बातें पुरानी आपकी
आपके कारण ही कायम है हमारा ये वजूद,
आपका ही अक्स हैं,हम है निशानी   आपकी
देर से आये हैं लेकिन आये हैं हम तो दुरुस्त,
आपको पहचान पाए,कदर  जानी आपकी
आपका साया हमारे सर पे  बस कायम रहे,
हे खुदा! हो जाए हम पर मेहरबानी  आपकी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

गड्डों से बचो

      गड्डों से बचो

घर से जब निकलो

संभल  कर चलो
सोच समझ कर के,
बाहर पग  धरो
हो सकता है,तुम्हारे पडोसी ने,
अपने फायदे के लिए,
या तुम्हे फ़साने
गड्डे खोद रखें हो,
जिनमे तुम या तुम्हारे बच्चे,
गिर सकते है,जाने,अनजाने
और प्रिंस या माही की तरह,
बन सकते है सिर्फ  अफ़साने
याद रहे,गड्डे खोदना कठिन है,
पर उनमे गिरना बड़ा आसान है
और उनमे से निकलने में,
बड़ी मुश्किल में फंस जाती जान है
क्योंकि एक गड्डे से निकलने के लिए,
पास में दूसरे गड्डे भी खोदने पड़ते है
और आपस में जोड़ने पड़ते है
और इस कार्यवाही में,
इतना समय लग जाता है
कि गड्डे में गिरे आदमीका,
दम ही निकल जाता है
आज खेतों में खुले बोरवेल  है
सड़कों पर खुले मेनहोल  है
नफरत के गड्डे है
 लालच  के गड्डे है
नशीले पदार्थों के गड्डे है
बेईमानी और भ्रष्टाचार के गड्डे है
जरा सी भी असावधानी हुई,
हम इनमे गिर जाते है
मुश्किल से घिर जाते है
इसीलिए कहता हूँ,
घर से जब निकलो
संभल कर चलो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


मंगलवार, 26 जून 2012

ये मेरी कवितायेँ

     ये मेरी कवितायेँ

जो मेरे अंतर को ,हिला हिला देती है

कभी मार देती है,कभी जिला  देती है
कभी रुलाती मुझको और कभी सहलाती
जब मेरी पीडायें,कवितायेँ  बन जाती
मेरे लब मौन और शांत रहा  करते है
आँखों से आंसूं ना,शब्द बहा  करते है
लेखनी दर्दों को,पहनाती जामा  है
सिर्फ चंद लफ्जों में, पीर सब समाना है
उधड़ते रिश्तों को,भावों के धागे से
सुई ले तुरपतें है, पीछे या  आगे से
पत्थर से उर पर है,जमी  काई सी फिसलन
फिसल फिसल कर यादें,कवितायेँ जाती बन
कविता की हर पंक्ति ,कतरन है यादों की
कुछ टूटे सपनो की,कुछ झूंठे   वादों की
जोड़ इसी  कतरन को,बन जाता कम्बल है
एकाकी जीवन का, ये ही तो संबल है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

इतना ही काफी है

   इतना ही काफी है 

बच्चे ,अब बढे हो गये है

अपने पैरों पर खड़े हो गये है
ख़ुशी है ,कुछ बन गये है
गर्व से पर तन गये है
 कभी कभी जब मिलते
लोकलाज या  दिल से
चरण छुवा  करते  है
कमर झुका   लेते है
ये भी क्या कुछ कम है
खुश हो जाते हम है
नम्रता  कुछ  बाकी है
इतना ही काफी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


नाम पर मत जाओ

       नाम पर मत जाओ

सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,

     सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के  जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
    जा न सके सूरज तक, बहुत दूर   है धरती
  इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
        डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
      वजन एक माशा है,पर कहलाता  मनका


मदन मोहन बाहेती'घोटू'    

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