संगत का असर
सुबह की शीतल हवा,
सूरज का साथ पा,
लू बन, सताती है
संगत के असर से,
आदमी की फितरत भी,
कितनी बदल जाती है
अलग अलग बादल की,
अलग अलग बूँदें भी,
मिल कर धरती पर से
साथ साथ रहती है,
नदिया बन बहती है,
मिलने समंदर से
खेल है किस्मत का,
मगर असर संगत का,
बड़े रंग दिखता है
शादी हो जाने पर,
आदमी के जीवन का,
रुख ही बदल जाता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कविता
-
उसने अपनी पसंद से शादी की
रंडी कहलायी
बाल कटवाये तो परकटी
जो जीन्स पहन ली
तो रांड शब्द उपहार मिला
उसने साड़ी पहनी जो दिखी नहीं
सूट, बिंदी, चूड...
4 घंटे पहले