मगर टिमटिमा कर के जलते तो है
पीने की हमको है आदत नहीं,
मगर दारू घर में हम रखते तो है
खाने पे मीठे की पाबंदी है ,
मिले जब भी मौका तो चखते तो है
खुद का बनाया हुआ हुस्न है,
चोरी छुपे इसको तकते तो है
नहीं सोने देती तू अब भी हमें ,
तेरे खर्राटों से हम जगते तो है
रहा तुझमे पहले सा वो जलवा नहीं,
मगर अब भी तुझ पर हम मरते तो है
अगर नींद हमको जो आती नहीं,
तकिये को बाँहों में भरते तो है
दफ्तर से तो हम रिटायर हुए,
मगर काम घरभर का करते तो है
कहने को तो घर के मुखिय है हम,
मगर बीबी,बच्चों से डरते तो है
ये माना कि हम तो है बुझते दिये ,
मगर टिमटिमा करके जलते तो है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
रामवती : स्त्री-अस्मिता, लोकजीवन और प्रतिरोध का काव्य-विमर्श — अवनीश सिंह
चौहान
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