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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

मन बिरहन का

मन बिरहन का
  
बरस बरस कर रीते मेघा,
     उमर कट गयी बरस बरस कर
बरस बरस तक ,बहते बहते,
      आंसू सूखे,बरस बरस   कर
मन में लेकर,आस दरस की,
       रह निहारी,कसक कसक कर
हमने साड़ी,उम्र गुजारी,
        यूं ही अकेले, टसक टसक कर
गरज गरज ,छाये घन काले,
       बहुत सताया ,घुमड़ घुमड़ कर
आई यादों की बरसातें,
           आंसू निकले ,उमड़ उमड़  कर
नयन निगोड़े,आस न छोड़े,
        रहे ताकते,डगर डगर  पर
  मेरे सपने,रहे न अपने,
         टूट गए सब,बिखर बिखर कर
ना आना था,तुम ना आये,
        रही अभागन,तरस तरस कर
बरस बरस कर,रीते मेघा,
      उमर कट गयी,बरस बरस कर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

प्रकृति और मानव

प्रकृति और मानव

समंदर का खारा पानी,
प्रकृति के स्पर्श से,
सूरज की गर्मी पा,
बादल बन बरसता है
मीठा बन जाता है
सब को हर्षाता है
और वो ही शुद्ध जल,
पीता जब है मानव,
तो मानव का स्पर्श पा,
शुद्ध जल ,शुद्ध नहीं रह पाता
मल मूत्र बन कर के,
 नालियों में बह जाता
प्रकृति के संपर्क से ,
बुरा भी बन जाता भला,
और मानव के संपर्क से,
भला भी जाता बिगड़ है
प्रकृति और मानव में,
ये ही तो अंतर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

रुंगावन

       रुंगावन

मै तो लेने गया था ,इस जग की जिम्मेदारियां ,
                    रुंगावन  में बाँध दी संग,उसने कुछ  खुशियाँ मुझे
कुछ ठहाके,कहकहे कुछ,और कुछ मुस्कान भी,
                    लगी फिर से अच्छी लगने, ये तेरी दुनिया   मुझे
देता है सौदा खरा और नहीं डंडी मारता,
                    मुकद्दर से ही मिला है,तुझसा एक बनिया मुझे
कितने कांटे,कितने पत्थर और कितनी ठोकरें,
                    रोकने को राह ,रस्ते में मिला क्या क्या मुझे
  यहाँ से लेकर वहां तक ,मुश्किलें ही मुश्किलें,
                     पार करना पडा था एक आग का दरिया  मुझे
दूसरों के दोष मैंने देखना बंद करदिया,
                     नज़र खुद में ,लगी आने सैकड़ों ,कमियां मुझे
उसने रोशन राह करदी,सब अँधेरे मिट गए,
                       राह में मिल गयी बिखरी,हजारों खुशियाँ मुझे
लिखा था जो मुकद्दर में,उससे ज्यादा ही मिला,
                       उसकी मेहर हो गयी और  मिल गया क्या क्या मुझे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

बाती और कपूर

बाती और कपूर

खुद को डूबा प्रेम के रस में,
               तुम जलती हो बन कर बाती
जब तक स्नेह भरा दीपक में,
                जी भर उजियाला    फैलाती
और कपूर की डली बना मै,
                  जल कर करूं आरती ,अर्चन,
निज अस्तित्व मिटा देता  मै,
                 मेरा होता पूर्ण समर्पण
तुम में ,मुझ में ,फर्क यही है,
               तुमभी जलती,मै भी जलता
तुम रस पाकर फिर जल जाती,
               और मै जल कर सिर्फ पिघलता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'               

बुधवार, 5 सितंबर 2012

गुरु की महिमा

गुरु की महिमा क्या कहूँ,
शब्दों से न कह पाते हैं;
इत्र ज्यों तन को महकाए,
ये जीवन महका जाते हैं|

जीने का ढंग बतलाते हैं,
पाठ कई सिखला जाते हैं;
अर्थ जीवन का भी बताते,
रंग कितने हैं समझा जाते हैं |

पथ-प्रदर्शक बन जीवन में,
सत्य मार्ग दिखला जाते हैं;
लक्ष्य तक कैसे हम पहुँचे ये,
शिक्षक ही सब बतलाते हैं |

तन में जैसे प्राण हैं होते,
ज्ञान त्यों मन को दे जाते हैं;
शिक्षा का ये दान हैं देते,
अंतर शुद्धि कर जाते हैं |

आदि काल से शिक्षकगण ही,
पूर्ण विकास करवा जाते हैं;
मानव वो अपूर्ण ही होता,
गुरु के बिन जो रह जाते हैं |

ईश्वर से भी बढ़कर होता,
गुरु की महिमा बतलाते हैं;
गुरु के बिन जीवन दुष्कर है,
अर्थहीन है, समझाते हैं |

सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ |

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