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बुधवार, 1 जुलाई 2026

आंसू खारे लगते 

हैं रातें काली,डरावनी,दिन पहाड़ से लगते 
हंसी खोखली सी आती है, आंसू खारे लगते

 रोज सुबह सूरज की किरणें आकर मुझे जगाती 
प्रात काल की हवा थपेड़े देकर नींद भगाती 
बासीपन सारा हट जाता , तन हो जाता ताजा 
मेरा मन चेतन हो जाता ,अपनेपन का राजा 
पर कैसे मैं वक्त गुजारूं,मन में प्रश्न उभरते 
गुजर रहे दिन रात मेरे हैं ,यूं ही सोते जगते 

वह यौवन वाली दिनचर्या जब से छूट गई है 
सब कुछ सूना सूना लगता ,खुशियां रूठ गई है 
जब से वृद्धावस्था ने आ,रखा कदम जीवन में
बस पीड़ाएं ही पीड़ाएं, है मेरे जीवन में

 जिन जिन पर विश्वास किया था , वो ही मुझको ठगते 
हँसी खोखली सी आती है, आंसू खारे लगते 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

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