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गुरुवार, 30 सितंबर 2021

लकीरे 

चित्रकार के हाथों जब लकीरे उकरती है 
तो कैनवास पर जागृत हो जाती है एक सूरत 
किसी नक्शे की लकीरे,जब दीवारें बन कर उगती है 
तो खड़ी हो जाती है एक इमारत 
लकीरों की ज्यामिति के बल पर ही ,
इंसान चांद तक पहुंच पाता है 
पगडंडी सी लकीरे ,जब प्रगति करती है
 तो राजमार्ग बन जाता है 
 नारी की मांग में सिंदूर की लकीर 
 उसके सुहागन होने की निशानी है 
 परंपरा की लकीरों पर चलकर ही,
 हमें अपनी संस्कृति बचानी है 
 महाजनों के पदचिन्हों की लकीरें 
 हमारी प्रगति के लिए पथ प्रदर्शक है 
 नारी के तन की वक्ररेखाएं 
 उसे बनाती बहुत आकर्षक है 
 परेशानी में आदमी के माथे पर 
 चिंता की लकीरें खिंच जाती है 
 हमारे सलोने चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें 
 बढ़ती हुई उम्र का अहसास कराती है 
 हमारी हथेली में लकीरों में 
 भगवान ने लिख कर भेजी हमारी तकदीर है 
 आप माने ना माने मगर यह सच है 
 कि हर बंदा लकीर का फकीर है

मदन मोहन बाहेती घोटू

बुधवार, 29 सितंबर 2021

गुब्बारे 

भैया हम गुब्बारे हैं 
भरी हवा है, फूल रहे हम मगर गर्व के मारे हैं 
भैया हम गुब्बारे हैं 
अभी जवानी है, तनाव है,चमक दमक चेहरे पर है 
उड़े उड़े हम फिरते, जैसे लगे हुए हम पर, पर हैं 
बच्चे हम संग खेल रहे ,हम बच्चों का मन बहलाते
शुभअवसर पर, साज सजावट में हम सबके मनभाते  संग हवा के उड़ते रहते, हम निरीह बेचारे हैं
भैया हम गुब्बारे हैं
दिखने की ढब्बू है लेकिन हम तन के कमजोर बड़े 
जाते फूट,अगर छोटा सा कांटा भी जो हमें गढ़े
यूं भी धीरे-धीरे हवा निकल जाती, मुरझाते हम
क्षणभंगुर है जीवन फिर भी रहते हैं मुस्काते हम 
प्राणदायिनी हवा ,हवा में बसते प्राण हमारे हैं
भैया हम गुब्बारे हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू
मेरी दादी 

आज अचानक याद आ गई मुझको मेरी दादी की 
नेह भरी, प्यारी, मुस्काती,  निश्चल सीधी-सादी की 
गोरा चिट्टा गोल बहुत था, जब हंसती मुस्कुराती थी 
तो हाथों से मुंह ढक अपने, टूटे दांत छुपाती थी 
दादाजी थे स्वर्ग सिधारे ,जब बाबूजी नन्हे थे 
पालपोस कर बड़ा किया,दुख कितने झेले उनने थे 
वात्सल्य की मूरत थी वो, सब के प्रति था प्यार भरा बच्चों खातिर,सबसे भिड़ती,डर था मन में नहीं जरा
हर मुश्किल से टक्कर लेती, उनमें इतनी हिम्मत थी
 संघर्षों से खेली थी वह ,बड़ी जुझारू, जीवट थी 
मुझे सुला अपनी गोदी में, मेरा सर सहलाती थी 
किस्से और कहानी कहती,अक्सर मुझे सुलाती थी 
मैं शैतानी करता कोई ,अगर शिकायत आती थी 
तो बाबूजी की पिटाई से, दादी मुझे बचाती थी 
नन्हें हाथों से दादी की, पीठ खुजाया करता मैं 
तो बदले में दादी से ,एक पैसा पाया करता मैं 
पांव दुखा करते दादी के, उन्हें गूंधता में चढ़कर 
दो पांवों के दो पैसे ,दादी से लेता मैं लड़ कर
सब पर स्नेह लुटानेवाली ,सबके मन को भाती की
आज अचानक याद आगई ,मुझको मेरी दादी की 

मदन मोहन बाहेती घोटू

रविवार, 26 सितंबर 2021

क्यों

 जिसमें होती अक्ल जरा कम ,
 उसे कम अक्ल कहते हैं सब,
  तो क्यों मंद अक्ल वाले को 
  कहते अकलमंद और ज्ञानी 
  
  कलम रखो वह कलमदान है,
   फूल रखो वह फूल दान है ,
   पास फटकने ना दे मच्छर 
   क्यों कहलाती मच्छरदानी 
   
   जिसका चेहरा भाव शून्य हो 
   लगती हो पत्थर की मूरत 
   आती जिसको कभी हंसी ना,
    मगर हसीना वह कहलाती 
    
    जोर नहीं कमजोर ठीक है, 
    होती जिसमें कोई कमी ना ,
    मगर कमीना कहलाता है
    बात समझ में यह ना आती

घोटू
प्रतिबंधित जीवन 

प्रतिबंधों के परिवेश में ,जीवन जीना बहुत कठिन है 
बात बात में ,मजबूरी  के ,आंसूं पीना  बहुत कठिन है 

रोज रोज पत्नीजी हमको ,देती रहती  सीख नयी है
इतना ज्यादा ,कंट्रोल भी ,पति पर रखना ठीक नहीं है 
आसपास सुंदरता बिखरी ,अगर झांक लूं ,क्या बिगड़ेगा 
नज़र मिलाऊँ ,नहीं किसी से ,मगर ताक लूं ,क्या बिगड़ेगा 
पकती बिरयानी पड़ोस में ,खा न सकूं ,खुशबू तो ले लूं 
सुन सकता क्या नहीं कमेंट्री ,खुद क्रिकेट मैच ना खेलूं 
चमक रहा ,चंदा पूनम का ,कर दूँ उसकी अगर प्रशंसा 
क्या इससे जाहिर होता है ,बिगड़ गयी है मेरी मंशा
खिले पुष्प ,खुशबू भी ना लूं ,बोलो ये कैसे मुमकिन है 
प्रतिबंधों के परिवेश में ,घुट घुट जीना बहुत कठिन है 

शायद तुमको डर तुम्हारे ,चंगुल से मैं निकल जाऊँगा 
यदि ज्यादा कंट्रोल ना रखा  ,मैं हाथों से फिसल जाऊँगा 
मुझे पता ,इस बढ़ी उमर में ,एक तुम्ही पालोगी मुझको 
कोई नहीं जरा पूछेगा ,तुम्ही  घास डालोगी मुझको
खुले खेत में जा चरने की ,अगर इजाजत भी दे दोगी 
मुझमे हिम्मत ना चरने की ,कई रोग का ,मैं हूँ रोगी
तरह तरह के पकवानो की ,महक भले ही ललचायेगी 
मुझे पता ,मेरी थाली में ,घर की रोटी दाल आएगी
मांग रहा आजादी पंछी ,बंद पींजरे से  लेकिन है   
प्रतिबंधों के परिवेश में ,घुट घुट जीना बहुत कठिन है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ;

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