मैंने तो मांगी थी तुमसे
सिर्फ अंजुली एक प्यार की,
किंतु कृपा की तुमने ऐसी,
सागर भर कर प्यार दे दिया
मैं तुम्हारी प्रेम दृष्टि की,
एक झलक पाने आतुर था
लेकिन नयन मिला कर तुमने
सपनों का संसार दे दिया
बहुत तड़फ थी, उमस भरे दिन,
लू के झोंके रहे थे बरस
मैंने तो तुमसे मांगी थी
दे दो बस थोड़ी सी ठंडक
पर बादल बन, तुमने साजन
प्रेम नीर ऐसा बरसाया
मेरे तन के पौर पौर में,
एक शीतल संचार दे दिया
मैंने तो मांगी थी तुमसे,
सिर्फ अंजुली एक प्यार की
किन्तु कृपा की तुमने ऐसी,
सागर भर कर प्यार दे दिया
प्रबल शीत वाला मौसम था
मैं ठिठुरन से तड़फ रहा था
मैंने तुमसे तन ढकने को
माँगा था आँचल का साया
दूर होगयी सारी तड़फन
गरम हो गया तन का कण कण
बदली मेरी सारी दुनिया
जबसे साथ तुम्हारा पाया
इतनी मेहरबान हुई तुम
अपने श्वासों की ऊष्मा से
देने तपन ठिठुरते दिल को
बाहुपाश का हार दे दिया
मैने तो मांगी थी तुमसे
सिर्फ अंजुली एक प्यार की
किन्तु कृपा की तुमने ऐसी
सागर भर कर प्यार दे दिया
मदन मोहन बाहेती घोटू
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपने बहुमूल्य टिप्पणी के माध्यम से उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन करें ।
"काव्य का संसार" की ओर से अग्रिम धन्यवाद ।