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बुधवार, 20 जनवरी 2021

पहले तो तुम ऐसी ना थी

अब तुमको क्या क्या बतलाऊँ ,अब तुम क्या हो ,पहले क्या थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

जब आयी थी दुल्हन बन कर ,तब तुम्हारा ,रूप ख़ास था
आँखों में लज्जा का पहरा ,अपनापन था और मिठास था
भोलीभाली सी सूरत से ,तुमने सबका मन लूटा था
तुमको पाकर ,मेरे मन में ,एक प्यार झरना फूटा था
आता याद ,मुझे वो कल जब ,तुम कल कल करती सरिता थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

तब तुम्हारे ,काले कुंतल , काँधे  पर झूमा करते थे
फूलों से कोमल गालों को ,भ्र्मरों  से चूमा करते थे
रक्तिम अधरों पर चुंबन था ,यौवन से थी ,तुम मदमाती
खिल जाते थे फूल हज़ारों ,जब तुम मस्ती में मुस्काती
यौवन से परिपूर्ण ,सुहानी ,सुंदरता की तुम प्रतिमा थी  
पहले तो तुम ऐसी ना थी

मेरे बिन बोले ही मेरे ,मन के भाव जान जाती थी
मेरे सारे प्रस्तावों  को ,नज़रें झुका ,मान जाती थी
ना तो करती ,कोई प्रश्न थी ,ना  गुंजाईश थी विवाद की
ना मन में मलाल रहता था ,अच्छी लगती ,सभी बात थी
निश्च्ल,चंचल,प्यारी प्यारी ,मुस्काती नन्ही गुड़िया थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

पहले कभी हुआ करती थी ,तुम सीधी सादी और भोली
अब सीधे मुंह बात न करती ,बहुत हो गयी हो बड़बोली
पहले प्यार लुटाती थी अब ,मुझे सताती ,बेदरदी  हो
पहले बासन्ती बहार थी ,अब तुम दिल्ली की सरदी हो
आपस में विचार मिलते थे ,मेरी हाँ तुम्हारी हाँ  थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

पहले पायल की रुनझुन थी ,अब तुम बादल की गर्जन हो
पहले नरम गर्म फुल्का थी ,हुई डबलरोटी अब तुम हो
अब ना तीर चलाते नयना ,अब न रहा वो रूप सलोना
हुई द्विगुणित काया अब तो ,फूला तन का कोना कोना
पहले तुम मेरी सुनती थी ,अब रहती हो मुझे सुनाती
पहले तो तुम ऐसी ना थी
पहले थी तुम कली महकती ,अब कुम्हलाया हुआ फूल हो
पहले कोमल ,कमल फूल सी ,अब चुभने वाला त्रिशूल हो
पहले शर्म हया की पुतली ,बहुत लजीली  और शरमीली
अब तेवर तीखे दिखलाती ,बहुत हो गयी हो रोबीली
 पहले सेवाभाव भरा था ,तुममे प्रेम भरी गरिमा थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

शांत और शीतल स्वभाव था ,सबके प्रति मन में दुलार था
एक पालतू गैया सी तुम ,देती थी बस दूध प्यार का
अब तो कितना ही पुचकारो ,बात बात पर बिगड़ झगड़ती
मन माफिक यदि कुछ न होता ,झट से सींग मारने लगती
कभी शरम से जो झुकती थी ,वो आँखें रहती ,दिखलाती
पहले तो तुम ऐसी ना थी

अब तो यही प्रार्थना प्रभु से ,कि तुम पहले सी हो जाओ
पहले सी ही प्रीत दिखाओ ,पहले जैसी ही मुस्काओ
बचे खुचे जीवन के कुछ दिन ,हम तुम ,ख़ुशी ख़ुशी मिल काटें
मेलजोल रख ,रहे प्यार से ,सबके संग में ,खुशियां बांटे
हो प्रयाग फिर से जब मिलती ,प्यार भरी गंगा यमुना थी
पहले तो तुम ऐसी ना थी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 देवता और आदमी  

नहीं एक उसमे ,हजारों कमी है
नहीं देवता  वो  ,तभी आदमी है

फंसा मोह माया में ,होकर के अँधा
कई गलतियों का ,जो होता पुलंदा
करम से कमीना ,विचारों से गंदा
सदा भूल जाता ,जो अपनी जमीं है
नहीं देवता वो ,तभी आदमी है

समझ जो न पाता ,औरों की पीड़ा
करने की सेवा ,उठाता न  बीड़ा
भोगों में डूबा हुआ है जो कीड़ा
लालच और लिप्सा में काया रमी है
नहीं देवता वो ,तभी आदमी है

बसेगा ह्रदय में जब सत्य उसमे
छलकेगा जब प्यारअपनत्व उसमे
आयेगा तब ही तो देवत्व उसमे
अहम् से रहे दूर ,ये लाजमी है
नहीं देवता वो ,तभी आदमी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मैं तुमसे गुस्सा हूँ

हम है जनम जनम के साथी ,दिया बाती साथ हमारा
एक दूसरे के सुख दुःख में ,बन कर रहते ,सदा सहारा
पर तुम मन की बात छुपाते ,अपनी पीड़ा नहीं बताते
उसे बांटती ख़ुशी ख़ुशी मैं ,यदि कुछ अपनापन दिखलाते
एक जान जब कि हम तुम है ,मैं तुम्हारा ही हूँ हिस्सा
तुम अपना गम नहीं बांटते ,जाओ,मैं तुमसे हूँ गुस्सा  

तुम करते सागर का मंथन ,मेरु जैसी मथनी बन कर
मिलते रतन ,बाँट सब देते ,खुद विष पीते ,बन शिवशंकर
सुखी और खुशहाल रहे हम ,तुम दुःख सहते ,इसीलिये हो
हमें नहीं अपराध बोध हो ,कुछ ना कहते ,इसीलिये हो
खुद पर करते सभी कटौती ,रोज रोज का है ये किस्सा
तुम अपना गम नहीं बांटते , जाओ मैं हूँ तुम पर गुस्सा

तुम पैदल दफ्तर जाते हो ,ताकि कुछ पैसे बच जाये
फटे वस्त्र भी पहनो ताकि ,मेरी नव साड़ी आ जाए
तुमको शौक मिठाई का पर ,ना खाते कह,डाइबिटीज है
अपनी इच्छा दबा दबा कर ,ना खरीदते कोई चीज  है
तुमने ये किफायती फंदा ,खुद के ऊपर ही है कस्सा
तुम अपना गम नहीं बताते ,जाओ ,मैं तुम पर हूँ गुस्सा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
रजनीचर्या

दिनभर काम में रह कर व्यस्त
थका हुआ मैं ,थकी हुई तुम ,
दोनों पस्त
अक्सर
जब हम लेटते है बिस्तर पर
तेरी बांह मुझको लपेट लेती है
अपने  पास समेट  लेती है
मैं तेरे सीने पर
सर रख कर
सो जाता हूँ
बड़ा सुकून पाता हूँ
जब तुम मेरे सर को थपथपाती हो
बालों में उँगलियाँ डाल ,सहलाती हो
मेरे दिल की धड़कन
हर क्षण
सुनाई देती है मधुर संगीत बन
और तुम्हारी साँसों के स्वर
मेरी साँसों से टकरा कर
देते है इतना नशा भर
कि मैं सो जाता हूँ ,
तेरी उँगलियों में ,अपनी उँगलियाँ फंसा कर
रोज रोज चलता है यही क्रम
तुम और हम
प्यार का बंधन
यही है जीवन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
बुढ्ढों  का दम

सभी सीनियर के लिये ,बड़े गर्व की बात
राष्ट्रपति 'वाइडन 'बने ,मिली 'ट्रम्प 'को मात
मिली 'ट्रम्प' को मात ,उमर जिसकी अठहत्तर
चार साल तक राज्य करेगा ,अमेरिका पर
कह घोटू कविराय , नहीं क्या  ऐसा  लगता
बूढा हो इंसान ,बहुत कुछ पर कर सकता

पत्नी ताने मारती ,थी हम पर हर बार
 कि हम अब बूढ़े हुये ,नाकामा ,लाचार
नाकामा ,लाचार ,बचा ना अब हममें दम
अमेरिका की राष्ट्रपति ,जब बने 'वाइडन '
 अठहत्तर का बूढा अब सब  पर है हावी
समझो मैडम , बुढ्ढों में दम रहता काफी

घोटू 

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